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संवेदनहीनता: क्या बुजुर्गों के प्रति बढ़ता निष्ठुर भाव कल का ‘न्यू नॉर्मल’ है?
सार
समाज में वृद्धजनों और जन्मदाता मां-बाप के प्रति निष्ठुरता और उन्हें बोझ मानने का बढ़ता भाव इस बात इशारा है कि हमारा भावी समाज कैसा होने वाला है। सोनीपत और भोपाल की ताजा घटनाओं ने हर संवेदनशील मन को भीतर तक झकझोर दिया है।
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बेटियों ने वीडियो कॉल पर देखी पिता की जलती चिता
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
हाल में घटी दो घटनाएं न केवल मन को विचलित करने वाली हैं, बल्कि पूरे समाज को आत्ममंथन के लिए विवश करने वाली हैं कि हम किस दिशा में जा रहे हैं? सोनीपत और भोपाल की दो घटनाओं में स्वजनों का अपने ही पिता के अंतिम संस्कार ठुकराना और मृतक का दाह संस्कार वृद्धाश्रम संचालकों द्वारा किया जाना, इस बात को गहरे से रेखांकित करता है कि समाज में अब वरिष्ठ नागरिकों की सियत और उपयोगिता क्या रह गई है?
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भारत जैसे पारंपरिक देश में ये घटनाएं अभी अपवादस्वरूप हों, लेकिन यह आने वाला का कल का ‘न्यू नॉर्मल’ हो सकता है। क्योंकि भारत आज भले युवाओं का देश हो, 25 साल बाद वह शायद दुनिया के सबसे ज्यादा बूढ़ों का देश बनने वाला है। तब कौन किसका सहारा होगा?
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माता-पिता को देवतुल्य मानना तो दूर उन्हें मनुष्य मानने वाली संतानें भी कितनी होंगी? हमारे पारंपरिक संस्कारों का क्या होगा? व्यक्ति की निजी प्राथमिकताएं और स्वार्थ उन पर कितने भारी पड़ेंगे तथा समाज में पारिवारिकता की नई परिभाषा क्या होगी? सामाजिक रिश्तों में अपनत्व और संवेदना की भागीदारी कितनी और कैसी होगी? क्या स्वजन का अंतिम संस्कार भी शोक और रिक्तता के अहसास के बगैर केवल उसे निपटाने और यथाशीघ्र उसका मृत्यु प्रमाण पत्र हासिल कर अपने सुखों में श्रीवृद्धि का कारण बनकर रह जाएगा? क्या जीवन की संध्या छाया में जी रहे बुजुर्गों को भी भावी पीढ़ी से बेआस अपना विकेट गिरने का इंतजार भर करते रहना होगा? बेटे-बेटी और नाती-पोतों के रिश्तों को क्या कोई नया नाम देना होगा? इन तमाम सवालों पर गहराई से सोचने की जरूरत है।
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समाज में वृद्धजनों और जन्मदाता मां-बाप के प्रति निष्ठुरता और उन्हें बोझ मानने का बढ़ता भाव इस बात इशारा है कि हमारा भावी समाज कैसा होने वाला है। हालांकि कुछ मामलों में इसके लिए बुजुर्ग भी दोषी है। लेकिन अमूमन इस बढ़ती संवेदनहीनता के बीच न केवल भारत बल्कि विश्व में भी अंतिम संस्कार अब केवल नए धार्मिक सामाजिक कर्तव्य न रहकर एक बड़े कारोबार में तब्दील हो रहा है, जिसे सभ्य भाषा में ‘डेथ केयर सर्विसेज’ और चालू जुबान में ‘बूढ़ों को ठिकाने लगाने’ का धंधा कह सकते हैं।
संवेदनशील मन को भीतर तक झकझोर देने वाले मामले
दरअसल सोनीपत और भोपाल की ताजा घटनाओं ने हर संवेदनशील मन को भीतर तक झकझोर दिया है।
