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तिरंगे की कहानी: एक झंडा, जिसने भारत की पहचान बदल दी
सार
7 अगस्त 1906 की पहली दस्तक से 15 अगस्त 1947 की आजादी तक—राष्ट्रीय ध्वज ने भी तय किया लंबा सफर। तिरंगे की इस यात्रा को केवल तीन तारीखों—7 अगस्त 1906, 22 जुलाई 1947 और 15 अगस्त 1947—से समझना अधूरा होगा। इसके बीच 1907, 1917, 1921 और 1931 जैसे महत्वपूर्ण पड़ाव भी आए।
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भारतीय तिरंगा
- फोटो : AI Generated
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विस्तार
15 अगस्त आते ही देश की निगाहें तिरंगे पर टिक जाती हैं। लाल किले की प्राचीर से लेकर स्कूलों, सरकारी भवनों, घरों और सीमा चौकियों तक तिरंगा भारत की पहचान बनकर लहराता है।
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उसे देखते ही मन में गर्व की अनुभूति होती है। लेकिन जिस तिरंगे को आज हम भारत की संप्रभुता, स्वतंत्रता और राष्ट्रीय एकता का प्रतीक मानते हैं, उसकी यात्रा एक दिन में पूरी नहीं हुई थी। इसके पीछे कई दशकों का संघर्ष, कई प्रयोग और राष्ट्रीय पहचान की तलाश की लंबी कहानी है।
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तिरंगे की इस यात्रा को केवल तीन तारीखों—7 अगस्त 1906, 22 जुलाई 1947 और 15 अगस्त 1947—से समझना अधूरा होगा। इसके बीच 1907, 1917, 1921 और 1931 जैसे महत्वपूर्ण पड़ाव भी आए। इस पूरी यात्रा में एक नाम विशेष रूप से सामने आता है—पिंगली वेंकैया, जिन्हें भारतीय राष्ट्रीय ध्वज के मूल डिजाइन से जुड़े प्रमुख व्यक्ति के रूप में याद किया जाता है।
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1906: राष्ट्रीय पहचान की पहली दस्तक
भारतीय राष्ट्रीय ध्वज की विकास यात्रा का एक महत्वपूर्ण शुरुआती पड़ाव 7 अगस्त 1906 को सामने आया, जब कलकत्ता के पारसी बागान स्क्वायर में एक राष्ट्रीय ध्वज फहराया गया। वह आज के तिरंगे जैसा नहीं था, लेकिन उस समय उसका सामने आना बेहद महत्वपूर्ण था।
भारत ब्रिटिश शासन के अधीन था और देश में स्वदेशी तथा बहिष्कार आंदोलन के जरिए राष्ट्रीय चेतना मजबूत हो रही थी। ऐसे समय में एक भारतीय राष्ट्रीय ध्वज का सार्वजनिक रूप से सामने आना इस बात का प्रतीक था कि भारत अपनी अलग राष्ट्रीय पहचान तलाश रहा है।
यह झंडा आगे आने वाले राष्ट्रीय ध्वज का अंतिम रूप नहीं था। लेकिन उसने एक महत्वपूर्ण शुरुआत जरूर कर दी थी। अब स्वतंत्रता आंदोलन के पास केवल नारे और प्रतीक नहीं थे, बल्कि एक ऐसा दृश्य प्रतीक भी था जिसके माध्यम से भारतीय अपनी सामूहिक पहचान व्यक्त कर सकते थे।
1907: भारत की आवाज विदेश तक पहुंची
अगले ही वर्ष 1907 में मैडम भीकाजी कामा ने विदेश में भारत से जुड़ा एक ध्वज फहराकर स्वतंत्रता की आवाज को अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचाया। यह घटना इस बात का संकेत थी कि भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन केवल भारत की सीमाओं के भीतर सीमित नहीं रह गया था। विदेशों में रह रहे भारतीय भी स्वतंत्रता की लड़ाई और राष्ट्रीय पहचान के सवाल से जुड़े हुए थे।
इस दौर में राष्ट्रीय ध्वज का स्वरूप लगातार बदल रहा था। यह बदलाव केवल रंगों या डिजाइन का बदलाव नहीं था, बल्कि भारत की राजनीतिक सोच के विकसित होने का भी संकेत था।
1917: स्वशासन की मांग के साथ एक और ध्वज
1917 में एनी बेसेंट और बाल गंगाधर तिलक के नेतृत्व वाले होम रूल आंदोलन के दौरान एक और ध्वज सामने आया। इसका उद्देश्य भारत के लिए स्वशासन की मांग को अभिव्यक्त करना था। यानी ध्वज अब केवल राष्ट्रीय भावना का प्रतीक नहीं था, बल्कि राजनीतिक अधिकारों और स्वशासन की मांग का भी प्रतीक बनने लगा था।
