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समझौता और सवाल: भारत-अमेरिका ट्रेड डील को लेकर संशय बरकरार, बेशक इसके बड़े फायदे

अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: नितिन गौतम Updated Wed, 04 Feb 2026 07:01 AM IST
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सार
महीनों तक चले व्यापारिक तनाव, टैरिफ युद्ध और कूटनीतिक तल्खियों के बाद आखिरकार भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौते पर सहमति बनना महत्वपूर्ण है, लेकिन इससे जुड़े कई सवाल अभी अनुत्तरित ही हैं।
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india us trade deal unsolved question still pending impact on export
india us trade deal - फोटो : अमर उजाला

विस्तार
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महीनों तक चले व्यापारिक तनाव, टैरिफ युद्ध और कूटनीतिक तल्खियों के बाद भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौते पर सहमति बनना निस्संदेह एक महत्वपूर्ण कदम है। इसके बावजूद, यह पूरा परिदृश्य जितना आशाजनक दिखता है, उतने ही सवाल भी इसके साथ जुड़े हुए हैं। उल्लेखनीय है कि पिछले वर्ष अमेरिका ने भारत पर 25 फीसदी का पारस्परिक टैरिफ लगाया था, जिसके बाद रूस से तेल खरीदने के मुद्दे पर अतिरिक्त 25 फीसदी का दंडात्मक शुल्क थोप दिया गया, जिससे कुल टैरिफ 50 फीसदी तक पहुंच गया था। जवाब में भारत ने व्यापार के संदर्भ में अमेरिका पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए दूसरे वैश्विक बाजारों की ओर रुख किया। 


नतीजा यह हुआ कि पिछले एक वर्ष में भारत अमेरिका से पहले ब्रिटेन, ओमान, न्यूजीलैंड और यूरोपीय संघ के साथ व्यापार समझौते कर चुका है। भारत पिछले वर्ष से तमाम अड़चनों के बावजूद अमेरिका के साथ भी व्यापार समझौते के लिए वार्ता जारी रखे हुए था, लेकिन जिस तरह से प्रधानमंत्री मोदी के साथ महज एक फोन कॉल के बाद ट्रंप टैरिफ को कम करने के लिए मजबूर हुए, उससे यह मानने में कोई हर्ज नहीं होना चाहिए कि भारत के यूरोपीय संघ के साथ हुए ऐतिहासिक और बहुप्रतीक्षित व्यापार समझौते के बाद वह कई तरह के अंतरराष्ट्रीय और आंतरिक राजनीति के दबाव में थे। 


हालांकि ट्रंप का यह दावा कि प्रधानमंत्री मोदी ने अमेरिका से 500 अरब डॉलर के विभिन्न उत्पाद खरीदने का वायदा किया है, यह देखते हुए कि फिलहाल भारत अमेरिका से 50 अरब डॉलर से भी कम का आयात करता है, शंका ही पैदा करता है। भारत के आयात में रूसी तेल की हिस्सेदारी भले ही कम हो गई हो, लेकिन यह अभी भी कुल आयात का लगभग एक चौथाई हिस्सा है। ऐसे में, ट्रंप का यह दावा भी, जिस पर अब तक भारत की तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है, विश्वासयोग्य नहीं लगता कि भारत रूस से तेल खरीदना बंद करने जा रहा है। इसके अतिरिक्त अनाज, जीएम उत्पादों इत्यादि, जिनको विदेशी बाजार के लिए खोलने का भारत विरोध करता रहा है, उस रुख पर भारत अब भी कायम है। 

हां, यह जरूर है कि प्रस्तावित 18 फीसदी का टैरिफ बांग्लादेश, श्रीलंका, और वियतनाम समेत कई दक्षिण और दक्षिण पूर्व एशियाई देशों से कम है। यह घोषणा भारत और अमेरिका को निस्संदेह भू-राजनीतिक रूप से फिर से एक साथ लाएगी। इसके बावजूद यह नहीं भूलना चाहिए कि व्यापार समझौतों की अपनी जटिलताएं होती हैं, ऐसे में, जब तक इससे जुड़े सवालों के स्पष्ट जवाब सामने नहीं आते, तब तक इसे द्विपक्षीय संबंधों में एक सकारात्मक मोड़ मानना ही बेहतर होगा।
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