हरियाणा के सोनीपत के एक वृद्धाश्रम में रहने वाले शिवचरण गुप्ता का 74 की आयु में निधन हो गया। उनके अंतिम संस्कार में उनकी तीनों बेटियों में से किसी ने आने की जरूरत नहीं समझी। दूरी और समय की कमी का हवाला देकर वृद्धाश्रम संचालकों से ही बाप का अंतिम संस्कार करने के लिए कह दिया। सगी बेटियों के इस व्यवहार से वृद्धाश्रम संचालक भी हैरान रह गए।
एक बेटी ने बड़ी उदारता से अंतिम क्रिया के लिए 5 हजार 100 रु. ऑनलाइन भेज दिए तो दूसरी बेटी ने कहा कि वो वीडियो काॅल पर ही अंतिम संस्कार देख लेगी। उसमें भी कर्मकांड में देर लगने पर उसने खीजकर कहा कि कितना टाइम और लगेगा। उसे भी नहाना-धोना है। बाप की कपाल क्रिया तक रुकने का भी उसके पास टाइम नहीं है। शिवचरण की पत्नी की मौत पहले ही हो गई थी और वो वृद्धाश्रम में बीमार हुए तो कोई उन्हें देखने तक नहीं आया।
मृतक शिवचरण लिए राहत की बात यही थी कि उनके बड़े भाई को जब अपने अनुज की मौत की खबर मिली तो वो कंधा देने जा पहुंचे। हालांकि अपना भाई वृद्धाश्रम में आखिरी दिन काट रहा है, यह उन्हें भी पता नहीं था।
बाद में यह खबर आई कि जब यह मामला पूरे देश में चर्चित हुआ तो शायद लोक लाज के कारण ही सही, एक बेटी ने पिता की तेरहवीं अपने यहां कराने की इच्छा जताई। कहते हैं कि शुरू में बेटियों ने अस्थियां सुरक्षित रखने की बात कही थी, लेकिन बाद में समय न होने का बहाना बनाकर आश्रम वालों को ही उसे गंगा में प्रवाहित करने के लिए कह दिया। अलबत्ता शिवचरण जाते जाते अपनी आंखें दान कर दूसरों को रोशनी जरूर दे गए।
शिवचरण की तीनों बेटियों में कोई भी ऐसी जगह नहीं है, जो 12 घंटे के भीतर अंतिम दर्शन के लिए नहीं पहुंच सकती थी। लेकिन जो कटु सत्य सामने आ रहा है, वह यह है कि पिता उन्हे तभी तक प्यारे थे, जब तक उनके पास अच्छा पैसा था। कपड़े का कारोबार फल-फूल रहा था। धंधे में जैसे ही कंगाली आई बाप, बाप न रहा। शिवचरण की अंतिमयात्रा में पहुंचे ज्यादातर लोगों का मानना था कि ऐसी संताने होने से तो अच्छा है कि न ही हों।
भोपाल की घटना
भोपाल की घटना तो और भी व्यथित करने वाली है। मूल रूप से इंदौर के रहने वाले 70 वर्षीय घनश्याम राजपूत (सिंह) पिछले कुछ वर्षों से भोपाल के ‘अपना घर' वृद्धाश्रम में रह रहे थे। वे गंभीर रूप से लकवाग्रस्त थे। उनकी देखभाल करने के लिए उनका कोई बेटा या बेटी तैयार नहीं थे। अपनी बीमारी से अकेले ही जूझते घनश्यामसिंह ने दम तोड़ दिया। वृद्धाश्रम प्रबंधन ने बच्चों को इसकी सूचना दी और दो दिन तक इंतजार भी किया। लेकिन बच्चों ने आने से साफ इनकार कर दिया। उन्होंने वृद्धाश्रम संचालिका से कहा कि वे खुद ही अंतिम संस्कार कर दें और हमे 'डेथ सर्टिफिकेट' (मृत्यु प्रमाण पत्र) भिजवा दें।
घनश्याम के दो बेटे और दो बेटियां हैं। लेकिन वृद्धाश्रम में भी उन्हें कोई छोड़ गया था। इसके पहले उन्होंने काफी समय दर-दर भीख मांगकर गुजारा।
