{"_id":"6a7f1cc4be673060960c1bb2","slug":"deo-ki-dairy-satir-on-indian-family-foofa-ji-and-their-protocol-2026-08-14","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"देव की डायरी: भारतीय परिवारों में प्रतिष्ठा विषय, फूफा जी को आगे की सीट पसंद है","category":{"title":"Blog","title_hn":"अभिमत","slug":"blog"}}
देव की डायरी: भारतीय परिवारों में प्रतिष्ठा विषय, फूफा जी को आगे की सीट पसंद है
सार
अलवर के एक फूफा ने हमें एक बार फिर बता दिया है कि भारतीय पारिवारिक व्यवस्था में सीट का भी अपना संविधान होता है। कार में आगे की सीट फूफा के लिए आरक्षित रहनी चाहिए। पीछे बैठना ऐसा ही है, जैसे परिवार में आपकी हैसियत को अचानक पिछली कतार में भेज दिया गया हो। फूफा इस अपमान को आसानी से स्वीकार नहीं करते। आगे की सीट, आखिर आगे की सीट होती है। उस पर बैठकर आदमी सड़क देखता है। पीछे की सीट पर बैठकर आदमी केवल आगे बैठे आदमी का सिर देखता है और फूफा को किसी का सिर देखना पसंद नहीं। बरात जा रही कार में आगे की सीट ‘प्रतिष्ठा’ है, बीच की सीट ‘समझौता’ और पीछे की सीट ‘अपमान’ । फूफा 'प्रतिष्ठा' के अलावा कुछ और स्वीकार नहीं कर सकते। आगे से हमें याद रखना होगा , फूफा रिश्तेदारी के स्थायी विपक्ष हैं
विज्ञापन
फूफा जी
- फोटो : Amarujala.com/AI
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
भारतीय परिवार में बहुत से रिश्ते होते हैं। कुछ रिश्ते खून के होते हैं, कुछ विवाह के और कुछ ऐसे होते हैं, जिन्हें निभाने के लिए केवल नाराज होना पर्याप्त होता है। फूफा इसी तीसरी श्रेणी का रिश्ता है। फूफा कोई साधारण व्यक्ति नहीं होते। वे रिश्तेदारी के स्थायी विपक्ष हैं। सरकार कोई भी हो, सत्ता किसी की भी हो, फूफा असंतुष्ट रहते हैं। उनका असंतोष ही उनकी पहचान है। वह खुश हो जाएं तो परिवार को चिंता होने लगती है कि कहीं कुछ गलत तो नहीं हो गया।
विज्ञापन
तीन दिन पहले अलवर से खबर आई कि एक बरात में फूफा को कार की पिछली सीट पर बैठा दिया गया। फूफा नाराज हो गए। चेहरा बदल गया। फूफा की यह विशेषता है कि जैसे ही उन्हें अपनी जगह किसी दूसरे के लिए सुरक्षित दिखाई देती है, उनका चेहरा बदल जाता है। उस चेहरे को देखकर पत्नी समझ जाती है कि अब घर लौटने पर कोई पुरानी घटना निकलेगी।
विज्ञापन
फूफा कहेंगे, “तुम्हें याद है, तुम्हारी भतीजी की शादी में क्या हुआ था?”
पत्नी कहेगी, “अब क्या हुआ?”
