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Human Trafficking In India: मानव ट्रैफिकिंग का चेहरा बदला, चरित्र नहीं
सार
ट्रैफिकिंग गिरोह आमतौर पर उन परिवारों को निशाना बनाते हैं जो आर्थिक, सामाजिक और शैक्षिक रूप से कमजोर होते हैं। गरीबी, कर्ज, बेरोजगारी, स्कूल छोड़ने की मजबूरी, पारिवारिक विघटन और सुरक्षित आजीविका के अभाव जैसी परिस्थितियां बच्चियों को अधिक असुरक्षित बना देती हैं।
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भारत में मानव तस्करी
- फोटो : Ai
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विस्तार
child trafficking in india: आम तौर पर वेश्यावृत्ति को परंपरागत रूप से दुनिया का सबसे पुराना पेशा कहा जाता है लेकिन समाजशास्त्री और अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं मानव ट्रैफिकिंग को मनुष्यों के शोषण और संगठित अपराध के सबसे पुराने रूपों में से एक मानती हैं। समाजशास्त्री और विधि विशेषज्ञ अक्सर "सबसे पुराना व्यापार" या "सबसे पुराना पेशा" जैसे शब्दों के सामान्यीकरण का विरोध करते हैं।
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मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का मानना है कि व्यापार या उपभोक्ता- केंद्रित शब्दावली का उपयोग इस समस्या के पीछे छिपी संरचनात्मक हिंसा, गरीबी और मानवीय असुरक्षा को ढक देता है। इसलिए मानवाधिकार संगठन इस मुद्दे को मानव उत्पीड़न और मानवाधिकारों के उल्लंघन के सबसे पुराने स्वरूप के रूप में देखने पर जोर देते हैं।
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मानव ट्रैफिकिंग यानी लाभ कमाने के उद्देश्य से लोगों की भर्ती, परिवहन, स्थानांतरण या उन्हें आश्रय देना, जिसमें बल, धोखाधड़ी या दबाव का इस्तेमाल किया जाता है, का सीधा संबंध दासता और जबरन श्रम की सदियों पुरानी परंपराओं से है। ट्रैफिकिंग मानव द्वारा मानव के शोषण की सबसे पुरानी और सबसे संगठित व्यवस्था है, जिसने समय के साथ अपना रूप बदला है, लेकिन अमानवीय चरित्र नहीं। दूसरों का शोषण कर तिजोरी भरने का यह धंधा अब भी फल-फूल रहा है।
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दो करोड़ से ज्यादा लोग मानव दुर्व्यापार के शिकार
अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) का मानना है कि दुनिया भर में दो करोड़ से ज्यादा लोग मानव दुर्व्यापार के शिकार हैं और इसमें 55 प्रतिशत महिलाएं और 26 प्रतिशत बच्चे हैं। यह हथियारों और ड्रग्स के बाद दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा संगठित अपराध है।
महिलाएं और बच्चे खास तौर से इनके निशाने पर हैं क्योंकि इनकी कमाई का एक बड़ा हिस्सा देह व्यापार और बच्चों से बंधुआ मजदूरी के रास्ते आता है। आईएलओ के ही आंकड़े ही बताते हैं कि ट्रैफिकिंग से सालाना 150 अरब डॉलर की अवैध कमाई होती है जिसमें 99 अरब डॉलर देह व्यापार से जबकि बाल श्रम की कमाई का हिस्सा 51 अरब डॉलर है।
ट्रैफिकिंग गिरोह का निशाना कमजोर परिवार
ट्रैफिकिंग गिरोह आमतौर पर उन परिवारों को निशाना बनाते हैं जो आर्थिक, सामाजिक और शैक्षिक रूप से कमजोर होते हैं। गरीबी, कर्ज, बेरोजगारी, स्कूल छोड़ने की मजबूरी, पारिवारिक विघटन और सुरक्षित आजीविका के अभाव जैसी परिस्थितियां बच्चियों को अधिक असुरक्षित बना देती हैं। गिरोह के एजेंट गांवों और कस्बों तक पहुंच बनाकर नौकरी, बेहतर वेतन, प्रशिक्षण, विवाह या मनोरंजन क्षेत्र में अवसरों का झांसा देते हैं। कई मामलों में वे स्थानीय परिचितों, रिश्तेदारों या समुदाय के भरोसेमंद लोगों का इस्तेमाल करते हैं, जिससे परिवारों का संदेह कम हो जाता है।