भारत की स्वतंत्रता की मांग जैसे-जैसे स्पष्ट होती गई, वैसे-वैसे एक ऐसे राष्ट्रीय प्रतीक की आवश्यकता भी महसूस होने लगी जिसमें देश की विविधता और एकता दोनों दिखाई दें।
पिंगली वेंकैया और 1921 का निर्णायक पड़ाव
इसी पृष्ठभूमि में पिंगली वेंकैया का नाम सामने आता है। वे स्वतंत्रता सेनानी होने के साथ-साथ राष्ट्रीय ध्वज के डिजाइन और विभिन्न देशों के झंडों के अध्ययन में विशेष रुचि रखते थे। 1921 में विजयवाड़ा में उन्होंने महात्मा गांधी के सामने राष्ट्रीय ध्वज का एक डिजाइन प्रस्तुत किया।
सरकारी स्रोतों के अनुसार उस समय के प्रारंभिक डिजाइन में लाल और हरे रंग की पट्टियां थीं और बाद में सफेद रंग तथा चरखे को शामिल किया गया। चरखा स्वदेशी, आत्मनिर्भरता और आर्थिक स्वतंत्रता की भावना का प्रतीक बन गया।
पिंगली वेंकैया को इसलिए भारतीय राष्ट्रीय ध्वज के मूल डिजाइन से जुड़े प्रमुख व्यक्ति के रूप में याद किया जाता है। लेकिन यह समझना जरूरी है कि आज का तिरंगा उनके 1921 के प्रारंभिक डिजाइन का हूबहू रूप नहीं है। अगले वर्षों में ध्वज के स्वरूप और उसके प्रतीकों में बदलाव होते रहे और अंततः स्वतंत्र भारत के लिए वर्तमान स्वरूप सामने आया।
1931: तिरंगे को मिला नया रूप
राष्ट्रीय ध्वज की यात्रा में 1931 एक बेहद महत्वपूर्ण वर्ष था। इसी वर्ष केसरिया, सफेद और हरे रंग वाले तिरंगे को स्वीकार किया गया और उसके बीच चरखा रखा गया। यह ध्वज वर्तमान राष्ट्रीय ध्वज का महत्वपूर्ण पूर्ववर्ती था। उस समय यह भी स्पष्ट किया गया कि रंगों को किसी धार्मिक समुदाय के प्रतिनिधित्व के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
इस स्वरूप ने राष्ट्रीय ध्वज को एक अधिक स्पष्ट और व्यापक पहचान दी। केसरिया, सफेद और हरे रंग तथा बीच में चरखे ने स्वतंत्रता आंदोलन की भावना को एक मजबूत दृश्य प्रतीक प्रदान किया। चरखा उस समय केवल सूत कातने का साधन नहीं था; वह स्वदेशी, श्रम, आत्मनिर्भरता और विदेशी आर्थिक प्रभुत्व के विरोध का प्रतीक बन चुका था।
1947: आजादी के साथ तिरंगे का अंतिम पड़ाव
जैसे-जैसे 1947 करीब आया, भारत के सामने केवल स्वतंत्रता प्राप्त करने का सवाल नहीं था। स्वतंत्र राष्ट्र की पहचान भी तय करनी थी। राष्ट्रीय ध्वज उस पहचान का सबसे महत्वपूर्ण प्रतीक बनने वाला था।
22 जुलाई 1947 को संविधान सभा ने वर्तमान राष्ट्रीय ध्वज को स्वीकार किया। इसके स्वरूप में केसरिया, सफेद और हरे रंग की तीन समान क्षैतिज पट्टियां रखी गईं और सफेद पट्टी के केंद्र में गहरे नीले रंग का अशोक चक्र रखा गया। अशोक चक्र सारनाथ स्थित अशोक के सिंह स्तंभ के धर्मचक्र से लिया गया है और उसमें 24 आरे हैं।
इस बदलाव के साथ चरखे की जगह अशोक चक्र आया। यह परिवर्तन प्रतीकात्मक रूप से भी महत्वपूर्ण था। चरखा स्वतंत्रता आंदोलन और स्वदेशी संघर्ष की पहचान था, जबकि अशोक चक्र स्वतंत्र भारत की व्यापक ऐतिहासिक, नैतिक और संवैधानिक पहचान को व्यक्त करने वाला प्रतीक बना। इस तरह स्वतंत्रता आंदोलन का झंडा एक संप्रभु राष्ट्र के राष्ट्रीय ध्वज में बदल गया।
15 अगस्त 1947: तिरंगे ने देखा आजाद भारत
फिर आया 15 अगस्त 1947 का ऐतिहासिक दिन। भारत स्वतंत्र हुआ और जिस ध्वज को संविधान सभा ने कुछ सप्ताह पहले स्वीकार किया था, वही स्वतंत्र भारत की राष्ट्रीय पहचान बन गया। आधिकारिक राष्ट्रीय पोर्टल के अनुसार वर्तमान स्वरूप वाला राष्ट्रीय ध्वज 15 अगस्त 1947 से स्वतंत्र भारत के डोमिनियन का राष्ट्रीय ध्वज रहा और 26 जनवरी 1950 को गणतंत्र बनने के बाद भी वही राष्ट्रीय ध्वज बना रहा।
