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यह नई ‘संपूर्ण क्रांति’ की शुरुआत नहीं: नैतिक बल चाहिए, सिर्फ चुनाव 'चोरी' के शोर से जनादेश उलटा नहीं जा सकता
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कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन के बीच इंडिया ब्लॉक के दलों की अपनी राजनीति (फाइल फोटो)
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अमर उजाला ग्राफिक्स
विस्तार
प्रतिरोध के इस दौर में, हर प्लेकार्ड एक जवाबी कहानी को जन्म देता है। जब गाजा का मुद्दा चरम पर था (एक ऐसा युद्ध, जो फलस्तीन से भी बड़े मकसद को लेकर चलने वाले एक इस्लामी संगठन के नरसंहारकारी उन्माद से उपजा था) और जिसे लंदन से लेकर न्यूयॉर्क तक के प्रदर्शनकारियों ने एकदम स्पष्ट, दो-टूक (अच्छे बनाम बुरे) रूप में पेश किया, तब 'नदी से समुद्र तक, फलस्तीन आजाद होगा' जैसे नारों के पीछे यहूदी-विरोध की एक घिनौनी सोच छिपी हुई थी।
समर्थन के अलग-अलग स्तर होते हैं: 'ड्राइंग-रूम में बैठे उदारवादी', जो सेमिनार कक्षों और अखबारों के संपादकीय पन्नों में छाई 'बेचैनी' के चलन में पूरी तरह डूबे रहते हैं, वह अपनी पसंद के कुछ खास लोगों पर 'फासीवाद' और 'नरसंहार' जैसे शब्दों का इस्तेमाल बड़ी आसानी से कर देते हंै, बिना यह सोचे कि इन शब्दों का असली मतलब क्या है। वहीं, न्यूयॉर्क में लोकतांत्रिक समाजवाद का चेहरा माने जाने वाले लोग इस्राइल के प्रति वही तिरस्कार दिखाते हैं, जिसे यह यहूदी राष्ट्र हमेशा से झेलता आया है। और उस 'दुष्ट राष्ट्रपति' के खिलाफ प्रतिरोध—जो स्वतंत्रता पर होने वाले सभी राजनीतिक और सांस्कृतिक हमलों का निचोड़ है—पूरी तरह से उस वामपंथी अभिजात वर्ग की असल सोच को छिपा नहीं पाता, जो शैली के भोंडेपन को नीतियों के 'गैर-अमेरिकी' होने के साथ मिला देता है; चाहे बात सीमाओं की हो या एआई की।
साठ के दशक में पुरानी बंदिशों को तोड़ने वाले आंदोलनों से लेकर, 1989 में प्राग में लोकतंत्र की बहाली की उम्मीद जगाने वाले 'मैजिक लैंटर्न' तक, 2010-12 के थोड़े समय तक चले 'अरब स्प्रिंग' से होते हुए 1968 के आंदोलनों की याद दिलाती 2026 के फ्रांस की आक्रोशित सड़कों तक—ऐसा लगता है कि प्रतिरोध की लहर अब दिल्ली तक पहुंच गई है। लेकिन विरोध में उठे प्लेकार्ड के दूसरी तरफ क्या लिखा है?
जब दिल्ली में पहली बार कॉकरोच जनता पार्टी के समर्थक बड़ी संख्या में आ गए, तो उस समय भारतीय लोकतंत्र की परीक्षा नहीं हो रही थी; बल्कि यह एक रूपक का ऐसा बदला था, जिससे बड़ा बदला शायद ही कोई हो सकता था। यह गुस्सा (भले ही हताश विपक्षी इंडिया गठबंधन ने इसका भरपूर फायदा उठाने की कोशिश की हो) असल में व्यवस्था की कमियों के खिलाफ था। उच्च शिक्षा के ढांचे में मौजूद खामियों के विरोध में उठा यह कदम, काफी हद तक असहमति का एक स्वाभाविक और स्वतःस्फूर्त प्रदर्शन था। अगर सरकार ने जंतर-मंतर पर आंदोलन के पहुंचने से पहले अलग तरह से प्रतिक्रिया दी होती, तो वह अपनी साख बचा सकती थी।
