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तस्वीर का दूसरा पहलू: युवाओं की बेरोजगारी घटी, लेकिन ग्रेजुएट नौकरी के लिए अब भी परेशान; क्या है बड़ी चुनौती?
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बेरोजगारी
- फोटो :
PTI
विस्तार
सबसे पहले, अच्छी खबर। 10 अगस्त, 2026 को सरकार ने संसद में बताया कि 15-29 साल के युवाओं में राष्ट्रीय बेरोजगारी दर 2022 के 10.9 प्रतिशत से घटकर 2025 में 9.9 प्रतिशत हो गई है। इसी उम्र के वर्ग के लिए काम करने वाली आबादी का अनुपात भी बढ़ा है। ये मुख्य आंकड़े बताते हैं कि भारतीय युवाओं के लिए श्रम बाजार में कुछ सुधार हुआ है।अब बुरी खबर। सबसे गंभीर और लंबे समय से बनी हुई समस्याओं में ग्रेजुएट बेरोजगारी प्रमुख है। अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी के ‘सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ इंडियन इकॉनमी’ की स्कॉलर रोजा अब्राहम और कृष्णा प्रिया ने ‘द इंडिया फोरम’ के लिए हाल में किए गए अपने विश्लेषण द फेल्ड प्रॉमिस ऑफ हायर एजुकेशन में कहा है कि करीब चार दशकों से भारतीय परिवार इस उम्मीद में उच्च शिक्षा पर भारी खर्च करते आए हैं कि डिग्री के बाद सुरक्षित और अच्छी वेतन वाली नौकरी मिलेगी। लेकिन, अब यह उम्मीद पूरी करना मुश्किल होता जा रहा है। ग्रेजुएट की कमाई जहां ठहरी हुई है, वहीं सैलरी वाली नौकरियों के अवसर भी घट रहे हैं। ऐसे में, माता-पिता और युवा स्नातक के सामने एक कठिन सवाल है कि क्या वे ऐसी सैलरी वाली नौकरी का इंतजार करें, जो उनकी पढ़ाई में लगाए गए वर्षों के निवेश को सही साबित कर सके और अगर करें, तो आखिर कितने समय तक? या फिर उन्हें जो भी काम मिले उसे स्वीकार कर लेना चाहिए, भले ही वह उनकी उम्मीदों से बहुत कम हो?
2004-05 और 2023 के बीच, हर साल लगभग 50 लाख नए ग्रेजुएट जुड़ते गए, लेकिन इनमें से केवल 28 लाख को ही रोजगार मिल सका। इससे ग्रेजुएट बेरोजगारी बढ़ी है और कमाई में बढ़ोतरी की रफ्तार धीमी हुई है। ये नतीजे अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी की स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया 2026 रिपोर्ट से मिले हैं, जो इस विश्लेषण का आधार है। देशभर में उच्च शिक्षा संस्थानों का विस्तार समान रूप से नहीं हुआ है और आज भी राज्यों के बीच बड़ा क्षेत्रीय अंतर बना हुआ है। किसी जिले में प्रति एक लाख युवा आबादी पर उपलब्ध कॉलेजों की संख्या (कॉलेज डेंसिटी) 2010 में 29 थी, जो 2021 में बढ़कर 45 हो गई। मध्य प्रदेश, गुजरात व राजस्थान जैसे मध्य और पश्चिमी राज्यों ने दक्षिणी राज्यों की तुलना में अपनी कमी काफी हद तक दूर कर ली है और अब वहां प्रति व्यक्ति संस्थानों की उपलब्धता लगभग समान स्तर पर पहुंच गई है। हालांकि, रिपोर्ट के अनुसार, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल जैसे पूर्वी राज्यों में देश के बाकी हिस्सों की तुलना में उच्च शिक्षा संस्थानों की उपलब्धता अब भी कम है। रिपोर्ट यह भी बताती है कि 2000 के दशक के बाद आईटीआई की संख्या बढ़ाने की कीमत उनकी गुणवत्ता को चुकानी पड़ी है। हाल के दशकों में आईटीआई की गुणवत्ता रैंकिंग में गिरावट आई है। नए खुले आईटीआई मानकों और गुणवत्ता के दूसरे पैमानों पर भी अपेक्षाकृत खराब प्रदर्शन करते हैं। शिक्षित युवाओं की आपूर्ति और उपयुक्त नौकरियों की उपलब्धता के बीच का असंतुलन बढ़ती निराशा की मुख्य वजह है। इसमें कौशल की कमी को भी जोड़ लें। कई युवाओं के पास डिग्रियां तो हैं, लेकिन वे कौशल नहीं हैं, जिनकी जरूरत है।
