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क्या आकार ले रही है नई इस्लामी सामरिक धुरी?: समझौते के सहारे बदलते सामरिक समीकरण, भारत को रखनी होगी नजर
मुस्लिम बहुल देशों के बीच हालिया रक्षा समझौतों ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में नए सामरिक समीकरणों की संभावनाओं को चर्चा में ला दिया है। इनके दूरगामी प्रभावों पर नजर रखना जरूरी है।
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मक्का से दोहा तक मुस्लिम देशों की बढ़ती सैन्य साझेदारी
- फोटो :
अमर उजाला ग्राफिक्स/प्रिंट
सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये के बीच मक्का संयुक्त रक्षा करार होने के करीब ढाई महीने बाद अब पाकिस्तान, तुर्किये, कतर और इंडोनेशिया के मध्य दोहा में हुए बद्र समझौते से यही स्पष्ट होता है कि वैश्विक राजनीति में इस्लामी धुरी किस दिशा में जा रही है। जिस तरह से ये देश एकजुट हो रहे हैं, उसे महज कुछ मुस्लिम देशों के बीच रक्षा सहयोग की सामान्य पहल मानकर नहीं देखा जा सकता, क्योंकि इनके जरिये पश्चिम एशिया से लेकर दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया तक सामरिक हितों के नए समीकरण बनाने की कोशिश दिखाई देती है। गौरतलब है कि मक्का समझौते के तहत किसी एक देश पर सशस्त्र हमला तीनों देशों पर हमला माने जाने का प्रावधान है। दूसरी तरफ, 21 अक्तूबर को दोहा में हुआ बद्र समझौता मुख्यतः रक्षा उद्योग, सैन्य उत्पादन, तकनीकी प्रशिक्षण व अनुसंधान एवं विकास में सहयोग से संबंधित है। लिहाजा, दोनों समझौतों को एक ही तरह का सैन्य गठबंधन कहना उचित नहीं होगा। इसे इन देशों की अमेरिका पर निर्भरता खत्म करने की कोशिश बताया जा रहा है, पर इन देशों के बीच उभरते सामरिक तालमेल के कुछ और अर्थ भी हो सकते हैं। आखिर अलग-अलग हितों वाले मुस्लिम बहुल देशों ने साथ मिलकर हथियार बनाने का फैसला किया, तो क्या यह अपने आप में सोचने का विषय नहीं है? दरअसल, इन समझौतों के विषय में अहम सवाल यह भी है कि क्या ये देश अपनी सुरक्षा संबंधी चिंताओं को साझा करते हुए एक प्रभावी सामरिक समूह बनाना चाहते हैं, या फिर इनके पीछे इस्लामी पहचान को अंतरराष्ट्रीय शक्ति में बदलने की कोई व्यापक रणनीति काम कर रही है। अगर दूसरी संभावना आकार लेती है, तो इसका असर न केवल पश्चिम एशिया, बल्कि भारत समेत उन सभी देशों पर पड़ सकता है, जिनके हित इस क्षेत्र की स्थिरता से जुड़े हैं। हालांकि, फिलहाल इन्हें एक व्यापक इस्लामिक सैन्य गठबंधन का निर्णायक प्रमाण मानना जल्दबाजी होगी, लेकिन इस सामरिक नेटवर्क की अनदेखी भी नहीं की जा सकती। भारत के लिए इन घटनाक्रमों पर सतर्क निगाह रखना जरूरी है। उसके सऊदी अरब व कतर जैसे खाड़ी देशों के साथ गहरे आर्थिक संबंध हैं। साथ ही, वहां कार्यरत लाखों भारतीयों के हित भी जुड़े हुए हैं। बद्र समझौते को प्रत्यक्ष तौर पर भारत के विरुद्ध बना सैन्य गठबंधन घोषित करने का बेशक कोई आधार नहीं है, पर पाकिस्तान के अतीत और उसकी हरकतों के मद्देनजर इस्लामाबाद की किसी भी नई सामरिक साझेदारी का आकलन भारतीय सुरक्षा हितों के संदर्भ में करना जरूरी है।
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