मौजूदा विरोध-प्रदर्शन किसी जज की अलंकारिक टिप्पणी से नहीं, बल्कि खोजी पत्रकारिता से पैदा हुआ है। इसने 'कॉकरोच जनता पार्टी' को भारत का सबसे 'मीडिया-फ्रेंडली' (मीडिया के अनुकूल) विपक्ष बना दिया है—खासकर संदेश पहुंचाने और नाटकीय अंदाज के मामले में। इसकी सबसे बड़ी ताकत चीजों को अपने भीतर समाहित कर लेने की क्षमता में दिखती है। इसने विपक्ष को एक ऐसा मंच दिया, जहां उन्हें अपने चुनावी जनाधार के अनुपात से कहीं ज्यादा मीडिया कवरेज मिल गया। फिर भी, इस उभार की विसंगतियां (जिन्हें सोशल मीडिया ने और बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया है) उतनी ही साफ नजर आती हैं, जितनी कि उस पीढ़ी की बेचैनी, जो दुनिया के अन्य हिस्सों में सड़कों पर उतरे लोगों से प्रेरित है।
'कॉकरोच' अपने विरोध को—अगर दक्षिणपंथी तानाशाही नहीं, तो कम से कम—दबी हुई लोकतांत्रिक-व्यवस्था के खिलाफ एक संघर्ष के रूप में पेश करना चाहेंगे। लंबे समय से, इस देश में असहमति की जो एक 'ऊंची छवि' बनी रही, उसे उन पर्चा-लेखकों ने बनाए रखा, जो अपने लिखे शब्दों के अनुकूल कोई 'मुद्दा' खोजते रहते थे; जबकि उनके ये शब्द खुद उन विचारधाराओं से प्रेरित थे, जिन्हें इतिहास ने बहुत पहले ही त्याग दिया है। अपनी अंतरात्मा को साफ रखने का बोझ इतना अधिक था कि वे एक ऐसी अत्यंत दयनीय स्थिति पैदा करने के लिए बेताब थे, जिसका 'वास्तविक भारत' से कोई लेना-देना न हो। हो सकता है कि इन 'कॉकरोचों' में उन असंतुष्ट लोगों जैसी बौद्धिक स्पष्टता न हो, जो भारतीय दक्षिणपंथ के उभार को लोकतंत्र की विकृति के रूप में देखते हैं; लेकिन पहली बार चोट पहुंचाने के कुछ ही समय बाद, ये लोग सड़कों पर उसी भावना का एक व्यापक रूप बन गए हैं। जिस भारत के खिलाफ वे आक्रोश जताते हैं, वह उस भारत से मेल नहीं खाता, जिसकी कल्पना कुछ नौसिखिए क्रांतिकारी अपनी भोली-भाली निष्कपटता में करते हैं।
यह सोचना कि भारतीय लोकतंत्र अपनी संस्थाओं के मलबे के नीचे दम तोड़ रहा है, उन लोगों की गलत समझ है, जो राज्य की किसी भी असामान्य घटना को फासीवाद का रूप मान लेते हैं। ये लोग अपनी कल्पना से बनाए गए एक चरमराते मंच पर, गैर-आजादी के खिलाफ अपना संघर्ष लड़ते रहते हैं। इसी मंच पर विपक्षी दल एकजुट हुए हैं—हालांकि यह एकजुटता का प्रदर्शन नहीं, बल्कि अपने अस्तित्व की अहमियत का अचानक हुआ अहसास है। इस स्पष्ट बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि भारत के राजनीतिक परिदृश्य में 'नियंत्रित लोकतंत्र' जैसे सुस्त बयानों के बजाय, अधिक ठोस तर्कों और बहस की जरूरत है। चुनाव आयोग के खिलाफ लगाए गए आरोप, चाहे उनमें कितनी भी सच्चाई क्यों न हो, भारतीय लोकतंत्र के अवैध होने की ओर इशारा नहीं करते। ये आरोप दिखाते हैं कि विपक्ष भारतीय मतदाताओं के कठोर रुख का सामना करने में असमर्थ है। चुनाव 'चोरी' का शोर मचाना हार मान लेने की निशानी है। यह किसी नई 'संपूर्ण क्रांति' की शुरुआत नहीं है। यह भूल जाइए कि जेपी (जयप्रकाश नारायण) जैसी कोई बड़ी नैतिक शक्ति नेतृत्व करने के लिए मौजूद है।
यहां तक कि पुराने दौर के केजरीवाल जैसा कोई व्यक्ति भी नहीं है, जो सड़क पर 'महात्मा' की भूमिका निभा सके। हाशिये पर धकेले गए और बेकार हो चुके लोग, 'कॉकरोचों' का सहारा लेकर, भाजपा सरकार को मिले भारी जनादेश को झूठा साबित करने की उम्मीद कर रहे हैं। नुक्कड़ नाटक या सड़क पर किए जाने वाले प्रदर्शन उन्हें टेलीविजन स्क्रीन से आगे नहीं ले जा पाएंगे। यह समय तर्क तैयार करने का है, न कि हारने के डर से अपने आरोप दोहराने का।