हाल में परीक्षाओं में अनियमितताओं और पेपर लीक के खिलाफ शुरू हुए युवाओं के विरोध प्रदर्शन धीरे-धीरे शिक्षा व्यवस्था और श्रम बाजार से बढ़ती निराशा की व्यापक अभिव्यक्ति बन गए। युवाओं को लगने लगा है कि ये व्यवस्थाएं अब अपने वादे पूरे करने में सक्षम नहीं हैं। दूसरी ओर, शिक्षा पर सरकारी खर्च में बढ़ोतरी हुई है। हालांकि, लंबी अवधि की चुनौती केवल यह देखना नहीं है कि हर साल शिक्षा के लिए बजट बढ़ रहा है या नहीं। महंगाई, बढ़ती आबादी, राज्यों की अलग-अलग क्षमता और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के विस्तार की लागत को देखते हुए सार्वजनिक निवेश का हिस्सा और उसकी प्रभावशीलता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है, जितनी कुल राशि में बढ़ोतरी। हो सकता है कि भारत शिक्षा पर अधिक खर्च कर रहा हो, लेकिन अगर देश की जरूरतों के मुताबिक शिक्षा को पर्याप्त प्राथमिकता नहीं दी जाती, तो व्यवस्था से मिलने वाले नतीजे असमान ही बने रहेंगे।
अमीर परिवार का छात्र अच्छे निजी स्कूल, महंगी कोचिंग, प्रतियोगी परीक्षाओं में बार-बार कोशिश, शिक्षा के बड़े केंद्रों में रहना, बिना या कम वेतन वाली इंटर्नशिप, लैपटॉप, भरोसेमंद इंटरनेट और एआई टूल्स का खर्च उठा सकता है। और, बेरोजगारी के दौर में आर्थिक सहारा भी पा सकता है। गरीब या निचले-मध्यमवर्गीय परिवार का छात्र अक्सर ऐसा नहीं कर पाता। उसके लिए एक परीक्षा में असफल होने का मतलब हो सकता है कि परिवार पर एक और साल का कर्ज चढ़ जाए। एक पेपर रद्द होने का मतलब हो सकता है कि एक साल की कमाई का नुकसान हो जाए। एक महंगे निजी कॉलेज का खर्च न उठा पाने का मतलब हो सकता है कि उच्च शिक्षा का सपना ही खत्म हो जाए। इसीलिए, शिक्षा और रोजगार का संकट असल में वर्ग और जाति से भी जुड़ा है।
2021-22 के ऑल इंडिया सर्वे ऑन हायर एजुकेशन (एआईएसएचई) के आंकड़ों के अनुसार, सरकारी विश्वविद्यालय कुल विश्वविद्यालयों का 58.6 प्रतिशत थे, पर कुल नामांकन में उनकी हिस्सेदारी 73.7 प्रतिशत थी। ऐसे में, सरकारी उच्च शिक्षा को कमजोर करने का सबसे ज्यादा असर आम छात्रों पर पड़ेगा। जैसा कि स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया 2026 रिपोर्ट और उससे जुड़े विश्लेषक चेतावनी देते हैं, संस्थानों की गुणवत्ता और रोजगार के अवसरों में सुधार किए बिना उच्च शिक्षा का विस्तार असमानता बढ़ा सकता है, और पिछड़े समूहों को अपनी डिग्री से मिलने वाले फायदों में बहुत ज्यादा नुकसान उठाना पड़ सकता है। परीक्षा प्रणाली एक राष्ट्रीय प्रेशर कुकर बन गई है। लाखों युवाओं के लिए, एक परीक्षा यह तय कर सकती है कि उन्हें मेडिकल, इंजीनियरिंग, सरकारी नौकरी, टीचिंग या प्रोफेशनल एजुकेशन मिलेगी या नहीं। जब वैकेंसी कम होती हैं, तो प्रतिस्पर्धा बहुत ज्यादा हो जाती है। जब परीक्षा प्रक्रिया रद्द होने, गड़बड़ी या पेपर लीक के चलते फेल हो जाती है, तो इसके नतीजे बहुत बुरे होते हैं और लोगों का भरोसा टूटता है।
बेरोजगारी के आंकड़ों में सुधार निश्चित रूप से स्वागतयोग्य है। लेकिन, यह स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया 2026 रिपोर्ट में सामने आई ग्रेजुएट बेरोजगारी की संरचनात्मक चुनौती को छिपा नहीं सकता। जब तक उच्च शिक्षा के तेजी से विस्तार के साथ अच्छी गुणवत्ता वाली नौकरियां भी नहीं बढ़तीं, तब तक बड़ी संख्या में शिक्षित युवा अपने परिवारों के निवेश और अर्थव्यवस्था से मिलने वाले अवसरों के बीच एक दर्दनाक अंतर का सामना करते रहेंगे। यह देश के सामने विकास की मुख्य चुनौतियों में से एक बना हुआ है।