फूफा कहेंगे, “कुछ नहीं।”
फूफा का ‘कुछ नहीं’ बहुत कुछ होता है। मैंने अपने जीवन में कई प्रकार के ‘कुछ नहीं’ देखे हैं। डॉक्टर का ‘कुछ नहीं’, अध्यापक का ‘कुछ नहीं’, पत्नी का ‘कुछ नहीं’ और फूफा का ‘कुछ नहीं’। इनमें सबसे खतरनाक ‘कुछ नहीं’ फूफा का ही होता है। अलवर के फूफा इतने नाराज हुए कि उन्होंने जनवासे के पास बरात जाने के लिए तैयार खड़े पंद्रह वाहनों के टायर बर्फ काटने वाले सूजे से फाड़ दिए।
विज्ञापन
सीसीटीवी ने सब देख लिया। घटना छोटी लग सकती है, लेकिन इसमें भारतीय पारिवारिक व्यवस्था का बड़ा दर्शन छिपा है। आगे की सीट आखिर आगे की सीट होती है। उस पर बैठकर आदमी सड़क देखता है। पीछे बैठकर केवल आगे बैठे आदमी का सिर देखता है और फूफा को किसी का सिर देखना पसंद नहीं। उन्हें हमेशा सामने देखना है। शायद इसीलिए वे फूफा बने हैं।
फूफा जी का खास प्रोटोकॉल
फूफा का अपना एक प्रोटोकॉल होता है। उन्हें यह नहीं बताया जाता कि कहां बैठना है। उन्हें स्वयं महसूस होना चाहिए कि उनके लिए सबसे अच्छी जगह सुरक्षित रखी गई है। उनको पीछे बैठाना खतरनाक है। उन्हें आगे बैठाइए। वे चुप रहेंगे। पीछे बैठाएंगे तो वे इतिहास बदल देंगे। हमने अब तक सीट को केवल बैठने की जगह समझा था। फूफा ने बताया कि सीट सम्मान का प्रश्न है। आगे की सीट ‘प्रतिष्ठा’ है। पीछे की सीट ‘अपमान’ है। बीच की सीट ‘समझौता’ है, और फूफा प्रतिष्ठा छोड़कर कुछ और कभी स्वीकार नहीं कर पाते। उन्होंने इतनी बरातें देखी हैं कि अब उन्हें लगता है कि हर बरात उनके अनुभव से चलनी चाहिए।
दूल्हा कौन है, इससे उन्हें कोई खास फर्क नहीं पड़ता। बरात की दिशा, गति और गरिमा का वास्तविक नियंत्रण उनके पास होना चाहिए। वह बरात में सिर्फ शामिल नहीं होते। वह बरात की निगरानी भी करते हैं। कौन आगे चल रहा है,कौन पीछे। किस गाड़ी में कौन बैठा है। किसे कितने फूल मिले। किसने उनके आने पर दरवाजा खोला। किसने केवल हाथ जोड़ दिए। कौन उनके बराबर बैठ गया।
कौन उनसे आगे निकल गया। फूफा इन सबका हिसाब रखते हैं। हमारे यहां आयकर विभाग के पास जितना हिसाब नहीं होता, फूफा के पास रिश्तेदारों का उससे अधिक होता है।
सबसे बड़ी बात यह कि फूफा कभी सीधे नहीं कहते कि उन्हें आगे बैठना है। वह कहेंगे, “अरे, जहां जगह हो बैठा दो।” यह वाक्य सुनते ही समझ जाना चाहिए कि संकट आने वाला है। आप कहेंगे, “फूफाजी, आगे वाली सीट पर जगह नहीं है।” वह सिर्फ कहेंगे, “अच्छा।” अब यह ‘अच्छा’ अच्छा नहीं है। यह प्राथमिकी है। इसके बाद वह चुपचाप पीछे बैठ जाएंगे, मगर उनके भीतर लोकतंत्र की सारी संस्थाएं सक्रिय हो चुकी होंगी। अलवर के फूफा ने तो पंद्रह गाड़ियों के टायर पंचर किए। हमारे समाज में ऐसे कितने फूफा हैं, जो बिना एक भी टायर पंचर किए पूरी व्यवस्था को पंचर कर देते हैं।
दफ्तर के फूफा जी
हर दफ्तर में एक फूफा हैं। उन्हें कुर्सी पीछे मिल गई तो नाराज। मंच पर नाम बाद में आया तो नाराज। माला किसी और को पहले पहना दी गई तो नाराज। समारोह में उनका परिचय छोटा करा दिया गया तो नाराज। फोटो में वह किनारे खड़े रह गए तो नाराज। और यदि कोई पूछ दे, “आप नाराज क्यों हैं?” तो वह कहेंगे, “मैं नाराज नहीं हूं।”
यह दूसरा खतरनाक वाक्य है। फूफा जब कहते हैं कि वह नाराज नहीं हैं, तब वह अपने भीतर नाराजगी का ‘भंड़ारण’ कर रहे होते हैं। फिर वह नाराजगी ब्याज सहित लौटाते हैं। उनकी नाराजगी बैंक की एफड़ी जैसी होती है, समय के साथ बढ़ती है। लेकिन भारतीय परिवार ने फूफा को इसलिए भी बचाकर रखा है कि संकट के समय वह काम आएं।