इस क्षण को केवल सत्ता परिवर्तन के रूप में देखना तिरंगे की पूरी कहानी को छोटा कर देना होगा। इसके पीछे उन लाखों भारतीयों का संघर्ष था जिन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में हिस्सा लिया, जेल गए, लाठियां खाईं और अपने प्राणों तक का बलिदान दिया। तिरंगा उस संघर्ष की परिणति बनकर स्वतंत्र भारत के आसमान में लहराया।
1906 से 1947: झंडे की नहीं, राष्ट्र बनने की कहानी
अगर पीछे मुड़कर देखें तो 1906 से 1947 तक का सफर केवल एक झंडे के बदलते डिजाइन की कहानी नहीं है। यह उस भारत की कहानी है जो पहले अपनी राष्ट्रीय पहचान तलाश रहा था, फिर राजनीतिक अधिकारों की मांग कर रहा था, उसके बाद पूर्ण स्वतंत्रता के लिए संघर्ष कर रहा था और अंततः एक स्वतंत्र राष्ट्र बनकर सामने आया।
1906 में राष्ट्रीय ध्वज की शुरुआती सार्वजनिक अभिव्यक्ति हुई। 1907 में भारत की स्वतंत्रता की आवाज विदेश तक पहुंची। 1917 में ध्वज स्वशासन की मांग का प्रतीक बना। 1921 में पिंगली वेंकैया के प्रयासों से राष्ट्रीय ध्वज को एक नया स्वरूप मिला।
1931 में केसरिया, सफेद और हरे रंग तथा चरखे वाला तिरंगा स्वतंत्रता आंदोलन की प्रमुख पहचान बना। और अंततः 22 जुलाई 1947 को संविधान सभा ने अशोक चक्र वाले वर्तमान तिरंगे को स्वतंत्र भारत का राष्ट्रीय ध्वज स्वीकार कर लिया।
यानी तिरंगे का इतिहास वास्तव में भारत के राष्ट्र बनने की यात्रा से जुड़ा हुआ है।
तिरंगा आज सिर्फ झंडा नहीं है
आज तिरंगा किसी राजनीतिक दल का झंडा नहीं है। वह किसी एक नेता, विचारधारा, धर्म, जाति, भाषा या क्षेत्र का प्रतीक नहीं है। वह पूरे भारत का राष्ट्रीय ध्वज है।
सीमा पर खड़ा जवान जब तिरंगे को सलाम करता है, किसी अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में भारतीय खिलाड़ी तिरंगा लहराता है, कोई बच्चा स्वतंत्रता दिवस पर हाथ में तिरंगा लेकर स्कूल पहुंचता है या कोई नागरिक अपने घर पर उसे फहराता है, तो इन सभी क्षणों में एक साझा भावना दिखाई देती है—भारत।
तिरंगा हमें यह भी याद दिलाता है कि स्वतंत्रता केवल एक तारीख नहीं है। स्वतंत्रता के साथ जिम्मेदारी भी आती है। राष्ट्रीय ध्वज के प्रति सम्मान का अर्थ केवल उसे फहराना नहीं, बल्कि उन लोकतांत्रिक मूल्यों को भी मजबूत करना है जिनके आधार पर स्वतंत्र भारत ने अपनी यात्रा शुरू की।
तिरंगे को सलाम करने का असली अर्थ
हर साल 15 अगस्त को तिरंगा फहराया जाता है और स्वतंत्रता सेनानियों को याद किया जाता है। लेकिन तिरंगे को सच्ची श्रद्धांजलि केवल उसे सलाम करने में नहीं, बल्कि उन मूल्यों को अपने सार्वजनिक जीवन में बचाए रखने में है जिनके लिए स्वतंत्रता का संघर्ष हुआ था—स्वतंत्रता, समानता, न्याय, शांति और लोकतंत्र।
तिरंगे की यात्रा 1906 में शुरू हुई एक राष्ट्रीय आकांक्षा से निकलकर 1921 के पिंगली वेंकैया के प्रयासों, 1931 के तिरंगे और अंततः 22 जुलाई 1947 के संवैधानिक निर्णय तक पहुंची। 15 अगस्त 1947 को यही तिरंगा स्वतंत्र भारत की पहचान बन गया।
इसलिए तिरंगे की कहानी केवल कपड़े के एक टुकड़े की कहानी नहीं है। यह भारत के जागने, अपनी पहचान खोजने, संघर्ष करने, आजाद होने और फिर लोकतंत्र के रास्ते पर आगे बढ़ने की कहानी है।
जब तिरंगा हवा में लहराता है, तो उसके साथ केवल तीन रंग नहीं लहराते। उसके साथ भारत का इतिहास, उसका संघर्ष, उसका स्वाभिमान और उसके करोड़ों नागरिकों के सपने भी लहराते हैं।
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