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Youth: क्या हम भविष्य का नेतृत्व करने के लिए तैयार? टॉपर से आगे बढ़कर देश को चाहिए समस्या सुलझाने वाले युवा

Fri, 14 Aug 2026 07:48 AM IST
प्रवीण कौशल Published by: हिमांशु सिंह चंदेल Updated Fri, 14 Aug 2026 07:48 AM IST
सार

Are We Ready to Lead the Future: भारत दुनिया के सबसे युवा देशों में है और लाखों छात्र हर साल बेहतर रैंक के लिए वर्षों मेहनत करते हैं। लेकिन क्या सफलता का मतलब केवल अच्छे नंबर और रैंक हासिल करना होना चाहिए? तकनीक और एआई के तेजी से बदलते दौर में क्या भारत को ऐसे युवाओं की जरूरत नहीं है, जो नए उत्पाद बनाएं, समस्याएं हल करें और देश के विकास को गति दें? यही सबसे बड़ा सवाल है। आइए, विस्तार से इन सवालों को समझने की कोशिश करते हैं...

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Are We Ready to Lead the Future Why India Must Go Beyond Ranks and Build Problem-Solving Youth
क्या आने वाले समय में डिग्री से ज्यादा काम की उपयोगिता मायने रखेगी? - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

हर साल 15 अगस्त के आसपास भारत की युवा आबादी और उसकी ऊर्जा की चर्चा होती है। औसत भारतीय की उम्र करीब 29 साल है। यानी देश के पास काम करने, सीखने और कुछ नया करने वाली बड़ी युवा शक्ति है। लेकिन इस ताकत का बड़ा हिस्सा प्रतियोगी परीक्षाओं में अच्छी रैंक हासिल करने की दौड़ में लग जाता है। लाखों छात्र तीन से पांच साल तक तैयारी करते हैं और परिवार अपनी बचत उनकी पढ़ाई पर लगा देते हैं। सवाल यह है कि इतनी बड़ी मेहनत का इस्तेमाल क्या केवल एक रैंक हासिल करने तक सीमित रहना चाहिए।

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क्या अच्छे नंबर से आगे सफलता की नई परिभाषा तय करने का समय आ गया?

लेख का मुख्य तर्क यही है कि समस्या युवाओं की महत्वाकांक्षा में नहीं, बल्कि उस महत्वाकांक्षा के लक्ष्य में है। आज सफलता का बड़ा पैमाना नंबर, परीक्षा और रैंक बन गया है। जबकि किसी छात्र की मेहनत का इस्तेमाल ऐसा काम करने में भी हो सकता है, जिससे दूसरे लोगों की जिंदगी बेहतर हो। कोई छात्र स्थानीय भाषा में किसानों को फसल की सलाह देने वाली सेवा बना सकता है, कोई सॉफ्टवेयर तैयार कर सकता है, कोई गांव की समस्या का समाधान खोज सकता है या कोई नई सेवा शुरू कर सकता है। ऐसी उपलब्धियों को भी सफलता के पैमाने में जगह मिलनी चाहिए।

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टॉपर बनने के बजाय कुछ बनाने के लिए कैसे प्रेरित करें?

भारतीय छात्रों में मेहनत और प्रतियोगिता की भावना पहले से मजबूत है। इसलिए इसी ताकत को उपयोगी काम की ओर मोड़ने की जरूरत है। डिग्री पूरी होने पर केवल सबसे ज्यादा नंबर पाने वाले छात्र को सम्मान देने के बजाय उस छात्र को भी पहचान मिलनी चाहिए, जिसने कोई उपयोगी चीज बनाई हो। यह जरूरी नहीं कि वह बड़ी कंपनी हो। कोई छोटी रिपेयर सर्विस, स्थानीय समस्या का समाधान, नया उत्पाद या सामाजिक पहल भी महत्वपूर्ण हो सकती है। असली सफलता इस बात से तय हो सकती है कि उस काम से कितने लोगों को फायदा हुआ।

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असफल उद्यम भी युवाओं को क्या सिखा सकता है?

किसी छात्र का बनाया उद्यम सफल न भी हो तो उसका अनुभव बेकार नहीं जाता। जमीन पर काम करने से उसे कई ऐसी बातें सीखने को मिलती हैं, जो केवल किताबों से नहीं सीखी जा सकतीं। वह लोगों की जरूरत समझता है, अपना काम दूसरों तक पहुंचाना सीखता है, मुश्किल परिस्थितियों से निकलने की कोशिश करता है और फैसले लेने की क्षमता विकसित करता है। ऐसे अनुभव किसी नियोक्ता के लिए भी महत्वपूर्ण हो सकते हैं। इसलिए असफलता को केवल हार के रूप में देखने के बजाय सीखने के अवसर के रूप में देखना जरूरी है।

एआई के दौर में आखिर सबसे जरूरी कौशल क्या होगा?

