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जलवायु के मौन संकेत: गर्म होते महासागर और ताकतवर अल-नीनो का खतरा

Wed, 12 Aug 2026 06:34 AM IST
Devesh Tripathi अमर उजाला
अमर उजाला Published by: Devesh Tripathi Updated Wed, 12 Aug 2026 06:34 AM IST
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सार
यूरोपीय संघ की जलवायु निगरानी सेवा कॉपरनिकस के अनुसार, बीते जुलाई महीने में वैश्विक समुद्री सतह का असामान्य रूप से गर्म होना चिंताजनक है। यह बदलाव एकाएक नहीं, बल्कि दशकों से चली आ रही पर्यावरण की अनदेखी का ही परिणाम है, जिसे चेतावनी की तरह लिया जाना चाहिए।
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समुद्र भी तपने लगे - फोटो : ANI

विस्तार

धरती के तापमान में बढ़ोतरी अब केवल गर्म होते शहरों और पिघलते ग्लेशियरों के रूप में ही नहीं दिख रही, बल्कि इसका सबसे बड़ा प्रभाव उस विशाल जलराशि पर भी पड़ रहा है, जो पृथ्वी की करीब तीन-चौथाई सतह को ढके हुए है। यूरोपीय संघ की जलवायु निगरानी सेवा कॉपरनिकस के अनुसार, बीते जुलाई महीने में वैश्विक समुद्री सतह का तापमान उक्त महीने के लिए अब तक का सर्वाधिक था। उल्लेखनीय है कि अंतरराष्ट्रीय मौसम एजेंसियों के अनुसार, भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में अल-नीनो की स्थिति तेजी से तीव्र हो रही है। स्थिति की गंभीरता इससे ही समझी जा सकती है कि 2026 के अल-नीनो को 1997-98 के सुपर अल-नीनो के चरम तापमान से भी अधिक गर्म बताया जा रहा है। गौरतलब है कि अल-नीनो का असर केवल प्रशांत महासागर तक सीमित नहीं रहता, बल्कि दुनिया के विभिन्न हिस्सों में बारिश, सूखा, गर्मी और तूफानों के स्वरूप को प्रभावित कर सकता है। इस बार चिंता इसलिए अधिक है कि समुद्र पहले से ही असामान्य रूप से गर्म हैं। दरअसल, समुद्र का गर्म होना अपने आप में कोई अचानक हुई घटना नहीं है। दशकों से ग्रीनहाउस गैसों के बढ़ते उत्सर्जन के कारण महासागर लगातार अतिरिक्त ऊष्मा को अपने भीतर समेटते रहे हैं। वैज्ञानिक आकलन के अनुसार, मानवीय गतिविधियों से पैदा हुई अतिरिक्त गर्मी का करीब 90 फीसदी हिस्सा महासागर ही अवशोषित कर रहे हैं। जाहिर है कि जुलाई का नया रिकॉर्ड उस दीर्घकालिक प्रवृत्ति का संकेत है, जिसमें समुद्र लगातार अधिक गर्म होते जा रहे हैं। यह स्थिति समुद्री जैव विविधता के लिहाज से तो खतरनाक है ही, इसका असर उन लाखों लोगों पर पड़ेगा, जिनकी आजीविका समुद्र पर निर्भर है। समुद्र पृथ्वी की जलवायु प्रणाली के नियामक भी हैं। गर्म समुद्र अधिक वाष्पीकरण को जन्म देते हैं और वातावरण में अधिक नमी पहुंचाते हैं। परिस्थितियां अनुकूल होने पर यही अतिरिक्त ऊर्जा और नमी शक्तिशाली उष्णकटिबंधीय तूफानों को प्रभावित कर सकती है। दूसरी ओर, अल-नीनो के कारण दुनिया के कुछ हिस्सों में कम वर्षा से सूखे की स्थिति गंभीर हो सकती है। यानी, एक ही जलवायु घटना कहीं बाढ़ और कहीं सूखे का खतरा बढ़ा सकती है। इन स्थितियों व आंकड़ों पर भारत को भी नजर रखनी होगी, क्योंकि वर्षा के स्वरूप में असामान्य बदलाव खाद्यान्न उत्पादन, जल उपलब्धता और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी दबाव बढ़ा सकते हैं। महासागर बहुत धीमी गति से गर्म होते हैं, लेकिन एक बार उनमें अतिरिक्त ऊष्मा जमा हो जाए, तो उसका असर लंबे समय तक रहता है। लिहाजा, जुलाई में महासागरों के रिकॉर्ड तापमान को पृथ्वी की धड़कन में आया बदलाव मानकर पूरी गंभीरता से लिए जाने की जरूरत है।
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