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क्या ईरान-अमेरिका समझौता टिक पाएगा: युद्धविराम के बाद भी संशय, ट्रंप-नेतन्याहू के मतभेद खड़े कर रहे कई सवाल

साइमन मैबोन, प्रोफेसर, लैंकेस्टर यूनिवर्सिटी Published by: Devesh Tripathi Updated Sat, 20 Jun 2026 06:48 AM IST
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सार
फिलहाल, अमेरिका और ईरान के बीच समझौता तो हो गया है, लेकिन कुछ महत्वपूर्ण सवाल अब भी अनुत्तरित हैं। जब ट्रंप व नेतन्याहू, दोनों इस बात को लेकर स्पष्ट नहीं दिख रहे हैं कि उनके देश और वे खुद क्या चाहते हैं, तब यह तो वक्त ही बताएगा कि यह समझौता कितना टिकेगा।
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पश्चिम एशिया में शांति कब तक? - फोटो : अमर उजाला प्रिंट

विस्तार

ईरान और अमेरिका के बीच समझौते पर हस्ताक्षर हो गए हैं, जिससे युद्धविराम को 60 दिनों के लिए बढ़ाने और रणनीतिक रूप से अहम जलमार्ग, होर्मुज जलडमरूमध्य को खोलने का रास्ता साफ हो गया। लेकिन, कुछ अहम सवाल अब भी अनसुलझे हैं, जो इस समझौते को विफल कर सकते हैं।


वाशिंगटन और तेहरान के इस समझौते में लेबनान भी शामिल है। ईरान ने इस समझौते पर दस्तखत करने के लिए एक शर्त रखी थी कि इस्राइल उन इलाकों से पीछे हटने का वादा करे, जिन पर उसने युद्ध के दौरान दक्षिणी लेबनान में कब्जा किया था। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस्राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू से कहा कि वह ‘लेबनान में ज्यादा जिम्मेदारी से पेश आएं।’ लेकिन, समझौते के बाद दक्षिणी लेबनान और बेरूत पर इस्राइल की बमबारी जारी रही और लेबनान में इस्राइली सेना की मौजूदगी बनी हुई है। हालांकि, अमेरिका के एक वरिष्ठ अधिकारी ने दावा किया है कि इस्राइल और लेबनान के हिज्बुल्लाह के बीच युद्धविराम पर सहमति बन गई है। लेकिन, इस्राइली सेना के प्रवक्ता ने कहा कि बेशक हम युद्धविराम की स्थिति में हैं, किंतु जरूरत पड़ी, तो लड़ाई जारी रखने के लिए तैयार हैं।


समझौते के मुताबिक, लेबनान में इस्राइली सैन्य गतिविधियों पर रोक लगाने की जिम्मेदारी अमेरिका की है। ईरान इस युद्ध में दोनों देशों को एक ही दुश्मन के तौर पर देखता रहा है। पिछले एक साल में, ट्रंप और नेतन्याहू के रिश्तों को लेकर लगातार सवाल उठाए जाते रहे हैं। इन सवालों से ईरान और पश्चिम एशिया के व्यापक सुरक्षा माहौल को लेकर दोनों देशों के अलग-अलग नजरिये का पता चलता है। 2025 की गर्मियों में दोहा में हमास के ठिकानों पर इस्राइल के हमले के बाद ट्रंप ने नाराजगी भी जताई थी।

ईरान के साथ युद्ध के दौरान लीक हुई टिप्पणियों से पता चलता है कि नेतन्याहू को लेकर ट्रंप कितने नाराज थे। 14 जून को अमेरिकी मीडिया आउटलेट ‘एक्सियोस’ से बात करते हुए ट्रंप गुस्से में बोले: ‘बीबी (नेतन्याहू) को वह बकवास हमला करने की क्या जरूरत थी? मैं बहुत नाराज था। मैंने उन्हें साफ कह दिया कि उनमें जरा भी समझदारी नहीं है। मैंने उन्हें यह बात बता दी।’ बाद में ट्रंप ने ‘ट्रुथ सोशल’ पर इस्राइल को चेतावनी दी कि ‘सब कुछ बर्बाद न करें।’

दो हफ्ते पहले, ट्रंप और नेतन्याहू के बीच इस्राइल की ओर से हवाई हमले फिर से शुरू करने की धमकियों को लेकर तीखी बातचीत हुई थी। एक्सियोस की रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रंप चिल्लाए- ‘तुम यह क्या बकवास कर रहे हो? तुम पूरी तरह पागल हो गए हो। अगर मैं न होता, तो तुम जेल में होते। मैं ही तुम्हें बचा रहा हूं। अब हर कोई तुमसे नफरत करता है। इसकी वजह से हर कोई इस्राइल से नफरत करता है।’ ट्रंप और नेतन्याहू के बीच तनाव, इस्राइल और अमेरिका के बीच उभरते बड़े रणनीतिक मतभेदों को भी दिखाता है। ये दोनों देश लंबे समय से करीबी राजनयिक सहयोगी रहे हैं और पश्चिम एशिया के भविष्य को लेकर उनकी रणनीतिक और वैचारिक सोच एक जैसी रही है। अमेरिका की घरेलू राजनीति और विदेश नीति, दोनों में ही इस्राइल का समर्थन एक अहम आधार रहा है, जिससे इस तरह के नजरिये के रणनीतिक फायदों पर बड़े पैमाने पर विचार-विमर्श हो रहा है।