एक बार बच्ची परिवार और समुदाय के संरक्षण से बाहर निकल जाती है तो उसके शोषण की आशंका कई गुना बढ़ जाती है। उसे दूसरे शहरों या राज्यों में ले जाकर पहचान छिपा दी जाती है, संपर्क के साधन छीन लिए जाते हैं और धमकी, हिंसा या मनोवैज्ञानिक दबाव के जरिए उसे काबू में कर लिया जाता है। इसके बाद उसे यौन शोषण और वेश्यावृत्ति के नेटवर्क में धकेल दिया जाता है, जहां उसका शरीर एक वस्तु और आय के स्रोत के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। तमाम रिपोर्ट में बार-बार यह तथ्य सामने आया है कि वेश्यावृत्ति में धकेली गई नाबालिग लड़कियां शुरुआत में किसी न किसी प्रकार की ट्रैफिकिंग का शिकार रही थीं।
दो चीजों के बिना मानव ट्रैफिकिंग के खिलाफ लड़ाई अधूरी
ट्रैफिकिंग केवल आपूर्ति की समस्या नहीं है। सस्ता श्रम, देह व्यापार, घरेलू नौकरों की मांग और जबरन विवाह की मांग इस अपराध को जीवित रखती है। भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में बाल श्रम, बाल विवाह और ट्रैफिकिंग तीन अलग-अलग समस्याएं नहीं हैं। ये अक्सर एक-दूसरे से जुड़ी हुई कड़ियां हैं। बाल श्रम और बाल विवाह को समाप्त किए बिना मानव ट्रैफिकिंग के खिलाफ लड़ाई अधूरी रहेगी।
इसलिए ट्रैफिकिंग यानी मानव दुर्व्यापार को केवल कानून-व्यवस्था की समस्या के रूप में नहीं देखा जा सकता। यह गरीबी, लैंगिक भेदभाव, अशिक्षा, असुरक्षित पलायन और संगठित अपराध के गठजोड़ का परिणाम है। जब तक इन मूल कारणों पर प्रभावी हस्तक्षेप नहीं होगा, तब तक बच्चियों को शोषण और वेश्यावृत्ति के चक्र में धकेले जाने का खतरा बना रहेगा।
1,58,633 बच्चों को बचाया जा चुका
ट्रैफिकिंग का सबसे प्रभावी प्रतिरोध समुदाय के स्तर पर होता है। अनुभव बताता है कि जागरूक पंचायतें, स्कूल, महिला समूह, बाल संरक्षण समितियां और नागरिक समाज संगठन ट्रैफिकिंग की रोकथाम में कानून-प्रवर्तन एजेंसियों से भी पहले चेतावनी तंत्र का काम कर सकते हैं।
बाल अधिकारों की सुरक्षा व संरक्षण के लिए नागरिक समाज संगठनों के देश के सबसे बड़े नेटवर्क जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन के 250 से भी अधिक सहयोगी संगठन देश के 450 से भी ज्यादा जिलों में बाल विवाह, बाल श्रम और बच्चों की ट्रैफिकिंग रोकने के लिए सरकार के आंख-कान का काम करने के साथ कानूनी हस्तक्षेपों का प्रभावी इस्तेमाल कर रहे हैं। जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रन के प्रयासों से अप्रैल 2023-दिसंबर मई 2026 के बीच 1,58,633 बच्चों को ट्रैफिकिंग से बचाया गया।
ट्रैफिकिंग बाल अधिकारों की विफलता
बच्चों की ट्रैफिकिंग असमानता, गरीबी, लैंगिक भेदभाव और बच्चों के अधिकारों के हनन का सबसे क्रूर चेहरा है। इसकी सबसे खतरनाक विशेषता यह है कि यह अक्सर हमारी आंखों के सामने घटित होती है, फिर भी दिखाई नहीं देती। खेतों, कारखानों, घरों, ईंट-भट्टों, ऑर्केस्ट्रा समूहों, बाल विवाहों और यहां तक कि डिजिटल प्लेटफॉर्मों के पीछे छिपा यह अपराध तब तक फलता-फूलता रहेगा, जब तक समाज इसके संकेतों को पहचानना और इसके खिलाफ सामूहिक रूप से खड़ा होना नहीं सीखता। ट्रैफिकिंग का हर मामला अपने आप में बच्चों के अधिकारों की विफलता की कहानी है और हर सफल बचाव इस सत्य की गवाही कि समय पर किया गया हस्तक्षेप केवल एक बच्चे को नहीं, बल्कि उसके पूरे भविष्य को बचा सकता है।
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नोट- लेखक वरिष्ठ पत्रकार व इंडिया फॉर चिल्ड्रेन के निदेशक हैं।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।