एआई ने शिक्षा और रोजगार को लेकर बहस को और महत्वपूर्ण बना दिया है। आने वाले दौर में केवल जानकारी होना पर्याप्त नहीं होगा। सही फैसला लेने, परिस्थिति को समझने, किसी विषय को गहराई से जानने और विचार को जमीन पर लागू करने की क्षमता ज्यादा अहम होगी। ऐसे में विश्वविद्यालयों की भूमिका भी बदलेगी। उनका काम केवल जानकारी देना नहीं रहेगा, बल्कि यह तैयार करना भी होगा कि कोई व्यक्ति नई चीजें सीख सकता है, शोध कर सकता है और बदलती परिस्थितियों में खुद को ढाल सकता है।

क्या पढ़ाई और काम को अलग-अलग रखने की व्यवस्था बदलनी चाहिए?

लेख में पढ़ाई और काम को अलग-अलग चरणों में बांटने के बजाय दोनों को साथ लेकर चलने की जरूरत पर जोर दिया गया है। यानी छात्र पढ़ाई के दौरान ही वास्तविक काम का अनुभव लें और काम करने वाले लोगों के लिए भी आगे पढ़ाई और नए कौशल सीखने का रास्ता खुला रहे। 40 या 55 साल की उम्र में भी कोई व्यक्ति नई पढ़ाई शुरू कर सके, ऐसी व्यवस्था जरूरी मानी गई है। इससे बदलती तकनीक और रोजगार की जरूरतों के अनुसार लोग खुद को लगातार तैयार कर सकेंगे।

क्या तकनीक नौकरियां खत्म करेगी या नए अवसर पैदा करेगी?

ऑटोमोबाइल, बिजली और कंप्यूटर जैसी तकनीकों ने पहले भी काम करने का तरीका बदला है। कई पुराने काम खत्म हुए, लेकिन उनके साथ नए काम भी पैदा हुए। समस्या यह है कि नए रोजगारों के नाम और स्वरूप पहले से किसी को पता नहीं होते। इसलिए असली खतरा केवल नौकरियां खत्म होना नहीं है। बड़ा खतरा यह है कि लोगों के कौशल और संस्थान नई जरूरतों के हिसाब से बदलने में पीछे रह जाएं। अगर तकनीकी बदलाव का फायदा कुछ लोगों तक ही सीमित रहा, तो असमानता बढ़ सकती है।

क्या तकनीक को जमीन पर उतारने में भारत ने पहले भी गलतियां की हैं?

तकनीक को अपनाने में केवल नई मशीन या सॉफ्टवेयर तैयार करना पर्याप्त नहीं है। उसे जमीन पर सही तरीके से लागू करना भी जरूरी है। लेख में करीब डेढ़ दशक पहले ‘हर बच्चे के लिए एक लैपटॉप’ जैसी सोच का उदाहरण दिया गया है। शिक्षा में तकनीक के इस्तेमाल को लेकर कई योजनाएं शुरू हुईं, लेकिन कुछ योजनाएं एक साल के भीतर ही बंद हो गईं। इससे यह सीख मिलती है कि जो तकनीक प्रयोगशाला में सफल दिखाई देती है, जरूरी नहीं कि वह सीधे कक्षा में भी उसी तरह काम करे।

क्या एआई का सही इस्तेमाल किसानों और आम लोगों की जिंदगी बदल सकता है?

तकनीक के सही इस्तेमाल से सकारात्मक नतीजे भी सामने आए हैं। लेख में एक राज्य सरकार के अडैप्टिव लर्निंग प्रोग्राम का उल्लेख है, जिसमें सप्ताह में करीब एक घंटे के इस्तेमाल से छात्रों की सीखने की रफ्तार दोगुनी होने का दावा किया गया है। इसी तरह एआई आधारित मानसून पूर्वानुमान से करोड़ों किसानों को फसल से जुड़े बेहतर फैसले लेने में मदद मिली। ऑटोमेटेड ड्राइविंग टेस्टिंग से असुरक्षित ड्राइविंग के मामलों में 20 से 30 प्रतिशत तक कमी आने का भी उल्लेख है। यानी तकनीक समस्या नहीं, उसके इस्तेमाल का तरीका महत्वपूर्ण है।

क्या भारत को अपनी एआई तकनीक और अपने डाटा पर ज्यादा नियंत्रण चाहिए?