मृतक घनश्याम ने टायर- ट्यूब के पंक्चर बनाकर अपने बच्चों को पाला-पोसा, बड़ा किया था। लेकिन जीवन के अंतिम पड़ाव पर उनके दुखों का पंक्चर जोड़ने वाला कोई नहीं था। उल्टे बच्चों का यह निर्लज्ज जवाब था कि जब पिता ने अपनी प्रॉपर्टी में से उन्हें कुछ नहीं दिया तो आखिरी विदाई देने के लिए भी क्यों आना? डेथ सर्टिफिकेट भी इसलिए मांगा गया क्योंकि बच्चों की नजर बाप द्वारा बनवाए गए मकान पर है। हालांकि वृद्धाश्रम प्रबंधन ने इस पर कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि जिस व्यक्ति के अंतिम संस्कार में परिवार शामिल नहीं हुआ, उसके मृत्यु प्रमाण पत्र के लिए भी आश्रम पर दबाव नहीं बनाया जा सकता।
यूं तो मृतक का सम्मानजनक अंतिम संस्कार और उसकी विधि का उल्लेख सभी धर्मों में है। क्योंकि यह एक मनुष्य द्वारा दूसरे मनुष्य के जीवन को कृतज्ञ भाव से दी गई आदरांजलि है। जिसमें यह आग्रह निहित है कि व्यक्ति की जीवन यात्रा पर भले ही विराम लग गया हो, लेकिन परलोक में वो जहां भी, जिस भी रूप में रहे, सुखी रहे और उसके जाने के बाद भी इस संसार में प्राण तत्व और चेतना अक्षुण्ण रहे।
डेथ केयर सर्विसेज की बढ़ती मांग
एक तरफ बुजुर्गों के प्रति स्वजनों का यह निष्ठुर और एहसान फरामोश सलूक तो दूसरी दुनिया में डेथ केयर सर्विसेज ( मृत्योपरांत कर्मकांड सेवाएं) का तेजी से बढ़ता कारोबार। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक 2025 में यह 127.9 बिलियन डाॅलर ( लगभग 121 खरब रु.) का था, जिसके 2035 तक 241.5 बिलियन डॉलर हो जाने की उम्मीद है। इसमें भी पारंपरिक रूप से अंतिम संस्कार और रस्मी अंतिम संस्कार के रेट और शेयर अलग-अलग हैं। अंतिम क्रिया का यह बाजार सालाना 6.6 फीसदी की दर से बढ़ रहा है।
डब्लूएचओ का डाटा बताता है कि दुनिया भर में सालाना 6.70 करोड़ से ज्यादा मौतें होती हैं। युद्ध, प्राकृतिक प्रकोप और हादसों के कारण इसमे इजाफा ही हो रहा है। ऐसे में अंतिम क्रिया संस्कारों की बढ़ती मांग और जरूरत में बाजार को भी काफी संभावनाएं दीख रही हैं। इनमें मानवीय संवेदनाओं से ज्यादा मांग पर आधारित सेवा मुहैया कराने और उसी हिसाब से मुनाफा कूटने का आग्रह मुख्य है। इस अपेक्षाकृत नए कारोबार में दफन सेवाएं, स्मारक सेवाएं, पारंपरिक रूप से अंतिम संस्कार के लिए पूर्व नियोजित सेवाएं, स्मृति सेवाएं आदि शामिल हैं।
हालांकि बढ़ती मौतों की वजह से ज्यादा कब्रिस्तानों और श्मशानो की मांग भी बढ़ती जा रही है और उसी अनुपात में अंतिम संस्कार सामग्री और पुरोहितों की भी। सबके अलग-अलग पैकेज हैं। आप अपनी पसंद के अनुसार ऑर्डर करिए। सारी व्यवस्थाएं हो जाएंगी।
भारत की ही बात करें तो यहां भी अंतिम संस्कार सेवाएं देने वाले मोक्षशील, श्रद्धांजलि डॉट कॉम, अंत्येष्टि और लास्ट जर्नी फ्यूनेरल सर्विस जैसे स्टार्ट अप शुरू हो चुके हैं। राजस्थान में तो घर में मौत होने पर रोने के लिए रूदालियों की सेवाएं लेने की पुरानी परंपरा है। हालांकि हमारे देश में अभी भी लोगों की पहली पसंद स्वजनो और परिजनों द्वारा धार्मिक विधि के अनुसार ही मृतक का अंतिम संस्कार करना है। फिर भी अंतिम संस्कार का यह बाजार भारत में करीब 3.5 बिलियन डॉलर ( लगभग 333 अरब रु.) का हो चुका है और सोनीपत जैसी घटनाएं इस बाजार के और बढ़ने का ही संकेत देती हैं। लेकिन मानवीय संवेदनाओं, भारतीय संस्कारों और रिश्तों की पवित्रता की दृष्टि से यह कोई गर्व करने लायक बात नहीं है।
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