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दलित सम्मान का सवाल या राजनीति का हथियार? खड़गे के आरोप और हल्द्वानी के कथित ‘शुद्धीकरण’ पर उठते सवाल
सार
क्या वास्तव में हवन खड़गे के दलित होने के कारण कराया गया था? या फिर इसके पीछे कोई दूसरा कारण था? क्या पूरे मामले की निष्पक्ष जांच हुई?
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कार्यक्रम को संबोधित करते कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे
- फोटो : अमर उजाला डिजिटल
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विस्तार
उत्तराखंड के हल्द्वानी के रामलीला मैदान में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की सभा के बाद हुए हवन और कथित ‘शुद्धीकरण’ ने एक बार फिर भारतीय राजनीति के सामने जाति और राजनीतिक विमर्श का पुराना सवाल खड़ा कर दिया है। खड़गे ने इसे अपने दलित होने के कारण हुआ अपमान बताया।
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मामला राज्यसभा तक पहुंचा। दूसरी ओर, जिस हिंदू संगठन श्रीराम सेना धर्मार्थ सेवा न्यास ने हवन कराया, उसका कहना है कि विरोध खड़गे की जाति या व्यक्ति के खिलाफ नहीं था। आपत्ति सभा के दौरान लगाए गए कथित मजहबी नारों और धार्मिक उपयोग के लिए चिह्नित स्थल के राजनीतिक इस्तेमाल को लेकर थी। हवन में दलित समाज के लोग शामिल थे। सवाल यह है कि आखिर सच क्या है?
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क्या वास्तव में हवन खड़गे के दलित होने के कारण कराया गया था? या फिर इसके पीछे कोई दूसरा कारण था? क्या पूरे मामले की निष्पक्ष जांच हुई? क्या यह पता लगाने की कोशिश की गई कि उस संगठन ने वास्तव में क्या कहा और उसकी आपत्ति किस बात को लेकर थी? सबसे बड़ा सवाल, क्या किसी राजनीतिक विवाद को तुरंत दलित अपमान का रूप दे देना उचित है?
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इन सवालों के जवाब जरूरी हैं, क्योंकि दलित सम्मान कोई सामान्य राजनीतिक मुद्दा नहीं है। यह भारत के सामाजिक इतिहास और संविधान की आत्मा से जुड़ा विषय है।
दरअसल, राजनीति में आरोप लगाना आसान है, लेकिन आरोप की सच्चाई तक पहुंचना कठिन। हल्द्वानी के मामले में भी यही दिखाई देता है। एक पक्ष ने इसे जातिगत अपमान बताया, जबकि दूसरे पक्ष ने इससे साफ इनकार किया। ऐसे में स्वाभाविक रूप से जांच होनी चाहिए थी। सभा में क्या हुआ? कौन से नारे लगे? हवन क्यों कराया गया? आयोजकों की मंशा क्या थी?
क्या खड़गे की जाति का कोई उल्लेख हुआ? यदि हुआ तो किस संदर्भ में? इन सवालों का जवाब सामने आए बिना किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा। यदि जांच में यह साबित होता है कि किसी व्यक्ति को केवल इसलिए अपमानित किया गया, क्योंकि वह दलित है तो इसकी जितनी कड़ी निंदा की जाए, कम है। दोषियों को कड़ी सजा मिले, लेकिन यदि मामला राजनीतिक या धार्मिक विवाद का था। उसे बाद में जातिगत अपमान का रंग दिया गया तो यह भी उतना ही गंभीर प्रश्न है।
मल्लिकार्जुन खड़गे भारतीय राजनीति के वरिष्ठ नेताओं में हैं। वे लंबे समय से संसद में हैं। देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। राज्यसभा में विपक्ष के नेता भी हैं। फिर क्या उन्हें हर बार केवल ‘दलित नेता’ के रूप में देखा जाना चाहिए? क्या उनके राजनीतिक अनुभव, संघर्ष, विचार और संवैधानिक पद से बड़ा उनकी जातिगत परिचय हो जाना चाहिए?
