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15 अगस्त 1947: करोड़ों लोगों को नहीं मालूम था कि वे किस देश के नागरिक हैं
सार
भारत-पाकिस्तान विभाजन की यह अमानवीय त्रासदी काफी हद तक औपनिवेशिक ब्रिटिश शासकों की आपराधिक जल्दबाजी और गैर-जिम्मेदारी का नतीजा थी।
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भारत-पाकिस्तान में विभाजन (प्रतीकात्मक तस्वीर)।
- फोटो : AI Generated
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विस्तार
15 अगस्त 1947 को भारत वर्षों की गुलामी से मुक्त होकर स्वतंत्रता के जश्न में डूबा था। दिल्ली में ऐतिहासिक 'ट्रिस्ट विद डेस्टिनी' भाषण के साथ नए राष्ट्र का उदय हो रहा था, लेकिन इसी दौरान पंजाब और बंगाल के सीमावर्ती इलाकों में रहने वाले लाखों-करोड़ों लोग एक अभूतपूर्व और भयावह अनिश्चितता से गुजर रहे थे।
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उन्हें 15 अगस्त की सुबह तक यह ज्ञात ही नहीं था कि वे कानूनी रूप से भारत के नागरिक हैं या नवगठित पाकिस्तान के। यह आधुनिक इतिहास की संभवतः एकमात्र ऐसी घटना थी, जहाँ दो देशों की आजादी की घोषणा तो कर दी गई, लेकिन उनके मानचित्र की सीमा रेखाएं बाद में उजागर की गईं।
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सिरिल रैडक्लिफ और 36 दिनों की हड़बड़ी
भारत-पाकिस्तान विभाजन की यह अमानवीय त्रासदी काफी हद तक औपनिवेशिक ब्रिटिश शासकों की आपराधिक जल्दबाजी और गैर-जिम्मेदारी का नतीजा थी। जब जून 1947 में वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन ने अचानक आजादी की तारीख को जून 1948 से घटाकर 15 अगस्त 1947 करने की घोषणा की, तो उपमहाद्वीप की सीमाओं को तय करने के लिए समय लगभग न के बराबर बचा।
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इस विशाल और जटिल कार्य के लिए लंदन के एक कॉर्पोरेट वकील सर सिरिल रैडक्लिफ को चुना गया और उन्हें 'पंजाब और बंगाल सीमा आयोग' का अध्यक्ष बनाकर भारत भेजा गया। रैडक्लिफ 8 जुलाई 1947 को पहली बार भारत की धरती पर कदम रख रहे थे। उन्हें इस देश के भूगोल, जटिल सामाजिक ताने-बाने, जातीय विविधताओं और स्थानीय जनसांख्यिकी की रत्ती भर भी जमीनी समझ नहीं थी।
जिस संवेदनशील काम के लिए विस्तृत वैज्ञानिक सर्वेक्षणों, ग्राम-स्तरीय दौरों, स्थलाकृतिक अध्ययन और वर्षों के गहन विचार-विमर्श की आवश्यकता थी, उसे पूरा करने के लिए रैडक्लिफ को मात्र 36 से 40 दिनों का हास्यास्पद समय दिया गया। दिल्ली और शिमला के वातानुकूलित कमरों में बैठकर, भीषण गर्मी के बीच, रैडक्लिफ ने बिना एक बार भी सीमावर्ती इलाकों का दौरा किए भारत के भविष्य पर कैंची चलाना शुरू कर दिया।
उनके पास जमीनी हकीकत को जानने का कोई साधन नहीं था; वे केवल आउटडेटेड ब्रिटिश नक्शों, 1941 की संदिग्ध जनगणना के आंकड़ों और दोनों तरफ के राजनीतिक दलों (कांग्रेसी और मुस्लिम लीगी प्रतिनिधियों) के परस्पर विरोधी तर्कों के सहारे रेखाएँ खींच रहे थे।
