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फर्जी तस्वीरों के जरिये असली उत्पीड़न: महिलाओं को अपना सिर झुकाने की जरूरत नहीं, जवाबदेही तय हो
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महिलाओं को चुप कराने के बजाय टेक कंपनियों को जवाबदेह बनाना जरूरी
- फोटो :
अमर उजाला ग्राफिक्स/प्रिंट
विस्तार
नए साल के अवसर पर दिल्ली की अंग्रेजी लेखिका रुचि कोकचा ने अपनी एक सेल्फी सोशल मीडिया पर साझा की थी। उसी सामान्य तस्वीर का इस्तेमाल उनके खिलाफ किया गया। स्पेनिश अखबार एल पाइस की रिपोर्ट के अनुसार, रुचि ने बताया कि कुछ अज्ञात लोगों ने एलन मस्क की कंपनी एक्सएआई के ग्रोक का इस्तेमाल कर उनकी तस्वीर बदल दी। इंटरनेट पर उनके चेहरे के साथ बनाई गई अश्लील तस्वीरें घूम रही थीं, लेकिन वह उनके प्रसार को रोक पाने में असमर्थ थीं। जनवरी में द इंडिपेंडेंट की एक रिपोर्ट में रुचि की बिकिनी पहने हुए विकृत तस्वीरों का उल्लेख किया गया था। उन्हें अपनी तस्वीरें साझा न करने की सलाह भी सुननी पड़ी थी। ऑनलाइन गालियां मिलने पर उनसे कुछ दूरी बनाई जा सकती है, लेकिन अपने ही चेहरे का इस्तेमाल करके बनाई गई अश्लील तस्वीरों का अनुभव उनके लिए कहीं अधिक असहज था।रुचि कोकचा के अनुभव को गंभीरता से समझने की आवश्यकता है। किसी की तस्वीर सार्वजनिक होने का अर्थ यह नहीं है कि जनता उस व्यक्ति पर अपना अधिकार स्थापित कर ले। जैसे किसी पार्क में टहलने के लिए निकलने का अर्थ किसी को अपना शरीर छूने की अनुमति देना नहीं है, वैसे ही सोशल मीडिया पर मौजूद होने का अर्थ भी अपनी तस्वीर के साथ मनमानी करने की अनुमति देना नहीं है।
यह कितनी बड़ी विडंबना है कि किसी लड़की के साथ अत्याचार हो, तो कठघरे में उसी को खड़ा कर दो कि तस्वीर क्यों साझा की! प्रोफाइल सार्वजनिक क्यों रखी? इतने लोगों से मेलजोल रखने की क्या जरूरत थी? अपनी तस्वीर साझा करने को इस तरह अपराध बना दिया जाता है, मानो लड़की ने स्वयं अपने अपमान का आवेदन दिया हो।
तकनीक का यह इस्तेमाल भयावह है। लेकिन, इसके पीछे काम करने वाली सामाजिक धारणा उससे भी पुरानी है। पितृसत्ता को यह अच्छी तरह मालूम है कि किसी महिला को चुप कराने के लिए उसके तर्कों को खारिज करना जरूरी नहीं है। इसके बजाय उसके शरीर को लेकर लोगों में जिज्ञासा पैदा कर देना ही पर्याप्त है। जाहिर है, इस पुरुषवादी सोच की जड़ पर चोट करना जरूरी है।
हम अक्सर लड़की का बचाव करते हुए कहते हैं कि तस्वीर नकली है, इसलिए लड़की निर्दोष है। इस कथन में एक खतरनाक शर्त छिपी है। अगर तस्वीर असली होती, तो क्या उसका अपमान करना उचित हो जाता? क्या तब उसकी नौकरी छूट जाने, परिवार में प्रताड़ित होने और समाज से बहिष्कृत होने को जायज ठहराया जाता? किसी व्यक्ति की गरिमा उसकी तस्वीर की सत्यता जांचने के परिणाम पर निर्भर नहीं हो सकती। किसी लड़की को सम्मान पाने के लिए यह प्रमाणपत्र क्यों देना पड़े कि उसका कोई यौन जीवन नहीं है? और, वे लोग क्या करते हैं, जो ऐसी तस्वीरें दूसरों को भेजते हैं? वे भी इस उत्पीड़न को आगे बढ़ाते हैं। जिज्ञासा की आड़ में अपनी जिम्मेदारी से बचा नहीं जा सकता। आपने जांचने के नाम पर दस लोगों को तस्वीर भेजी और उन लोगों ने आगे दस-दस लोगों को भेज दिया। आपके मनोरंजन की कीमत उस व्यक्ति को चुकानी पड़ रही है, जिसने इस तमाशे में शामिल होने की सहमति नहीं दी थी। इस तरह के हमले की एक और क्रूरता यह है कि लड़की को अपना जीवन रोककर स्वयं को निर्दोष साबित करने में जुटना पड़ता है। एक तस्वीर का खंडन करते-करते दूसरी तस्वीर सामने आ जाती है। वह किस-किस को सफाई दे और कितनी बार?