यहां एक महत्वपूर्ण बात समझनी होगी। किसी व्यक्ति का दलित होना उसके सम्मान को कम नहीं करता, लेकिन किसी राष्ट्रीय नेता को केवल उसकी जाति तक सीमित कर देना भी उचित नहीं है। खड़गे स्वयं अपने लंबे राजनीतिक जीवन से यह साबित कर चुके हैं कि वे राष्ट्रीय राजनीति के बड़े खिलाड़ी हैं।
फिर सवाल यह है कि जब कोई विवाद होता है तो क्या उनकी पहली पहचान एक राष्ट्रीय नेता की होनी चाहिए या दलित नेता की? यदि हर बार उनकी जाति को राजनीतिक बहस के केंद्र में लाया जाएगा तो क्या अनजाने में वही सामाजिक सोच मजबूत नहीं होगी, जिसे समाप्त करने का दावा किया जाता है?
दलित समाज ने भेदभाव झेला है। सामाजिक समानता के लिए लंबा संघर्ष हुआ है। संविधान ने समान अधिकार दिए। डॉ. भीमराव आंबेडकर ने सामाजिक न्याय की जिस लड़ाई को दिशा दी, वह आज भी भारतीय लोकतंत्र की महत्वपूर्ण आधारशिला है।
इसलिए दलित अपमान के किसी भी मामले को हल्के में नहीं लिया जा सकता, लेकिन क्या दलित सम्मान का अर्थ यह है कि जब भी किसी दलित नेता के साथ राजनीतिक या धार्मिक विवाद हो, उसे जाति के चश्मे से ही देखा जाए? क्या विरोध और अपमान के बीच अंतर नहीं होना चाहिए?
क्या राजनीतिक असहमति को जातिगत भेदभाव कहने से वास्तविक जातिगत भेदभाव के खिलाफ चल रही लड़ाई कमजोर नहीं होगी? यह सवाल खड़गे से ही नहीं, सभी राजनीतिक दलों से पूछा जाना चाहिए।
कांग्रेस अध्यक्ष के परिवार की राजनीतिक और आर्थिक स्थिति को लेकर भी बहस होती है। उनके पुत्र प्रियंक खड़गे कर्नाटक सरकार में मंत्री हैं। खड़गे स्वयं दशकों से सार्वजनिक जीवन में रहे हैं। किसी व्यक्ति के संपन्न या प्रभावशाली होने का अर्थ यह नहीं कि वह जातिगत भेदभाव का अनुभव नहीं कर सकता।
इसलिए उनकी आर्थिक या राजनीतिक स्थिति को आधार बनाकर उनके आरोप को सीधे खारिज करना उचित नहीं होगा, लेकिन इसके साथ दूसरा सवाल भी खड़ा होता है, क्या लंबे समय से सत्ता और प्रभाव के केंद्र में रहने वाला एक राष्ट्रीय नेता अपनी जातिगत पहचान को हर राजनीतिक विवाद में प्रमुख हथियार बनाए?
क्या यह राजनीति उस दलित समाज के लिए वास्तव में उपयोगी है, जिसके नाम पर यह सवाल उठाया जाता है? दलित समाज को केवल भावनात्मक बयान नहीं चाहिए। उसे बेहतर शिक्षा, रोजगार, अवसर, सम्मान और सामाजिक सुरक्षा चाहिए। उसे ऐसी राजनीति चाहिए, जो उसकी अगली पीढ़ी को आगे बढ़ाए, न कि हर चुनाव और हर विवाद में उसकी पहचान को राजनीतिक हथियार बना दे।
खड़गे ने इस मुद्दे को राज्यसभा में उठाया। यह उनका लोकतांत्रिक अधिकार है। यदि उन्हें लगता है कि उनके साथ अन्याय हुआ है तो संसद में आवाज उठाना स्वाभाविक है, लेकिन क्या संसद में मुद्दा उठाने से पहले उसकी पूरी सच्चाई जानना उतना ही जरूरी नहीं था? क्या विपक्ष के नेता का दायित्व केवल सरकार से सवाल पूछना है या समाज के सामने तथ्य रखना भी है?
