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कूटनीतिक नर्मी और रिश्तों की राह: प्रधानमंत्री मोदी की कनाडा दौरा महत्वपूर्ण पड़ाव, द्विपक्षीय संबंध पर नजरें

Mon, 19 Oct 2026 09:42 AM IST
K S Tomar केएस तोमर
Updated Mon, 19 Oct 2026 09:42 AM IST
सार

लंबे मतभेदों के बाद प्रधानमंत्री मोदी की इस वर्ष 11 और 12 दिसंबर को कनाडा की प्रस्तावित यात्रा द्विपक्षीय रिश्तों में एक महत्वपूर्ण पड़ाव साबित हो सकती है।

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Diplomatic softening and relations path PM Modi Canada visit in December significant for bilateral ties
प्रधानमंत्री मोदी और कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी (फाइल) - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

जस्टिन ट्रूडो के कार्यकाल में भारत-कनाडा संबंध अपने सबसे निचले स्तर पर पहुंच गए थे, हालांकि अब सुधार के संकेत दिखाई दे रहे हैं। यह बदलाव कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उन प्रयासों को दर्शाता है, जिनका उद्देश्य आर्थिक, रणनीतिक और जनस्तरीय दृष्टि से महत्वपूर्ण द्विपक्षीय संबंधों को फिर से पटरी पर लाना है। हाल ही में हुई बातचीत के बाद दोनों नेताओं ने व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते (सीईपीए) के लिए चल रही वार्ताओं के प्रति अपनी प्रतिबद्धता जताते हुए द्विपक्षीय संबंधों में आए सकारात्मक बदलाव को आगे बढ़ाने पर सहमति जताई।

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प्रधानमंत्री मोदी आगामी 11 और 12 दिसंबर को कनाडा की यात्रा करेंगे। गौरतलब है कि भारतीय छात्र, पेशेवर, उद्यमी और शिक्षाविद कनाडा की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। हालांकि, वीजा में देरी, अध्ययन परमिट के बदलते नियम, आवास की कमी और पढ़ाई के बाद काम तथा स्थायी निवास की अनिश्चितता ने विद्यार्थियों को प्रभावित किया है। दोनों सरकारों को पारदर्शी प्रक्रियाएं, शोषण से सुरक्षा तथा कुशल पेशेवरों के लिए स्पष्ट एवं स्थिर नियम सुनिश्चित करने की जरूरत है।
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भारतीय रिजर्व बैंक के अनुसार, भारत के कुल रेमिटेंस (विदेश से आने वाला धन) में कनाडा की हिस्सेदारी 2020-21 के 1.6 प्रतिशत से बढ़कर 2023-24 में 3.8 प्रतिशत हो गई। वर्ष 2024 में भारत को दुनिया भर से लगभग 137.7 अरब अमेरिकी डॉलर मिले। यह राशि अनेक देशों से प्राप्त हुई थी, केवल कनाडा से नहीं। ये आंकड़े बताते हैं कि शिक्षा और रोजगार के लिए लोगों की आवाजाही दोनों देशों के हित में है। सितंबर 2023 में तत्कालीन कनाडाई प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने हरदीप सिंह निज्जर की हत्या व भारतीय सरकारी एजेंटों के बीच संभावित संबंध होने का आरोप लगाया था, जिसे भारत ने सख्ती से खारिज करते हुए कनाडा में खालिस्तानी चरमपंथी गतिविधियों पर चिंता जताई। फिर दोनों देशों के बीच आरोप-प्रत्यारोप से विश्वास को गंभीर नुकसान पहुंचा।
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लेकिन मार्क कार्नी के प्रधानमंत्री बनने के बाद, दोनों देश संगठित अपराध, मादक पदार्थों की तस्करी और सीमा पार खतरों से निपटने में सहयोग की संभावनाएं तलाश रहे हैं। भारत अपनी सुरक्षा के लिए खतरा माने जाने वाले व्यक्तियों और संगठनों के खिलाफ कार्रवाई चाहता है, जबकि कनाडा अपनी कानूनी प्रक्रियाओं और सांविधानिक अधिकारों की रक्षा पर जोर देता है। ऐसे में, साक्ष्य आधारित जांच और खुफिया सूचनाओं का आदान-प्रदान महत्वपूर्ण होगा। दोनों देशों का लक्ष्य 2026 के अंत तक सीईपीए वार्ता पूरी करना और 2030 तक वस्तुओं तथा सेवाओं का द्विपक्षीय व्यापार सालाना 70 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुंचाना है। कनाडा सरकार के अनुसार, 2025 में दोनों देशों के बीच व्यापार 30.4 अरब डॉलर रहा। समझौते से भारत को दवाओं, वस्त्रों, इंजीनियरिंग उत्पादों और सूचना प्रौद्योगिकी सेवाओं के निर्यात में लाभ मिल सकता है।

कनाडा के लिए कृषि उत्पादों, दालों, खनिजों, ऊर्जा संसाधनों और औद्योगिक उपकरणों के निर्यात के अवसर बढ़ सकते हैं। हालांकि, शुल्क, कृषि, पेशेवरों की आवाजाही और नियामकीय व्यवस्थाओं से जुड़े मतभेद दूर करना जरूरी होगा। भारत को विश्वसनीय ऊर्जा आपूर्ति चाहिए, जबकि कनाडा के पास पर्याप्त ऊर्जा संसाधन और महत्वपूर्ण खनिज भंडार हैं। तरलीकृत प्राकृतिक गैस (एलएनजी), तरलीकृत पेट्रोलियम गैस (एलपीजी), यूरेनियम, सौर ऊर्जा और हाइड्रोजन के क्षेत्र में सहयोग दोनों देशों के लिए लाभकारी हो सकता है।

महत्वपूर्ण खनिजों में साझेदारी से बैटरी और इलेक्ट्रिक वाहन उद्योग की आपूर्ति शृंखलाएं मजबूत होंगी। कृत्रिम बुद्धिमत्ता और उन्नत विनिर्माण में भी भारत की तकनीकी प्रतिभा तथा कनाडा की शोध क्षमता और पूंजी एक-दूसरे के पूरक बन सकते हैं। भारत-कनाडा संबंधों की बहाली के सामने सुरक्षा सहयोग, व्यापार वार्ता और घरेलू राजनीतिक दबाव जैसी चुनौतियां हैं। दोनों देशों को यह सुनिश्चित करना होगा कि मतभेद आर्थिक सहयोग की राह में बाधा न बनें। दिसंबर में मोदी की प्रस्तावित यात्रा समझौते की दिशा में प्रगति की घोषणा का अवसर हो सकती है, हालांकि अंतिम समझौता लंबित मुद्दों के समाधान पर निर्भर करेगा।


दोनों देशों के लिए हर मुद्दे पर सहमत होना जरूरी नहीं है। उन्हें यह समझना होगा कि व्यापक राष्ट्रीय हितों की रक्षा करते हुए मतभेदों का प्रबंधन किया जा सकता है। कूटनीतिक नरमी ने नई शुरुआत का अवसर दिया है, लेकिन इसे स्थायी रणनीतिक साझेदारी में बदलने के लिए धैर्य, पारस्परिक सहयोग और ठोस परिणाम जरूरी होंगे।

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