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एफसीआरए और कुछ गंभीर सवाल: कानून सबसे ऊपर... क्या राष्ट्रीय हित की रक्षा, विदेशी असर पर अंकुश लगाना है लक्ष्य?

Thu, 13 Aug 2026 04:48 AM IST
Harbansh Dixit हरबंश दीक्षित
Updated Thu, 13 Aug 2026 04:48 AM IST
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सार
एफसीआरए संशोधन के प्रस्ताव ने कुछ गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं, जिन पर विचार किया जाना चाहिए। राष्ट्रीय हित की रक्षा व विदेशी आर्थिक प्रभाव को नियंत्रित करते हुए विधि के शासन की सर्वोच्चता सुनिश्चित करना ही इस पूरे विमर्श का सार है।
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FCRA and some serious questions law paramount goal to safeguard national interest and curb foreign influence
एफसीआरए को लेकर नियमों में बदलाव की तैयारी - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

विदेशी अंशदान को लेकर भारत में बहस नई नहीं है। विदेशी धन सामाजिक सेवा, शिक्षा, स्वास्थ्य, राहत और धार्मिक गतिविधियों के लिए उपयोगी संसाधन उपलब्ध कराता है, किंतु उसके साथ विदेशी प्रभाव, राजनीतिक हस्तक्षेप और राष्ट्रीय हितों पर संभावित प्रभाव की चिंता भी जुड़ी रहती है। इसी संतुलन के लिए विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 विगत मार्च में लोकसभा में प्रस्तुत किया गया। इसका प्रमुख उद्देश्य ऐसी स्थिति में विदेशी अंशदान और उससे निर्मित परिसंपत्तियों के संबंध में स्पष्ट व्यवस्था करना है, जब किसी संस्था का एफसीआरए प्रमाणपत्र रद्द, समर्पित अथवा समाप्त हो जाए।



विधेयक के प्रस्ताव ने कुछ गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं। मसलन, क्या एफसीआरए प्रमाणपत्र समाप्त होने पर विदेशी अंशदान से वर्षों पहले निर्मित परिसंपत्तियां भी सरकारी नियंत्रण में चली जाएंगी? यदि किसी परिसंपत्ति का निर्माण विदेशी और घरेलू, दोनों धन से हुआ हो, तो उसका क्या होगा? क्या नामित प्राधिकारी को परिसंपत्तियों के प्रबंधन और निस्तारण की व्यापक शक्ति अत्यधिक कार्यपालिका-विवेक को जन्म नहीं देगी? यदि प्रमाणपत्र के नवीनीकरण से इन्कार कर दिया जाए, तो क्या संस्था को पर्याप्त सुनवाई और प्रभावी अपील का अवसर मिलेगा? इन्हीं प्रश्नों के आधार पर अनुच्छेद 14, 19, 21, 25, 26 और 300(ए) के उल्लंघन की आशंकाएं व्यक्त की जा रही हैं। विपक्ष के विरोध के बीच, केंद्र सरकार ने एफसीआरए विधेयक को संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) के पास भेज दिया है।


सर्वोच्च न्यायालय ने नोएल हार्पर बनाम भारत संघ (2022) में कहा कि विदेशी अंशदान प्राप्त करना कोई पूर्ण या निरपेक्ष मौलिक अधिकार नहीं है। संसद विदेशी अंशदान के प्रवेश, उपयोग और प्रवाह को राष्ट्रीय हित में नियंत्रित कर सकती है। अनुच्छेद 19(1)(सी) नागरिकों को संघ अथवा संगठन बनाने का अधिकार देता है, किंतु इससे किसी संस्था को विदेशी स्रोत से धन पाने का असीमित अधिकार नहीं मिलता। कोई संस्था अपना सामाजिक, धार्मिक, शैक्षणिक अथवा परोपकारी कार्य जारी रख सकती है, लेकिन विदेशी धन प्राप्त करना वैधानिक शर्तों के अधीन है। इसी प्रकार इंडियन सोशल एक्शन फोरम बनाम भारत संघ (2020) में सर्वोच्च न्यायालय ने विदेशी अंशदान के राजनीतिक प्रभाव को नियंत्रित करने को वैध माना। साथ ही, यह भी स्पष्ट किया कि सामाजिक व आर्थिक कल्याण के लिए काम करने वाली संस्थाओं को मात्र राजनीतिक गतिविधियों से जोड़कर विदेशी अंशदान से वंचित नहीं किया जा सकता। इस प्रकार न्यायिक दृष्टिकोण ने राष्ट्रीय हित और नागरिक समाज की वैध स्वतंत्रता के बीच संतुलन स्थापित किया। अनुच्छेद 19(4) के मुताबिक, भारत की संप्रभुता और अखंडता, लोक-व्यवस्था तथा नैतिकता के हित में संघ बनाने की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। नोएल हार्पर मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने एफसीआरए के कठोर नियामक ढांचे को इसी व्यापक दृष्टि से स्वीकार किया।

