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न्याय और नैतिकता: वही व्यवस्था विश्वसनीय न्याय प्रदान कर सकती है, जिस पर समाज को न्यायपूर्ण होने का भरोसा हो
Fri, 14 Aug 2026 10:26 AM IST
ज्योति भास्कर
अमर उजाला, नई दिल्ली।
अमर उजाला, नई दिल्ली।
Published by: ज्योति भास्कर
Updated Fri, 14 Aug 2026 10:26 AM IST
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जस्टिस यशवंत वर्मा पर लगे आरोप बेहद गंभीर (फाइल)
- फोटो : अमर उजाला
संसद की जांच समिति द्वारा स्वतंत्रता दिवस के ठीक पहले दिल्ली हाईकोर्ट के तत्कालीन न्यायाधीश यशवंत वर्मा के सरकारी आवास से बड़ी मात्रा में जली हुई नकदी मिलने के मामले में उनके विरुद्ध लगाए गए तीनों आरोपों को सही ठहराया जाना भारतीय न्याय व्यवस्था की नैतिक विश्वसनीयता से जुड़ा ऐसा प्रसंग है, जो हमें यह सोचने के लिए विवश करता है कि आखिर हम अपनी न्याय प्रणाली को किस दिशा में ले जा रहे हैं।
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दरअसल, न्यायपालिका से अपेक्षा इसलिए अधिक होती है, क्योंकि लोकतंत्र की बाकी संस्थाओं पर निगरानी रखने वाली अंतिम नैतिक शक्ति वही मानी जाती है। पर, जब उसके ही किसी सदस्य के आचरण पर सवाल उठते हैं, तो चोट पूरी व्यवस्था की प्रतिष्ठा व भरोसे पर पड़ती है।
उल्लेखनीय है कि पिछले वर्ष मार्च में यह मामला सामने आने के बाद जस्टिस वर्मा को उनके मूल उच्च न्यायालय इलाहाबाद भेज दिया गया था। उन्हें हटाने के प्रस्ताव पर दो सौ से भी अधिक सांसदों के हस्ताक्षर करने के बाद लोकसभाध्यक्ष ने तीन सदस्यीय जांच समिति गठित की थी।
समिति की रिपोर्ट से साफ है कि जस्टिस वर्मा नकदी की मौजूदगी के कारणों को स्पष्ट नहीं कर पाए, साक्ष्यों को सुरक्षित नहीं रखा जा सका और उनके स्पष्टीकरण भी संतोषजनक नहीं पाए गए। यह पूरा घटनाक्रम इसलिए अधिक चिंताजनक है, क्योंकि न्यायाधीश के आचरण से जुड़ा कोई गंभीर प्रश्न अंतत: न्याय की विश्वसनीयता का प्रश्न बन जाता है। यही वजह है कि इस मामले को केवल आरोपों, सफाई और पक्ष-विपक्ष में दिए जा सकने वाले तर्कों तक सीमित करना उचित नहीं होगा।
अदालत में किसी तथ्य को साबित करने के लिए तर्क व साक्ष्य जरूरी होते हैं, पर सिर्फ तर्कों से अनैतिकता को न्यायपूर्ण साबित नहीं किया जा सकता। नैतिक आचरण की कसौटी इससे कहीं अधिक ऊंची होती है। इसीलिए यदि मामला न्यायिक पद की गरिमा का हो, तो यह केवल न्यायिक फैसलों से नहीं, बल्कि पद पर बैठे व्यक्ति के सार्वजनिक व निजी आचरण से भी तय होती है।
अब संसद के शीतकालीन सत्र में उनके खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया आगे बढ़ने की चर्चा है, लेकिन इसमें प्रक्रियात्मक जटिलताएं भी हैं। न्याय व्यवस्था पर विश्वास लोकतंत्र की अंतिम पूंजी है। ऐसे में, इस मामले की सबसे बड़ी सीख यही होनी चाहिए कि न्यायाधीशों की स्वतंत्रता सुरक्षित रहे, लेकिन गंभीर नैतिक उल्लंघनों पर कार्रवाई भी अस्पष्टता और प्रक्रियाओं में न उलझे। आखिर वही व्यवस्था विश्वसनीय ढंग से न्याय प्रदान कर सकती है, जिस पर समाज को न्यायपूर्ण होने का भरोसा हो।