शादी में कोई व्यवस्था बिगड़ जाए तो फूफा की पुकार। बरात की गाड़ी गलत रास्ते चली जाए तो फूफा को आवाज। दूल्हे के जूते गायब हो जाएं तो फूफा सक्रिय। खाने में नमक कम हो तो फूफा पूरे घर में लट्टू की तरह घूमते नजर आते हैं। समस्या तब पैदा होती है, जब फूफा स्वयं समस्या बन जाएं। तब परिवार में बैठक होती है। कुछ लोग कहते हैं, “उन्हें समझाइए।” कुछ कहते हैं, “माफी मांग लीजिए।” फिर कोई एक ऐसी उम्र का आदमी, जो कुछ दिनों में खुद फूफा बनने वाला होता है, धीरे से कहता है, “उन्हें आगे बैठा दो।” बैठक समाप्त हो जाती है।
देश में अक्सर अनेक जटिल समस्याओं का समाधान नहीं निकलता, मगर फूफा की समस्या का निकल आता है- ”आगे की सीट दे दो।” यह भारतीय कूटनीति का भी सबसे सफल फॉर्मूला है। किसी को नाराज मत करो, आगे बैठा दो। इसलिए फूफा केवल परिवार के सदस्य नहीं हैं। वह हमारी सभ्यता के एक महत्वपूर्ण राजनीतिक मॉड़ल हैं। हमने लोकतंत्र में भी यही सीखा है। हर आदमी आगे बैठना चाहता है।
हर नेता पहली पंक्ति में। हर अधिकारी पहली कुर्सी पर। हर अतिथि मंच पर। हर लेखक चाहता है कि उसका नाम शीर्षक के नीचे आए। हर आयोजक चाहता है कि उसका नाम सबसे पहले लिया जाए। जिसे आगे जगह नहीं मिली, वह पीछे बैठकर पूरी व्यवस्था पर सवाल उठाता है।
इस आचरण का सबसे ईमानदार रूप फूफा हैं। वह कम-से-कम अपनी नाराजगी छिपाते नहीं। बाकी लोग फाइल रोककर, बैठक टालकर, हस्ताक्षर न करके या फोन न उठाकर वही काम करते हैं। फूफा सीधे आदमी होते हैं। उन्हें आगे बैठाइए, वह आगे बैठेंगे। उन्हें पीछे बैठाइए, वह पीछे बैठेंगे भी और याद भी रखेंगे कि उन्हें पीछे किसने बैठाया था। फूफा कुछ भूलते नहीं।
वह दूल्हे की शादी की तारीख भूल सकते हैं, लेकिन किस शादी में उन्हें किस गाड़ी में बैठाया गया था, यह नहीं भूलेंगे। विवाह में इसलिए फूफा को खुश रखना एक तरह का अनिवार्य प्रोटोकॉल है। उन्हें खाना समय पर दीजिए। कुर्सी ठीक दीजिए। चाय पूछिए। और सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि उन्हें यह भ्रम रहने दीजिए कि सारी व्यवस्था उन्हीं की सलाह से चल रही है।
हर सम्मानित रिश्तेदार का भ्रम
फूफा को भ्रम बहुत पसंद है। वास्तव में यह भ्रम हर सम्मानित रिश्तेदार को होता है कि उसके बिना शादी नहीं हो सकती। सच यह है कि शादी हो जाती है। फूफा के बिना भी। लेकिन यह बात फूफा को बताना उचित नहीं है, क्योंकि वह केवल शादी के रिश्तेदार नहीं हैं। वह उस मानसिकता के प्रतिनिधि हैं, जो सम्मान को अपनी जगह से मापती है। उन्हें लगता है कि आगे बैठना ही आगे होना है। और यहीं फूफा परिवार से निकलकर समाज में फैल जाते हैं।
तब हमें पता चलता है कि इस देश के हर आदमी के भीतर एक छोटा-सा फूफा बैठा है। उसे लगता है कि उसे जितना सम्मान मिलना चाहिए, उतना नहीं मिला। दफ्तर में फाइल उसके पास पहले क्यों नहीं आई? सभा में उसका नाम बाद में क्यों लिया गया? फोटो में वह किनारे क्यों खड़ा है? मंच पर कुर्सी छोटी क्यों है? किसी दूसरे को उससे पहले क्यों बुलाया गया? लेकिन जिंदगी की विडंबना यह है कि आगे की सीट सीमित है। हर कोई आगे नहीं बैठ सकता। फूफा को अगर आगे की सीट मिल भी जाती है तो वह चैन की सांस नहीं लेते। वह फिर पीछे मुड़कर देखते हैं। पीछे कोई और बैठा मिलता है। फूफा पूछते हैं, “इसे यहां किसने बैठाया?” फूफा को सिर्फ आगे बैठना नहीं है। उन्हें यह भी तय करना है कि पीछे कौन बैठेगा?
-------------------
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।