Radio History: तरंगों के जरिये आजादी की अलख, स्वतंत्रता की लड़ाई में कैसे रेडिययो ने अलग मोर्चा खोल दिया था?
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विस्तार
भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में रेडियो सिर्फ मनोरंजन या समाचार का माध्यम नहीं था, बल्कि अंग्रेजी शासन के खिलाफ संदेश पहुंचाने का एक महत्वपूर्ण जरिया बन गया था। दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान भारत में आजादी की लड़ाई निर्णायक दौर में पहुंच चुकी थी। देश के अंदर महात्मा गांधी के नेतृत्व में भारत छोड़ो आंदोलन चल रहा था, जबकि विदेश में नेताजी सुभाष चंद्र बोस अंग्रेजों के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष को आगे बढ़ा रहे थे। ऐसे समय में रेडियो ने सीमित संसाधनों के बावजूद देश और विदेश दोनों जगह आजादी की आवाज पहुंचाई।
भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान कांग्रेस रेडियो क्यों शुरू किया गया?
मुंबई में नौ अगस्त 1942 को महात्मा गांधी ने ‘करो या मरो’ का संदेश दिया। इससे एक दिन पहले कांग्रेस कार्यसमिति ने भारत छोड़ो प्रस्ताव पारित किया था। प्रस्ताव के बाद ब्रिटिश सरकार ने कांग्रेस के बड़े नेताओं को गिरफ्तार कर लिया। ऐसे माहौल में लोगों तक आंदोलन से जुड़े संदेश पहुंचाना मुश्किल हो गया था। अखबारों और पत्रिकाओं पर भी दबाव था। इसी जरूरत के बीच भूमिगत रेडियो प्रसारण शुरू करने का विचार सामने आया। 14 अगस्त 1942 की एक बैठक में रेडियो के जरिए संदेश प्रसारित करने पर सहमति बनी।
कांग्रेस रेडियो की शुरुआत कैसे हुई?
इस रेडियो को ‘रेडियो फ्री वायस’ नाम दिया गया, जिसे आगे कांग्रेस रेडियो के नाम से जाना गया। डॉ. राममनोहर लोहिया और उषा मेहता इसके पीछे प्रमुख लोगों में थे। नरीमन प्रिंटर को ट्रांसमीटर चलाने का अनुभव था और उन्होंने इसकी तकनीकी जिम्मेदारी संभाली। 27 अगस्त 1942 की शाम मुंबई के चौपाटी स्थित सी व्यू बिल्डिंग के किराये के कमरे से कांग्रेस रेडियो का पहला प्रसारण हुआ। उषा मेहता इसकी प्रमुख आवाज और प्रस्तोता बनीं। प्रसारण के जरिए गांधी, नेहरू और पटेल के संदेशों के साथ स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े कार्यक्रम लोगों तक पहुंचाए गए।
कांग्रेस रेडियो पर क्या प्रसारित किया जाता था?
कांग्रेस रेडियो पर सिर्फ नेताओं के भाषण नहीं सुनाए जाते थे। गोपाल कृष्ण गोखले, लाला लाजपत राय और बाल गंगाधर तिलक जैसे नेताओं के भाषणों पर आधारित समाचार कथाएं और कार्यक्रम भी प्रसारित किए जाते थे। उषा मेहता इन कार्यक्रमों की प्रस्तोता और निर्माता थीं। डॉ. राममनोहर लोहिया, अच्युत पटवर्धन और पुरुषोत्तम त्रिविक्रम समेत कई लोगों ने उन्हें सहयोग दिया। भूमिगत तरीके से चलने वाला यह प्रसारण अंग्रेजी सरकार की सेंसरशिप के बीच आंदोलन की खबर और संदेश लोगों तक पहुंचाने का माध्यम बन गया।
अंग्रेजों ने कांग्रेस रेडियो को कैसे बंद किया?
कांग्रेस रेडियो लंबे समय तक अंग्रेजी सरकार की नजरों से बच नहीं सका। 12 नवंबर 1942 को इसका ट्रांसमीटर जब विट्ठल राव पटवर्धन नासिक लेकर जा रहे थे, तभी पुलिस ने उसे पकड़ लिया। इसके साथ ही कांग्रेस रेडियो का भूमिगत प्रसारण बंद हो गया। हालांकि, इस छोटे से दौर में रेडियो ने भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान लोगों का मनोबल बनाए रखने और आंदोलन से जुड़े संदेशों को आगे बढ़ाने में भूमिका निभाई।
आजाद हिंद रेडियो कांग्रेस रेडियो से कितना अलग था?
कांग्रेस रेडियो जहां भारत के अंदर भूमिगत तरीके से चलाया जा रहा था, वहीं आजाद हिंद रेडियो भारत के बाहर से आजादी की आवाज पहुंचा रहा था। नेताजी सुभाष चंद्र बोस के निर्देशन में जर्मनी की राजधानी बर्लिन में आजाद हिंद रेडियो की स्थापना हुई। इसका प्रसारण कांग्रेस रेडियो से पहले सात जनवरी 1942 को ही शुरू हो चुका था। जब नेताजी जर्मनी में रहे, तब इसका मुख्यालय वहीं रहा। बाद में पूर्वी एशिया जाने पर इसका मुख्यालय पहले सिंगापुर और फिर म्यांमार स्थानांतरित किया गया।
नेताजी ने आजाद हिंद रेडियो से भारतीयों तक क्या संदेश पहुंचाया?
आजाद हिंद रेडियो के जरिए नेताजी ने अंग्रेजी शासन के खिलाफ संघर्ष का संदेश फैलाया। 23 अक्तूबर 1942 को इसी रेडियो के माध्यम से उन्होंने ब्रिटिश सरकार के खिलाफ युद्ध का ऐलान किया था। इस रेडियो का एक बड़ा उद्देश्य भारत से बाहर मौजूद भारतीयों और उन सैनिकों तक स्वतंत्रता आंदोलन की आवाज पहुंचाना था, जो अंग्रेजी सरकार की ओर से लड़ रहे थे। इस तरह रेडियो भारत के बाहर भी स्वतंत्रता आंदोलन के लिए समर्थन जुटाने का माध्यम बना।
क्या स्वतंत्रता आंदोलन में रेडियो की भूमिका सिर्फ संदेश पहुंचाने तक सीमित थी?
रेडियो की भूमिका केवल सूचना देने तक सीमित नहीं रही। भारत के अंदर कांग्रेस रेडियो ने उस समय लोगों तक आंदोलन के संदेश पहुंचाए, जब अंग्रेजी सरकार बड़े नेताओं को गिरफ्तार कर चुकी थी। दूसरी ओर आजाद हिंद रेडियो ने भारत से बाहर भारतीयों और सैनिकों को स्वतंत्रता आंदोलन से जोड़ने का काम किया। दोनों रेडियो की परिस्थितियां अलग थीं, लेकिन उद्देश्य एक ही था—अंग्रेजी शासन के खिलाफ स्वतंत्रता की भावना को मजबूत करना। इसी वजह से भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में रेडियो की भूमिका विशेष महत्व रखती है।