रैडक्लिफ रिपोर्ट को रोकने की कूटनीतिक साजिश
सीमा रेखा के निर्धारण में केवल प्रशासनिक जल्दबाजी ही नहीं थी, बल्कि इसके पीछे औपनिवेशिक हुकूमत की एक बेहद शातिर और आक्रामक कूटनीति भी काम कर रही थी। सर सिरिल रैडक्लिफ ने पंजाब और बंगाल के बंटवारे की विस्तृत और आधिकारिक रिपोर्ट 12 से 13 अगस्त 1947 के बीच ही पूरी तरह तैयार कर लॉर्ड माउंटबेटन को सौंप दी थी।
इसके बावजूद, तत्कालीन वाइसरॉय लॉर्ड माउंटबेटन ने एक सोची-समझी रणनीति के तहत इस ऐतिहासिक दस्तावेज को मुहरबंद लिफाफों में बंद रखा और इसे 15 अगस्त की मध्यरात्रि के बाद तक सार्वजनिक न करने का सख्त आदेश दिया।लॉर्ड माउंटबेटन और ब्रिटिश सरकार का प्राथमिक लक्ष्य यह था कि 15 अगस्त को होने वाले स्वतंत्रता दिवस के आधिकारिक समारोहों में कोई व्यवधान न आए।
अंग्रेज शासक चाहते थे कि 'यूनियन जैक' को उतारने और ब्रिटिश शासन की विदाई का घटनाक्रम वैश्विक मीडिया में एक "शांतिपूर्ण और भव्य सत्ता हस्तांतरण" के रूप में दर्ज हो। उन्हें भली-भांति भान था कि जैसे ही नक्शा सामने आएगा, सीमाओं के दोनों तरफ असंतोष, चीख-पुकार और भयंकर सांप्रदायिक दंगे भड़क उठेंगे।
यदि यह हिंसा 15 अगस्त से पहले शुरू होती, तो इसकी सीधी नैतिक और प्रशासनिक जिम्मेदारी ब्रिटिश हुकूमत और ब्रिटिश क्राउन पर आती।रिपोर्ट को दबाने का सबसे कूटनीतिक पहलू यह था कि हिंसा का ठीकरा नवगठित भारत और पाकिस्तान की सरकारों पर फोड़ा जा सके।
17 अगस्त को जब आधिकारिक रूप से लिफाफा खोला गया, तब तक कानूनी रूप से ब्रिटिश शासन समाप्त हो चुका था और दोनों देश स्वतंत्र हो चुके थे। नतीजतन, सीमांकन के बाद भड़की अभूतपूर्व हिंसा, लूटपाट, बलात्कार और नरसंहार को अंग्रेज "दो नए नवेले देशों की आंतरिक विफलता" बताकर अपनी जवाबदेही से पूरी तरह साफ बच निकले।
पता ही नहीं था कि उन्हें किस क्षेत्र में गश्त लगानी है
रिपोर्ट को रोके रखने के इस 3-4 दिनों के समय का इस्तेमाल पर्दे के पीछे राजनीतिक दबाव बनाने और कुछ विवादित क्षेत्रों (जैसे फिरोजपुर, ज़ीरा और गुरदासपुर के कुछ हिस्सों) की सीमाओं में बदलाव करने के लिए भी किया गया।
इतिहासकार मानते हैं कि फिरोजपुर और ज़ीरा जैसे मुस्लिम बहुल क्षेत्रों को रणनीतिक और लॉजिस्टिक कारणों से अंतिम क्षणों में पाकिस्तान के बजाय भारत के पाले में डालने में माउंटबेटन के राजनीतिक हस्तक्षेप की बड़ी भूमिका रही।
इस कूटनीतिक विलंब का सबसे भयावह असर यह हुआ कि सीमावर्ती जिलों (जैसे लाहौर, अमृतसर, मुर्शिदाबाद और चितगाँव) के नागरिक अधिकारियों, पुलिस अधिकारियों और पंजाब बाउंड्री फोर्स को यह पता ही नहीं था कि उन्हें किस क्षेत्र में गश्त लगानी है और किस कानून का पालन कराना है।
अधिकारी और सैनिक खुद इस असमंजस में थे कि उनका तबादला कहाँ होगा।17 अगस्त 1947 को जब यह रिपोर्ट अंततः सार्वजनिक की गई, तब तक बहुत देर हो चुकी थी। औपनिवेशिक शासकों की इस कूटनीतिक चाल ने सीमाओं पर बसे करोड़ों बेगुनाह लोगों को एक ऐसे अंधकार में धकेल दिया, जहाँ आजादी का पहला सवेरा खुशियों के बजाय अविश्वास, भय और विस्थापन की अंतहीन विभीषिका लेकर आया।