अमेरिकी राजनीतिक विज्ञानी जॉन मीयरशाइमर और स्टीफन वॉल्ट के एक लेख (जो बाद में पुस्तक के रूप में छपी) में इस विषय पर चर्चा की गई है। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या अमेरिका और इस्राइल के रिश्ते ‘प्यार या लॉबी’ का नतीजा हैं। इसमें ‘अमेरिकन इस्राइल पब्लिक अफेयर्स कमेटी’ द्वारा अमेरिकी नेताओं पर डाले जाने वाले दबाव का साफ जिक्र था, जिसे अमेरिका के सबसे ताकतवर लॉबिंग ग्रुप्स में से एक माना जाता है और अमेरिकी नीति पर जिसका काफी असर है। फिर भी, फिलहाल दोनों देशों के रणनीतिक लक्ष्य सीधे तौर पर एक-दूसरे के खिलाफ नजर आते हैं।

अमेरिका के लिए यह सुनिश्चित करना सबसे जरूरी था कि ईरान के साथ समझौता हो जाए। वहीं इस्राइल में इस समझौते को हार जैसा माना जा रहा है और इससे लोगों में भारी गुस्सा है। वहां की आम जनता ईरान और हिज्बुल्लाह के साथ युद्ध के पक्ष में है। इस्राइल में कई लोग सरकार से इस समझौते को ठुकराने की मांग कर रहे हैं। नेतन्याहू की गठबंधन सरकार के एक सदस्य, वित्त मंत्री इतामार बेन-ग्विर ने कहा कि इस्राइल को अमेरिका के युद्धविराम प्रस्ताव को स्वीकार नहीं करना चाहिए। इस्राइल को अमेरिका से दूर करने की कोशिश में, उन्होंने कहा कि ‘एक संप्रभु देश किसी महाशक्ति का कठपुतली नहीं होता। वह ऐसे समझौतों से बंधा नहीं होता, जो उसके लोगों की सुरक्षा करने की उसकी क्षमता को रोकते हों।’ उन्होंने तर्क दिया कि इस्राइल को ‘दक्षिणी लेबनान में घर गिराने का काम जारी रखना चाहिए... हमें स्वतंत्र बने रहना चाहिए।’ इस्राइल के रक्षा मंत्री इस्राइल काट्ज ने कसम खाई कि इस्राइली सेना दक्षिणी लेबनान में बनी रहेगी और अगर ईरान लेबनान के समर्थन में इस्राइल पर हमला करता है, तो वह उसका जवाब देंगे। नेतन्याहू ने भी कड़ा रुख दिखाया। 15 जून को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने कहा कि हमने ‘इस्राइल के चारों ओर मजबूत सुरक्षा क्षेत्र बनाए हैं। हमने ऐसा गाजा, लेबनान और सीरिया में किया... और मैं यह साफ कर देना चाहता हूं कि हम अपने देश की सुरक्षा के लिए इन सुरक्षा क्षेत्रों में बने रहेंगे।’

ऐसा लगता है कि यह बात आपसी समझौते की शर्तों के बिल्कुल उलट है और इससे ट्रंप-नेतन्याहू तथा अमेरिका-इस्राइल के रिश्तों पर गंभीर सवाल उठते हैं। यह रिश्ता अब एक अहम मोड़ पर है। क्या ट्रंप लेबनान पर इस्राइली बमबारी रोकने और वहां से सेना हटाने का नेतन्याहू पर दबाव डालेंगे, या फिर वे इस्राइल की सैन्य कार्रवाई को नजरअंदाज करके समझौते को खतरे में डाल देंगे? अगर, अमेरिकी राष्ट्रपति इस्राइल से सेना हटाने की जिद करते हैं, तो क्या नेतन्याहू उनकी बात मानेंगे? और इसका दोनों नेताओं की चुनावी संभावनाओं पर क्या असर पड़ेगा, क्योंकि नेतन्याहू को अक्तूबर तक आम चुनाव का सामना करना है और ट्रंप को नवंबर की शुरुआत में मध्यावधि चुनावों का?

जब दो सहयोगी देश साफ तौर पर इस बात पर आमने-सामने हैं कि उनके देश (और शायद वे खुद) क्या चाहते हैं, तो क्या यह समझौता टिक पाएगा? और इसका इस्राइल और अमेरिका के रिश्तों पर क्या असर पड़ेगा? यह तो वक्त ही बताएगा।    
-द कन्वर्सेशन
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