क्या सत्तापक्ष का दायित्व केवल राजनीतिक बचाव करना है या निष्पक्ष जांच कराना भी है? क्या मीडिया का दायित्व केवल दोनों पक्षों के बयान चलाना है या यह पता लगाना भी है कि वास्तविक घटना क्या थी? यदि इन तीनों स्तरों पर तथ्य सामने आते तो शायद विवाद इतना राजनीतिक नहीं बनता।
लोकतंत्र में किसी नेता की सभा का विरोध किया जा सकता है। उसके विचारों का विरोध किया जा सकता है। उसके भाषण की आलोचना की जा सकती है। किसी राजनीतिक दल की नीतियों के खिलाफ प्रदर्शन हो सकता है, लेकिन विरोध की भी मर्यादा होती है। यदि किसी व्यक्ति की जाति को निशाना बनाकर कोई कार्रवाई की गई है तो वह लोकतांत्रिक विरोध नहीं, सामाजिक भेदभाव है।
उसके खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए, लेकिन यदि किसी धार्मिक स्थल या आयोजन स्थल के उपयोग को लेकर विवाद है तो उसे जातिगत संघर्ष बना देना भी उचित नहीं। असहमति को असहमति रहने देना चाहिए। हर असहमति को जाति और धर्म की लड़ाई में बदलना समाज के लिए खतरनाक है।
आज भारत जिस दौर से गुजर रहा है, उसमें राजनीतिक नेताओं की भाषा और व्यवहार का प्रभाव बहुत बड़ा है। समाज पहले ही जाति, धर्म, क्षेत्र और विचारधारा के आधार पर कई स्तरों पर विभाजित है। ऐसे समय में राष्ट्रीय स्तर के नेताओं से अपेक्षा होती है कि वे आग में घी डालने के बजाय तथ्यों और संवाद का रास्ता चुनें।
खड़गे का राजनीतिक कद इतना बड़ा है कि उनसे इसी जिम्मेदारी की अपेक्षा की जानी चाहिए। यदि उनके साथ वास्तव में जातिगत भेदभाव हुआ है तो उन्हें पूरी मजबूती से लड़ना चाहिए, लेकिन यदि विवाद का कारण कुछ और है तो उन्हें भी तथ्यों के सामने आने की प्रतीक्षा करनी चाहिए, क्योंकि दलित सम्मान का सवाल इतना गंभीर है कि उसे राजनीतिक सुविधा के अनुसार इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए।
हल्द्वानी की घटना का अंतिम सच जांच से सामने आना चाहिए, लेकिन इस घटना ने कई सवाल छोड़ दिए हैं। क्या राजनीति में जाति की पहचान को बार-बार सामने लाना समाज को मजबूत करता है? क्या किसी वरिष्ठ नेता के हर विवाद को उसकी जातिगत पहचान से जोड़ना उचित है?
क्या दलित समाज के वास्तविक मुद्दे राजनीतिक आरोपों के शोर में दब नहीं जाते? क्या विरोध करने वालों की मंशा जाने बिना उन्हें जातिवादी घोषित कर देना न्यायसंगत है? क्या किसी भी राजनीतिक नेता को यह अधिकार होना चाहिए कि वह अपनी जातिगत पहचान के आधार पर हर विवाद को विशेष राजनीतिक संवेदना का विषय बना दे? इन सवालों से बचना नहीं चाहिए।
भारत का लोकतंत्र तभी मजबूत होगा, जब जातिगत भेदभाव के खिलाफ आवाज भी उठे और जाति के राजनीतिक इस्तेमाल पर सवाल भी उठे। दोनों बातें एक साथ संभव हैं। दलित सम्मान किसी पार्टी की संपत्ति नहीं है। यह संविधान का मूल्य है। इसलिए उसका इस्तेमाल राजनीतिक ढाल के रूप में नहीं, सामाजिक न्याय के संकल्प के रूप में होना चाहिए।
हल्द्वानी का सच जो भी हो, वह जांच से सामने आना चाहिए, लेकिन एक बात साफ है, न तो जाति के नाम पर अपमान स्वीकार किया जा सकता है और न ही जाति के नाम पर राजनीति को सवालों से मुक्त किया जा सकता है। यही स्वस्थ लोकतंत्र की पहचान है।
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