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जम्मू-कश्मीर : परिसीमन जरूरी है

Tue, 02 Jul 2019 05:06 AM IST
Raman Singh भीम सिंह
भीम सिंह Published by: Raman Singh Updated Tue, 02 Jul 2019 05:06 AM IST
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Jammu and Kashmir: Delimitation is essential
jammu and kashmir - फोटो : Demo Pic.

यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि कुछ मीडिया एजेंसियां जम्मू-कश्मीर के मामले में गुमराह करने का काम कर रही हैं। विगत 21 जून को एक एजेंसी ने श्रीनगर से भ्रामक व मनगढ़ंत वक्तव्य जारी किया, जिस पर विश्वास नहीं किया जा सकता। उसने कहा कि जम्मू-कश्मीर के कानून विभाग से परिसीमन करवाने का निर्णय राज्य विधानसभा चुनाव से पहले रोका जाए, जो कि एक साजिश भरी कहानी है। इस प्रायोजित कहानी की राज्य के तीन क्षेत्रों के बीच विधानसभा सीटों के वितरण के बारे में भी गलत धारणा है। तथ्य यह है कि विधानसभा सीटें आबादी और क्षेत्र के साथ-साथ इलाके के अनुसार वितरित की जाती हैं। वर्तमान में जम्मू-कश्मीर में कुल 87 सीटें हैं। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार, लद्दाख में चार विधानसभा सीटें हैं, जिनकी जनसंख्या 2,74,289 है।


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दिलचस्प बात यह है कि वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार कश्मीर क्षेत्र की जनसंख्या 68,88,475 और जम्मू की आबादी 53,78,538 बताई गई है। जबकि वर्ष 2001 की जनगणना में कश्मीर क्षेत्र की जनसंख्या 55,14,092 और जम्मू की 44,30,191 थी। दस साल में कश्मीर घाटी की आबादी में 13,74,383 की बढ़ोतरी अपने आप में बेहद आश्चर्यजनक है और इससे सवाल खड़े होते हैं कि आखिर यह कैसे संभव है। वास्तविकता यह है कि दस साल की उस अवधि में तमाम कारण घाटी की आबादी में गिरावट आने की ही बात करते हैं।

उदाहरण के लिए, वर्ष 1990-91 में लगभग पांच लाख कश्मीरी पंडित आतंकवादी हिंसा और उन्हें निशाना बनाए जाने के कारण दहशत में घाटी छोड़कर चले गए। इसके अलावा अनेक गैर-पंडित यानी हिंदू और मुसलमान जम्मू प्रांत और घाटी से पलायन कर गए, क्योंकि बीती सदी के नब्बे के दशक में आतंकवाद का चरम था। यह भी तथ्य है कि इस दौरान लगभग पंद्रह लाख मुस्लिम कश्मीर छोड़कर देश के दूसरे क्षेत्रों में चले गए। जाहिर है, कश्मीर घाटी की जनसंख्या कम हो गई थी, जिसे 2011 की जनगणना में दर्ज किया जाना चाहिए था। जम्मू-कश्मीर की तत्कालीन सरकार ने धोखाधड़ी की और फर्जी रिकॉर्ड बनाने के लिए प्रशासन का उपयोग किया।

उस दौरान कई हजारों युवाओं ने अवैध रूप से कश्मीर से पाकिस्तान पलायन किया था, जो रिकॉर्ड में है और जिसे छिपाया नहीं जा सकता था। यही कारण है कि कश्मीर के कुछ पूर्व शासकों ने राष्ट्रीय नेतृत्व भाजपा के साथ एक फर्जी गठबंधन किया, जिसके कारण कश्मीर घाटी से लोकसभा की तीन अन्य सीटों को छोड़कर सभी तीन सीटें- जम्मू प्रांत से दो और लद्दाख से एक सीट पर सत्तारूढ़ भाजपा जीती है। यह एक साजिश है, जिसका राष्ट्रीय हित में पता लगाना चाहिए था। जो लोग भारतीय राष्ट्रवाद, कानून और धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र के शासन में विश्वास करते हैं, उन्हें तो खासकर जम्मू-कश्मीर की इस सच्चाई के बारे में जानना चाहिए।

 जाहिर है, सूबे में परिसीमन की तत्काल आवश्यकता है, जो 1995 के बाद से हुआ ही नहीं है। 25 साल हो गए हैं तथा परिसीमन 10 साल या उससे अधिक के लिए लटकाने का कोई कारण नहीं है। राष्ट्रीय एकता के लिए सभी सार्वभौमिक कानूनों व नियमों को जम्मू-कश्मीर में भी लागू करने की तत्काल आवश्यकता है, जो देश के सभी राज्यों में लागू होते हैं। देश के सभी राज्यों पर लागू मौलिक अधिकार जम्मू-कश्मीर में रहने वाले सभी भारतीय नागरिकों पर भी लागू हों। इसलिए जम्मू-कश्मीर में रहने वाले प्रत्येक भारतीय नागरिक को सभी मौलिक अधिकारों के साथ एक संविधान और एक ध्वज लागू करना समय की जरूरत है।

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