अब परिसंपत्तियों के प्रश्न पर विचार करें। यदि किसी संस्था को विदेशी अंशदान प्राप्त करने की वैधानिक अनुमति समाप्त हो गई है, तो उस अंशदान और उससे निर्मित परिसंपत्तियों की नियामक स्थिति को पूरी तरह अनिश्चित छोड़ देना भी व्यवस्था को अधूरा बना देगा। इसलिए, विधेयक में नामित प्राधिकारी के माध्यम से ऐसी परिसंपत्तियों के संबंध में व्यवस्था प्रस्तावित की गई है। महत्वपूर्ण यह है कि इसे तत्काल और अपरिवर्तनीय अधिग्रहण के रूप में देखना उचित नहीं होगा। प्रस्तावित व्यवस्था में संपत्ति के अस्थायी निहितीकरण की अवधारणा है। यदि संस्था निर्धारित अवधि में नया प्रमाणपत्र प्राप्त कर लेती है या उसका प्रमाणपत्र नवीनीकृत या पुनर्स्थापित हो जाता है, तो परिसंपत्तियों और अप्रयुक्त विदेशी अंशदान की वापसी की व्यवस्था है। स्थायी निहितीकरण बाद की अवस्था में आता है।

मिश्रित वित्तपोषण वाली परिसंपत्तियों के संबंध में भी सावधानी आवश्यक है। विधेयक विदेशी अंशदान से पूरी या आंशिक रूप से निर्मित परिसंपत्तियों को अपने दायरे में रखता है। इसलिए, यह कहना कि विदेशी धन का कोई अंश लगते ही संस्था की संपूर्ण संपत्ति स्वतः सरकार की हो जाएगी, विधेयक की वास्तविक संरचना का सरलीकरण होगा। वास्तविक सांविधानिक प्रश्न यह होगा कि ऐसी परिसंपत्तियों के संबंध में प्रक्रिया स्पष्ट, न्यायपूर्ण और अनुपातिक है या नहीं।

अनुच्छेद 300(ए) के संदर्भ में भी यही कसौटी लागू होगी। संपत्ति से वंचित करना केवल विधि के प्राधिकार से संभव है। यहां संसद स्वयं वैधानिक आधार और प्रक्रिया निर्मित कर रही है। इसलिए परीक्षण यह होगा कि कानून का उद्देश्य वैध है या नहीं, प्रक्रिया न्यायपूर्ण है या नहीं और शक्ति का प्रयोग मनमाना तो नहीं है। केवल निहितीकरण की व्यवस्था होना अपने आप अनुच्छेद 300(ए) का उल्लंघन सिद्ध नहीं करता। संविधान के अनुच्छेद 14 के उल्लंघन की आपत्ति का भी यही उत्तर है। प्रस्तावित व्यवस्था धर्म, जाति या विचारधारा के आधार पर भेद नहीं करती; इसकी कसौटी एफसीआरए प्रमाणपत्र और विदेशी अंशदान से संबंधित है। विदेशी स्रोत से प्राप्त धन को घरेलू धन से अलग नियामक श्रेणी में रखना तर्कसंगत है, क्योंकि उनके स्रोत और संभावित प्रभाव भिन्न हो सकते हैं। नोएल हार्पर मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने एफसीआरए के कठोर नियमन को मनमाना या भेदभावपूर्ण नहीं माना।

धार्मिक संस्थाओं के संदर्भ में संविधान का अनुच्छेद 25 और 26 अवश्य महत्वपूर्ण हैं, किंतु धार्मिक स्वतंत्रता भी वित्तीय नियमन से पूर्णतः मुक्त नहीं है। यदि कानून का उद्देश्य धार्मिक आस्था या उपासना को नियंत्रित करना न होकर विदेशी अंशदान का नियमन है, तो मात्र किसी धार्मिक संस्था पर लागू होने से वह अनुच्छेद 25 या 26 का उल्लंघन नहीं बन जाता। प्रस्तावित व्यवस्था में यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया गया है कि स्थायी रूप से निहित ऐसी परिसंपत्ति, जो उपासना-स्थल है, उसके धार्मिक चरित्र को बनाए रखा जाए।

वास्तविक प्रश्न यह है कि भारत जैसा संप्रभु लोकतांत्रिक गणराज्य अपने सामाजिक क्षेत्र में विदेशी आर्थिक प्रभाव को किस सीमा तक स्वीकार करे और किस प्रकार उसकी निगरानी करे। इस पूरे विमर्श का सार है-राष्ट्रीय हित की रक्षा करते हुए नागरिक समाज की वैध स्वतंत्रता का सम्मान, विदेशी आर्थिक प्रभाव को नियंत्रित करते हुए विधि के शासन की सर्वोच्चता और नियमन की शक्ति के साथ न्यायपूर्ण प्रक्रिया की अनिवार्यता सुनिश्चित करना।

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