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मुस्लिम नाटो के अंतर्विरोध: असली चुनौती मक्का समझौता नहीं, नई व्यवस्था के लिहाज से भारत को बदलनी होगी रणनीति

Thu, 13 Aug 2026 04:57 AM IST
K S Tomar केएस तोमर
Updated Thu, 13 Aug 2026 04:57 AM IST
सार

तीन सुन्नी देशों और शिया बहुल ईरान के बीच प्रतिद्वंद्विता मुस्लिम नाटो के रूप में सामने आई है, लेकिन इसके अंतर्विरोध भी कम नहीं हैं।

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Muslim NATO Contradictions real challenge is not Mecca Agreement India must rethink  strategy amid new order
मक्का रक्षा समझौता। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

पश्चिम एशिया एक नए रणनीतिक दौर में प्रवेश कर रहा है, जिसमें पुराने गठबंधनों की परीक्षा हो रही है और नई साझेदारियां बन रही हैं। इसलिए, सऊदी अरब, तुर्किये और पाकिस्तान के बीच मक्का में हुआ रक्षा समझौता संकेत देता है कि तीन प्रभावशाली मुस्लिम-बहुल देश अपनी सुरक्षा पर अधिक नियंत्रण चाहते हैं, खासकर तब, जब अमेरिकी गारंटी पर भरोसा कम होता दिख रहा है।

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यह समझौता ऐसे समय में हुआ है, जब सुन्नी देशों और शिया-बहुल ईरान के बीच प्रतिद्वंद्विता के कारण क्षेत्र का संतुलन बदल रहा है। हालांकि, तीनों देशों की रणनीतिक प्राथमिकताएं अलग-अलग हैं, पर उनका एक साथ आना ईरान के बढ़ते प्रभाव व क्षेत्रीय संघर्षों के प्रति मुस्लिम देशों की कमजोरी को लेकर उनकी साझा चिंता को दिखाता है। यह प्रमुख सुन्नी ताकतों की ओर से पूरी तरह से अमेरिका पर निर्भर रहने के बजाय, मुस्लिम-नेतृत्व वाला एक अतिरिक्त सुरक्षा ढांचा बनाने की कोशिश है। इसका महत्व इसमें निहित है कि सऊदी अरब, तुर्किये और पाकिस्तान ईरान से खतरे और क्षेत्रीय सुरक्षा के प्रति अमेरिका की दीर्घकालिक प्रतिबद्धता को लेकर अनिश्चितता, दोनों से निपटने के लिए विकल्प तैयार कर रहे हैं। यह समझौता पूरी तरह से एकीकृत सैन्य गठबंधन नहीं है, और इसकी वास्तविक ताकत इस बात पर निर्भर करेगी कि क्या ये तीनों देश अपने अलग-अलग हितों और खतरों के प्रति अपनी धारणाओं में तालमेल बिठा पाते हैं या नहीं।
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मक्का समझौते को भारत-विरोधी गठबंधन के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। सऊदी अरब के भारत में बड़े आर्थिक व रणनीतिक हित हैं, जबकि तुर्किये के पाकिस्तान के साथ साझेदारी की तुलना में नई दिल्ली के साथ संबंध अधिक जटिल हैं। भारत को किसी दूसरे गुट में शामिल होने के बजाय अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को मजबूत करना चाहिए। बड़ी अर्थव्यवस्था, मजबूत सैन्य क्षमताएं, गहरी कूटनीतिक साझेदारी और सत्ता के प्रतिस्पर्धी केंद्रों के साथ लगातार जुड़ाव तय करेगा कि भारत उभरती हुई व्यवस्था को आकार दे सकता है या नहीं। यूएई, फ्रांस, इस्राइल व अन्य रणनीतिक साझेदारों के साथ भारत की साझेदारी भी महत्वपूर्ण होती जाएगी। आर्थिक निर्भरता, ऊर्जा सुरक्षा, समुद्री सहयोग और आतंकवाद-विरोधी प्रयास इस जुड़ाव के मुख्य आधार बने रहने चाहिए।
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भारत के लिए बड़ा सबक यह है कि पश्चिम एशिया तेजी से बहुध्रुवीय होता जा रहा है। नई दिल्ली इस क्षेत्र को केवल वाशिंगटन या खाड़ी के अलग-अलग देशों के साथ अपने संबंधों के नजरिये से नहीं देख सकती। भारत को अमेरिका से मजबूत रिश्ते रखते हुए खाड़ी और सऊदी अरब से रणनीतिक जुड़ाव बढ़ाना चाहिए, साथ ही ईरान और तुर्किये से संतुलित संबंध बनाए रखने चाहिए। 

नए गठबंधन की पहली चुनौती राजनीतिक प्रतीकों को भरोसेमंद सैन्य गठबंधन में बदलना है। पाकिस्तान की मुख्य सुरक्षा चिंता भारत है; सऊदी अरब का ध्यान ईरान और मिसाइल, ड्रोन व क्षेत्रीय संघर्षों से होने वाले खतरों पर है; जबकि तुर्किये नाटो के व्यापक ढांचे के भीतर काम करता है और सीरिया, इराक, भूमध्य सागर और काकेशस में उसके अपने हित हैं। दूसरी चुनौती स्वतः हस्तक्षेप का सवाल है। समझौते के तहत ‘एक पर हमला, सब पर हमला’ की घोषणा का मतलब यह नहीं कि तीनों देश हर संघर्ष में सैन्य रूप से शामिल होंगे। इसका ताजा उदाहरण सऊदी तेल संयंत्रों और लाल सागर में टैंकरों पर हालिया हूती हमला है, जिस पर न तो पाकिस्तान और न ही तुर्किये हरकत में आया। तीसरी चुनौती पहले से ही अस्थिर क्षेत्र में एक कठोर गुट बनाने से बचना है। सऊदी अरब अपनी रक्षा क्षमता को मजबूत करते हुए ईरान से बातचीत कर रहा है। तुर्किये की नाटो के प्रति प्रतिबद्धताएं हैं। पाकिस्तान को चीन, खाड़ी देशों और अमेरिका के साथ अपने संबंधों में संतुलन बनाना होगा। ये परस्पर विरोधी हित समझौते की एकजुटता को सीमित कर सकते हैं।

भारत की चिंता एक और नाटो बनने की नहीं, बल्कि यह है कि क्या पाकिस्तान मक्का समझौते का इस्तेमाल अपनी कूटनीतिक व रणनीतिक पहुंच बढ़ाने के लिए कर सकता है। पाकिस्तान को असल फायदा ज्यादा मजबूत प्रतिरोध क्षमता, राजनीतिक समर्थन, रक्षा सहयोग और वैश्विक स्तर पर अहमियत मिलने से होगा। समझौते से वह खुद को खाड़ी देशों से सिर्फ मदद लेने वाला नहीं, बल्कि एक अहम सुरक्षा साझेदार के तौर पर पेश कर सकता है।


असली चुनौती मक्का समझौता नहीं है, बल्कि एक ऐसी दुनिया का उभरना है, जहां कोई भी एक ताकत स्थिरता की गारंटी नहीं दे सकती। भारत को यह सुनिश्चित करना होगा कि अलग-अलग साझेदारियों और बदलते गठबंधनों के बीच, उसके पास इतना आर्थिक, सैन्य और कूटनीतिक वजन हो कि वह नई रणनीतिक व्यवस्था पर मात्र प्रतिक्रिया न दे, बल्कि उसे आकार दे सके।

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