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मुद्दा: मानसून का बदलना अब एक स्थायी संकट, जलवायु परिवर्तन की कहानी भी छिपी
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जलवायु परिवर्तन, संकट की आहट।
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अमर उजाला प्रिंट
विस्तार
मजबूत होते अल-नीनो के कारण सामान्य से कम बारिश के अनुमान के बावजूद, जुलाई में बारिश का लक्ष्य पार हो गया। वहीं, गुजरात से लेकर असम तक इस साल फिर बरसात के मौसम ने तबाही मचा दी। मानसूनी बारिश और नदियों का जलस्तर बढ़ने से बाढ़ के कारण असम, गुजरात, केरल, कर्नाटक, ओडिशा और जम्मू-कश्मीर जैसे राज्यों में लाखों लोग प्रभावित हुए हैं और जनजीवन अस्त-व्यस्त हो गया है। दूसरी तरफ झारखंड सूखे की मार से जूझ रहा है। इससे यह साफ हो गया है कि जलवायु परिवर्तन भारत के मानसून को बदल रहा है। असम, महाराष्ट्र, गुजरात और हिमाचल प्रदेश जैसे इलाकों में बादल फटने की जानलेवा घटनाओं, शहरों में जल-जमाव और भूस्खलन का सिलसिला जारी रहा है।
अगस्त और सितंबर, 2025 में, पूर्वी पाकिस्तान और उत्तरी भारत के कुछ हिस्सों में बड़े पैमाने पर बाढ़ आई थी। यह बाढ़ मुख्य रूप से भारत के हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर के पहाड़ी इलाकों में हुई भारी मानसूनी बारिश के कारण आई थी। इसके बाद अचानक आई बाढ़ (फ्लैश फ्लड) की वजह से भारतीय अधिकारियों को भारत और पाकिस्तान, दोनों के पंजाब में बहने वाली कई नदियों पर बने बांध खोलने पड़े, जिससे निचले इलाकों में बड़े पैमाने पर बाढ़ आ गई। पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में 1,400 से अधिक गांव बाढ़ की चपेट में आ गए, और भारत के पंजाब राज्य में भी 1,400 गांव प्रभावित हुए।
इस साल भी पिछले साल की तरह ही इस मानसून में बादल फटने की नौ घटनाएं, अचानक बाढ़ की 19 घटनाएं सामने आई हैं। बादल फटने से प्रभावित चार बड़े इलाकों में 120 सड़कें बंद हो गई हैं और पीने के पानी की आपूर्ति बाधित हुई है। जम्मू-कश्मीर में भूस्खलन और अचानक आई बाढ़ के कारण लोगों और पर्यटकों को यात्रा न करने की सलाह दी गई है। हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर जैसे उत्तरी राज्यों में लगभग हर साल ही अचानक आने वाली बाढ़ और बादल फटने की घटनाएं होती रहती हैं। दूसरी तरफ, झारखंड में मानसून में 40-79 फीसदी की कमी के चलते खरीफ फसलों की बुआई और रोपाई पर असर पड़ा है। बारिश कम होने से धान और दूसरी फसलों के उत्पादन में कमी आ सकती है। ऐसे में, सरकार ने किसानों को बाजरा बोने की सलाह दी है।
वैज्ञानिकों के अनुसार, जलवायु परिवर्तन की वजह से गर्मी हद पार करती जा रही है। साथ ही, वातावरण में नमी बेहिसाब ढंग से बढ़ रही है। ऐसे में, मौसम का अंदाज बदल रहा है। पहले गर्मियों में तेज लू चलती थी। पसीना आता था, लेकिन जल्दी सूख जाता था। अब गर्मी के साथ उमस भी बढ़ गई है, जिससे शरीर को ज्यादा घुटन और बेचैनी महसूस होती है। अब पसीना सूखता नहीं और न ही शरीर ठंडा होता है। विशेषज्ञों के मुताबिक, पहले मानसून में कई दिनों तक हल्की या मध्यम बारिश होती थी। अब स्थिति बदल रही है। बारिश वाले दिनों की संख्या घट रही है, पर जब बारिश होती है, तो बहुत कम समय में अत्यधिक मात्रा में पानी बरसता है। इसका कारण गर्म होती हवा और समुद्र हैं, जो वातावरण में पहले से अधिक नमी जमा कर रहे हैं। यही नमी बादलों को बेहद भारी बना देती है। इसका एक कारण नदी घाटियों के किनारे बहुत ज्यादा खनन कार्य करना भी है, जिससे गाद जमा होने की समस्या बढ़ी और नदी की पानी ले जाने की क्षमता कम हो गई।
भारत मौसम विज्ञान विभाग के पूर्व महानिदेशक डॉ. के जे रमेश के अनुसार, अब मानसून का स्वरूप स्थायी रूप से बदल चुका है। चाहे अल-नीनो हो या न हो, भविष्य में बारिश कम समय में और अधिक तीव्रता के साथ होने की संभावना बढ़ती जाएगी। उन्होंने कहा कि अरब सागर के रिकॉर्ड स्तर तक गर्म होने से उत्तर-पश्चिम भारत में भी बारिश का पैटर्न बदल रहा है। अध्ययनों से पता चलता है कि भारत के कई हिस्सों में मौसम में उतार-चढ़ाव अनियमित होते जा रहे हैं। सूखे या अल-नीनो के बावजूद, कुछ जगहों पर कई दिनों तक भारी बारिश (सामान्य से कई गुना ज्यादा) होती है।
एक अध्ययन के अनुसार, भविष्य में महाराष्ट्र और गुजरात के तटीय इलाकों में भारी बारिश वाले दिनों की संख्या लगभग एक सप्ताह तक बढ़ सकती है। ऐसे में, अब समय आ गया है कि जलवायु अनुकूल शहरी योजना पर निवेश बढ़ाना होगा। इस साल के मानसून में दरअसल जलवायु परिवर्तन की कहानी छिपी है, जो एक अहम संदेश दे रही है। चुनौती सिर्फ यह नहीं है कि कितनी बारिश होगी, बल्कि यह भी है कि बारिश किस तरह होगी। अगर शहर पुराने मौसम के हिसाब से बने रहेंगे, तो बदलती जलवायु के साथ आने वाली ऐसी चरम बारिश उन्हें बार-बार संकट में डालती रहेगी।