सशस्त्र बलों का विभाजन और गहराता संकट
आम नागरिकों की अनिश्चितता के बीच, देश की सुरक्षा का स्तंभ मानी जाने वाली 'ब्रिटिश-इंडियन आर्मी' भी विभाजन की इस प्रक्रिया से अछूती नहीं रही। फील्ड मार्शल सर क्लाउड ऑचिनलेक की देखरेख में सेना, नौसेना और वायु सेना का बंटवारा 82.5% (भारत) और 17.5% (पाकिस्तान) के अनुपात में तय किया गया।
मुस्लिम और गैर-मुस्लिम सैनिकों को देश चुनने का विकल्प दिया गया, जिसने सदियों पुरानी साझा रेजिमेंटल परंपराओं को रातों-रात तोड़ दिया। सबसे बड़ा विवाद 16 आयुध कारखानों को लेकर हुआ, जो सभी भारत के क्षेत्र में स्थित थे।
मशीनरी उखाड़ने से इनकार करने पर भारत को पाकिस्तान को हथियार कारखाने स्थापित करने के लिए 6 करोड़ रुपये की वित्तीय मदद देनी पड़ी। लेकिन त्रासदी यह थी कि 15 अगस्त के उन अनिश्चित दिनों में जब सीमाओं पर दंगे भड़क रहे थे, तब सेना खुद अपने पुनर्गठन, सैनिकों के स्थानांतरण और सैन्य संपत्तियों की गिनती में उलझी हुई थी, जिससे सीमावर्ती इलाकों में कानून-व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो गई।
15 और 16 अगस्त को सीमावर्ती जिलों में पूर्ण भ्रम
दो दिनों का संशय और हवा में लटके शहर सीमा रेखा के ऐलान में विलंब के कारण 15 और 16 अगस्त को सीमावर्ती जिलों में पूर्ण भ्रम और अफवाहों का माहौल था। लाहौर, अमृतसर, गुरदासपुर और फिरोजपुर जैसे क्षेत्रों में लोग यह तय नहीं कर पा रहे थे कि वे अपने घरों में सुरक्षित हैं या उन्हें पलायन करना पड़ेगा।
पूर्व में बंगाल के मुर्शिदाबाद में 15 अगस्त को पाकिस्तान का झंडा फहरा दिया गया था, जबकि मालदा में भारतीय झंडा फहराया गया। वहीं, 97 प्रतिशत गैर-मुस्लिम आबादी वाले चितगांव पर्वतीय क्षेत्र के लोगों ने भारतीय तिरंगा फहराया था। लेकिन 17 अगस्त को जब लिफाफा खुला, तो समीकरण पूरी तरह बदल चुके थे।
मुर्शिदाबाद भारत में रहा, मालदा का हिस्सा पूर्व पाकिस्तान में गया और चितगाँव को भी पूर्व पाकिस्तान का हिस्सा बना दिया गया, जिसके बाद लोगों को रातों-रात अपने झंडे बदलने पड़े।
अंधाधुंध सीमांकन और मानवीय विभीषिका
17 अगस्त को सीमा रेखा सार्वजनिक होते ही पूरे क्षेत्र में घबराहट और हिंसा का विस्फोट हो गया। नक्शे पर खींची गई रेखा इतनी अपरिपक्व थी कि कई गांव दो हिस्सों में बंट गए; किसी का खेत भारत में था तो घर पाकिस्तान में, और किसी का आँगन एक देश में था तो बैठक दूसरे में।
जिन लोगों ने 15 अगस्त को अपने घरों में आजादी का स्वागत किया था, वे 17 अगस्त को अचानक अपने ही घर में बेगाने होकर शरणार्थी बन गए। इसके बाद इतिहास का सबसे बड़ा और दर्दनाक विस्थापन शुरू हुआ, जिसमें लगभग 1.5 करोड़ लोगों को बेघर होना पड़ा और प्रशासनिक व सैन्य तंत्र के ठप होने से भड़के दंगों में लाखों बेगुनाह लोगों ने अपनी जान गंवा दी।
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