एल पाइस के अनुसार, आलोचना के बाद एक्सएआई ने कुछ नियंत्रण उपाय लागू किए थे। लेकिन, पीड़ित व्यक्ति के सामने सवाल अब भी बना रहता है कि उसकी तस्वीर कहां-कहां पहुंच चुकी है, किस-किस के पास अब भी मौजूद है और वह दोबारा कब सामने आ जाएगी?
तकनीकी कंपनियों को भी अपनी जिम्मेदारी से बचने का अधिकार नहीं है। लोगों के चेहरों का इस्तेमाल करके अश्लील तस्वीरें बनाने और उन्हें प्रसारित करने की सुविधा उपलब्ध कराकर, शिकायत आने पर एक स्वचालित जवाब भेज देना जिम्मेदारी पूरी करना नहीं है। रोकथाम के उपाय कहां हैं? तस्वीरों को तुरंत हटाने की व्यवस्था कहां है? एक ही तस्वीर बार-बार सामने आए, तो उसके प्रसार को रोकने की व्यवस्था कहां है? मुनाफे का हिसाब रखने में इतनी दक्ष कंपनियां लोगों को होने वाले नुकसान का हिसाब रखने में इतनी उदासीन क्यों हैं?
शिकायत दर्ज कराने के दौरान पीड़ित व्यक्ति को दूसरी बार अपमानित नहीं किया जाना चाहिए। उसकी शिकायत सुनते समय उसके कपड़ों या निजी संबंधों पर नैतिकता का भाषण देने की जरूरत नहीं है। जरूरी यह है कि शिकायत को गंभीरता से लिया जाए, साक्ष्य सुरक्षित रखने में सहायता दी जाए, गोपनीयता बनाए रखी जाए और शीघ्र कार्रवाई हो। तस्वीर हटाने की गुहार लगाते-लगाते कोई व्यक्ति थककर टूट जाए और उत्पीड़क किसी नए नाम से वापस आ जाए, तो ऐसी व्यवस्था को किसी भी लिहाज से प्रभावी नहीं कहा जा सकता।
परिवार की भूमिका भी यहां निर्णायक है। लड़की का फोन छीन लेना, उसकी पढ़ाई बंद करवा देना, नौकरी छुड़वा देना या जल्दबाजी में उसकी शादी कर देना, इन सबके जरिये हम उत्पीड़क का उद्देश्य ही पूरा करते हैं। लड़की के साथ खड़े होने का अर्थ है उसके सामान्य जीवन में लौटने के अधिकार की रक्षा करना। उसके लिए निर्णय लेने से पहले उसकी बात सुनना और उसे यह भरोसा देना कि उसके साथ अन्याय हुआ है और इस अन्याय के लिए उसे दंडित नहीं किया जाएगा।
लड़कियों की तस्वीरें मिटाकर इंटरनेट को सुरक्षित बनाने का विचार अंततः लड़कियों को ही मिटा देने की सोच है। जिस समाज में सुरक्षा पाने की शर्त यह हो कि महिला अदृश्य बनी रहे, वह समाज अपनी विफलता का बोझ उसी पर डालता है। महिलाएं तस्वीरें साझा करेंगी, अपनी बात कहेंगी, हंसेंगी, प्रेम करेंगी और अपने विचार व्यक्त करेंगी। उनकी उपस्थिति की अनुमति देने का अधिकार किसी के पास नहीं है। जो व्यक्ति उनका अपमान करने के लिए तस्वीरें बनाता है, जो उन्हें प्रसारित करता है और जो उन्हें देखकर महिला के चरित्र पर फैसला सुनाता है, शर्म उन्हें आनी चाहिए। महिला को अपना सिर झुकाने की कोई जरूरत नहीं है।