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फिर भगदड़, फिर सवाल: कोलकाता की घटना प्रशासनिक लापरवाही व बदइंतजामी का उदाहरण, दोषियों पर कार्रवाई नजीर बने

Mon, 19 Oct 2026 09:38 AM IST
न्यूज डेस्क अमर उजाला, नई दिल्ली।
अमर उजाला, नई दिल्ली। Published by: न्यूज डेस्क Updated Mon, 19 Oct 2026 09:38 AM IST
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Kolkata stampede raise many questions administrative negligence poor management take action set precedent
कोलकाता में भगदड़ - फोटो : पीटीआई-अमर उजाला ग्राफिक्स

उत्तर कोलकाता के चोरबागान सार्वजनिक दुर्गा पूजा पंडाल में मची भगदड़, जिसमें 19 लोगों के मरने और 25 अन्य के घायल होने की सूचना है, बेहद दुखद और दुर्भाग्यपूर्ण होने के साथ प्रशासनिक लापरवाही व बदइंतजामी का भी उदाहरण है। दुर्गा पूजा पश्चिम बंगाल की सांस्कृतिक पहचान है, जहां करीब 58 हजार जगहों पर पूजा आयोजित हो रही है।

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हर वर्ष लाखों लोग भव्य पूजा पंडालों में दर्शन-पूजन करने और कलात्मक सजावट देखने के लिए पहुंचते हैं। ऐसे में इस तरह के हादसे होना महज एक दुर्घटना नहीं, बल्कि पूजा पंडालों की सुरक्षा व्यवस्था, प्रशासनिक तैयारी और सामूहिक जिम्मेदारी पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है।
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देश में बेकाबू भीड़ से होने वाले हादसों का सिलसिला नया नहीं है। हाथरस, महाकुंभ, तिरुपति और नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर हुई भगदड़ की घटनाएं पहले ही इस खतरे की गंभीरता को सामने ला चुकी हैं। इन घटनाओं की परिस्थितियां भले अलग-अलग रही हों, लेकिन भीड़ के दबाव, अपर्याप्त प्रबंधन और आपात स्थितियों में व्यवस्था की कमजोरियां बार-बार सामने आई हैं। इसके बावजूद यदि बड़े आयोजनों में लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं हो पा रही है, तो यह व्यवस्था के स्तर पर गंभीर चिंता का विषय है।
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कोलकाता के ताजे हादसे में, पुलिस और राज्य सरकार की शुरुआती जानकारी के अनुसार, बारिश होने पर बाहर के लोग पंडाल की तरफ बढ़ने लगे, और इसी बीच पंडाल गिरने की गलत घोषणा से अफरा-तफरी और बढ़ गई। भीड़ के अचानक आगे बढ़ने से लोग गिर गए, जिससे वहां भगदड़ मच गई, जो जानलेवा साबित हुई।

प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, रोशनी और स्वयंसेवकों की भी पर्याप्त व्यवस्था नहीं थी। धार्मिक आयोजन समाज की साझा सांस्कृतिक धरोहर होते हैं, इसलिए सुरक्षा की जिम्मेदारी भी साझा होती है, लेकिन यह आयोजकों और प्रशासन की संस्थागत जिम्मेदारी से बचने का बहाना नहीं हो सकती।


बेशक राज्य सरकार ने प्रत्येक मृत व्यक्ति के परिवार को 25 लाख रुपये और एक सदस्य को नौकरी देने एवं घायलों को पांच लाख रुपये मुआवजा देने की घोषणा की हो, लेकिन यह अपने आप में पर्याप्त नहीं है। हादसे की पूरी गंभीरता से जांच हो, जिसमें यह स्पष्ट होना चाहिए कि सुरक्षा संबंधी नियमों का पालन हुआ या नहीं, भीड़ नियंत्रण एवं आपातकालीन स्थिति के लिए उपाय किए गए थे या नहीं और तत्काल प्रतिक्रिया में कोई चूक तो नहीं हुई। यदि किसी भी तरह की लापरवाही प्रमाणित होती है, तो दोषियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई होनी चाहिए, ताकि यह एक नजीर बने।

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