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जिंदगी से लंबे सपने: सगारदा फमिलिया से नोत्र-दाम तक, सदियों में पूरे हुए मानव सभ्यता के महान स्वप्न
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विस्तार
10 जून, 2026। बार्सिलोना, स्पेन। सगारदा फमिलिया के अंदर खामोशी थी। हजारों लोग सांस रोके बैठे थे। कार्डिनल, बिशप, स्पेन के प्रधानमंत्री। कैमरे। मोमबत्तियां। रंगीन कांच से छनकर सूरज की किरणें फर्श पर गिर रही थीं। पोप लियो चौदहवें, इतिहास के पहले अमेरिकी पोप, मंच पर पहुंचे। उन्होंने टॉवर ऑफ जीसस क्राइस्ट का धार्मिक उद्घाटन किया। दुनिया का सबसे ऊंचा चर्च। चोटी पर कांच और स्टील का विशाल क्रॉस फरवरी में लगाया गया।दस जून की तारीख संयोग नहीं थी। ठीक सौ साल पहले-10 जून, 1926 को इसी शहर की ग्रान वीआ सड़क पर एक बूढ़ा आदमी ट्राम के नीचे आया था। फटे कपड़े। जेब में न पहचान पत्र, न पैसा। टैक्सी वालों ने भिखारी समझकर ले जाने से मना कर दिया। उसे गरीबों के अस्पताल ले गए। वह तीन दिन बाद मरा। उसका नाम था एंटोनी गाउदी और वह अधूरी इमारत, जो उसने पीछे छोड़ी-143 साल, ग्यारह पोप, एक गृह युद्ध, दो विश्वयुद्ध और एक महामारी के बाद-दस जून को पूरी हुई। गाउदी तहखाने में दफन है। उसका सपना आसमान छू रहा है। आइए, टाइम मशीन बुलाती है। सगारदा फमिलिया अकेला नहीं है। हम पीछे चलते हैं उन पागलों से मिलने, जिन्होंने ऐसी चीजें बनाईं, जो उनकी जिंदगी से बड़ी थीं। जो जानते थे कि खुद कभी पूरा होते नहीं देखेंगे, फिर भी बनाते रहे।
अरे, यह क्या हम घूम-फिर कर बार्सिलोना आ गए! यह 1883 है। एक इकतीस साल का नौजवान प्रोजेक्ट संभाल रहा है-पिछले आर्किटेक्ट ने इस्तीफा दे दिया। कैटेलोनिया का एंटोनी गाउदी। अगले 43 साल वह इसी इमारत को देने वाला है। आखिरी बारह साल तो चर्च के तहखाने में सोएगा-मजदूरों के बीच, भिखारियों के बीच। कपड़े फटे। दाढ़ी उलझी। जेब खाली। कोई कहे पागल, मगर गाउदी को फर्क नहीं। उसे पता था यह इमारत उसकी जिंदगी में पूरी नहीं होगी। किसी ने पूछा, ‘इतनी देर से बन रही है, कब तक बनेगी?’ गाउदी ने कहा, ‘मेरा ग्राहक जल्दी में नहीं है।’ उसका ग्राहक कौन? ईश्वर।
यह 10 जून, 1926 है। ट्राम की टक्कर की खबर फैली है। तीसरे दिन गाउदी मर गया। पूरा बार्सिलोना सड़कों पर उमड़ आया। सगारदा फमिलिया का अधूरा चर्च पीछे खड़ा था-जैसे कोई बच्चा बाप को दुनिया से जाते देख रहा हो। टाइम मशीन आगे बढ़ती है। 1936-स्पेनिश गृह युद्ध। अराजकतावादियों ने गाउदी की कार्यशाला जला दी। प्लास्टर के मॉडल तोड़े। मगर कुछ कारीगरों ने टूटे हुए प्लास्टर के टुकड़ों से गाउदी के डिजाइन दोबारा जोड़े-जैसे पुरातत्वविद् टूटे बर्तनों से सभ्यता बनाता है। उसके बाद बनी सगारदा फमिलिया की हर मीनार टूटे मॉडलों की याददाश्त से बनाई गई। 143 साल। ग्यारह पोप बदले। इमारतें बनती रहीं। अब और पीछे चलते हैं। हम पेरिस पहुंच रहे हैं। साल 1163 सेन नदी का द्वीप। टाइम मशीन इल दे ला सिते पर उतर रही है। नोत्र-दाम का पहला पत्थर रखा जा रहा है। 182 साल लगेंगे। 1345 में पूरा होगा। कोई वास्तुकार, कोई राजा, कोई बिशप इसे पूरा होते नहीं देखेगा। पत्थर तराशने वाले कारीगरों ने अपना हुनर बेटों को सिखाया है और बेटों ने पोतों को। पूरे खानदान की एक ही पहचान थी-‘हम नोत्र-दाम बनाते हैं।’ तीन पीढ़ियां पैदा हुईं और मरीं-एक ही चर्च बनाते हुए। अपनी स्क्रीन पर देखिए...
15 अप्रैल, 2019 का दृश्य। नोत्र-दाम की मीनार गिरी। छत जली। 856 साल जिंदा रही यह इमारत। सौ साल का युद्ध, फ्रांसीसी क्रांति, नेपोलियन, दो विश्वयुद्ध, नाजी कब्जा-सब सहा। मगर पूरी इमारत को मार दिया एक नामुराद शॉर्ट सर्किट ने। दिसंबर 2024। नोत्र-दाम दोबारा खुला। 861 साल से जिंदा है। बता रहा है कि वह इन्सान की सबसे पुरानी जिद है। अब चलते हैं रोम की तरफ। 1506। टाइम मशीन वेटिकन सिटी में उतर रही है। सेंट पीटर्स बैसिलिका शुरू हो रहा है। यह इतिहास की सबसे बड़ी रिले रेस है-चार दिग्गज, एक इमारत।
हम भी सौ साल का दृश्य एक साथ देखेंगे। आपकी टाइम मशीन की छत पर एक बड़ी स्क्रीन उभर रही है। ब्रामांटे ने 1506 में सेंट पीटर्स बैसिलिका का नक्शा बनाया। 1514 में मरा। सिर्फ नींव देख सका। रफाएल ने 1514 में जिम्मा लिया। नक्शा बदला। 1520 में मरा। माइकल एंजेलो-1547 में आया। इकहत्तर साल का बूढ़ा। उसने वह गुंबद डिजाइन किया, जो आज रोम की पहचान है। माइकल एंजेलो ने भी गुंबद बनते नहीं देखा। 26 साल बाद जाकोमो देला पोर्ता ने पूरा किया। बर्निनी-1629 में आया। कॉलोनेड बनाया। सेंट पीटर्स बैसिलका चौक सजाया। आखिरी छुअन उसी की थी। 120 साल। चार दिग्गज। किसी ने पूरी इमारत नहीं देखी। हर एक ने अगले पर भरोसा किया कि सपना आगे बढ़ेगा। अब हम कोलोन, जर्मनी पहुंच रहे हैं। 1248। टाइम मशीन राइन नदी के किनारे उतर रही है। कोलोन कैथेड्रल का पहला पत्थर। कैथेड्रल का निर्माण शुरू हुआ 1248 में। रुका 1473 में। दक्षिणी मीनार पर एक विशाल लकड़ी की क्रेन खड़ी रह गई और चार सौ साल वहीं खड़ी रही। इतने साल तक कि कोलोन के नक्शों में क्रेन को लैंडमार्क की तरह दिखाया जाने लगा। पीढ़ियां पैदा हुईं और मरीं, जिन्होंने कैथेड्रल को सिर्फ इस नाम से जाना कि ‘वह अधूरा चर्च, जिसमें क्रेन लगी है।’ यह 1880 है। 632 साल बाद चर्च पूरा हुआ। कैसर विल्हेम प्रथम इसका उद्घाटन कर रहे हैं। यह इस वक्त दुनिया की सबसे ऊंची इमारत है। जिन कारीगरों ने 1248 में पहला पत्थर रखा, वे उस जर्मनी की कल्पना भी नहीं कर सकते थे, जिसने इसे पूरा किया। क्रेन हट रही है। मीनार पूरी हुई। 632 साल का इंतजार खत्म हुआ।
चलिए इसी यात्रा में अमेरिका और रूस भी हो आते हैं। सेंट पीटर्सबर्ग, रूस। 1818। जार अलेक्जेंडर प्रथम ने सेंट आइजैक कैथेड्रल बनवाने का हुक्म दिया है। तीन जार बदले। चार लाख मजदूरों ने काम किया। 43 तरह के पत्थर। गुंबद पर 100 किलो सोना। आर्किटेक्ट ओगस्त दे मॉन्फेरान ने 40 साल दिए। बस एक इच्छा थी कि मरने के बाद अपने चर्च में दफन हों। जार ने मना कर दिया-मॉन्फेरान कैथोलिक था, चर्च था ऑर्थोडॉक्स। जिसने चर्च बनाया, उसे ही उसमें आखिरी नींद का मौका नहीं मिलेगा। मॉन्फेरान उद्घाटन के एक महीने बाद मरा। शव पेरिस भेजा गया। और वह चर्च सोवियत काल में ‘नास्तिकता का संग्रहालय’ बन गया। अब हम वाशिंगटन में हैं। 1848। वह सामने वाशिंगटन मॉन्यूमेंट का शिलान्यास दिख रहा है। 1856 में पैसा खत्म। 156 फुट का अधूरा ठूंठ राजधानी के बीचोंबीच 25 साल खड़ा रहा। गृह युद्ध आया गया। लिंकन की हत्या हुई। पुनर्निर्माण का दौर गुजरा। ठूंठ खड़ा रहा। मार्क ट्वेन ने लिखा-‘यह स्मारक टूटी चिमनी जैसा लगता है।’ 1876 में काम दोबारा शुरू हुआ। 1884 में बनकर तैयार हुआ वाशिंगटन मॉन्यूमेंट। 21वीं सदी में यहां आने वाले यह देखते हैं कि स्मारक में एक-तिहाई ऊंचाई पर संगमरमर का रंग बदलता है, क्योंकि 25 साल में खदान बदल गई थी। दूसरा संगमरमर आया। रंग में फर्क था। टाइम मशीन बार्सिलोना वापस लौट रही है।
शाम हो रही है। सगारदा फमिलिया के ऊपर रोशनी का शो शुरू होने वाला है-गाउदी की याद में। कुछ चीजें बनाने वालों से बड़ी हो जाती हैं। कुछ सपने जिंदगियों से लंबे होते हैं। एंटोनी गाउदी ने कहा था-‘मेरा ग्राहक जल्दी में नहीं है।’ 143 साल बाद ग्राहक मुस्कुरा रहा है...
फिर मिलते हैं अगले सफर पर...