भारत ने पिछले तकनीकी दौर में अच्छा काम किया, लेकिन उसका आर्थिक फायदा भारतीय संस्थानों को सीमित मिला। लेख में चिंता जताई गई है कि शोध, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और विज्ञापन से होने वाली कमाई का बड़ा हिस्सा दूसरी कंपनियों के पास गया। एआई के दौर में ऐसी स्थिति दोहराने से बचना जरूरी है। इसके लिए भारत में, भारतीय भाषाओं में और भारतीय डाटा पर एआई मॉडल विकसित करने की जरूरत बताई गई है। साथ ही एआई को केवल बड़ी कंपनियों तक सीमित रखने के बजाय आम लोगों तक पहुंचाने पर भी जोर दिया गया है।

क्या बड़ी भारतीय कंपनियां एआई विकास में बड़ी भूमिका निभा सकती हैं?

भारत की बड़ी कंपनियां अपने मुनाफे का एक हिस्सा एआई क्षमता विकसित करने में लगा सकती हैं। इससे कंपनियों के भीतर नई तकनीक को समझने और इस्तेमाल करने की क्षमता बढ़ेगी। इसके साथ ही देश में ऐसी तकनीकी क्षमता तैयार की जा सकती है, जो केवल दूसरे देशों की तकनीक पर निर्भर न हो। एआई का इस्तेमाल अगर भारतीय भाषाओं, स्थानीय जरूरतों और भारतीय परिस्थितियों को ध्यान में रखकर किया जाए, तो इसका फायदा ज्यादा व्यापक हो सकता है।

क्या आने वाले समय में डिग्री से ज्यादा काम की उपयोगिता मायने रखेगी?

बदलती अर्थव्यवस्था में केवल डिग्री हासिल करना पर्याप्त नहीं हो सकता। किसी व्यक्ति ने वास्तव में क्या बनाया, कौन-सी समस्या हल की और कितने लोगों के लिए उपयोगी काम किया, इसका महत्व बढ़ सकता है। ऐसे में छात्रों को पढ़ाई के साथ प्रयोग करने का अवसर देना जरूरी होगा। अगर कोई युवा कोई छोटा उत्पाद बनाता है, सेवा शुरू करता है या किसी स्थानीय समस्या का समाधान खोजता है, तो उसे भी सीखने और उपलब्धि के रूप में देखा जाना चाहिए।

क्या भारत को सिर्फ डिग्रीधारी नहीं, बदलाव लाने वाले लोग चाहिए?

देश की आबादी करीब 140 करोड़ है। इतनी बड़ी आबादी वाले देश के लिए केवल डिग्री हासिल करने वाले युवाओं की संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं है। जरूरत ऐसे लोगों की है, जो नए विचारों पर काम करें, समस्याओं का समाधान खोजें और बदलाव लाने की कोशिश करें। इसका मतलब यह नहीं कि परीक्षा और शिक्षा का महत्व खत्म हो जाए। बल्कि शिक्षा के साथ वास्तविक जीवन की समस्याओं पर काम करने का अवसर भी मिलना चाहिए।

क्या 'टॉपर' की परिभाषा बदलने से युवाओं की दिशा बदल सकती?

अगर समाज केवल नंबर और रैंक को सफलता मानता रहेगा, तो छात्र भी उसी दिशा में अपनी पूरी ऊर्जा लगाएंगे। लेकिन अगर उपयोगी काम, नए विचार, शोध, उद्यम और सामाजिक समाधान को भी सम्मान मिलेगा, तो प्रतियोगिता की दिशा बदल सकती है। छात्र बेहतर अंक पाने के साथ-साथ यह भी सोचेंगे कि वे क्या बना सकते हैं और किस समस्या का समाधान कर सकते हैं। इससे उनकी मेहनत का फायदा व्यक्तिगत सफलता से आगे बढ़कर समाज और देश को भी मिल सकता है।

क्या आजादी की असली विरासत नए काम करने की हिम्मत है?

79 साल पहले भारत ने उन लोगों के संघर्ष से आजादी हासिल की, जिन्होंने वह करने का साहस दिखाया, जो उनसे किसी ने करने को नहीं कहा था। यही भावना आज भी भारत की सबसे बड़ी ताकत बन सकती है। भविष्य का भारत केवल ज्यादा डिग्री और ज्यादा टॉपर वाला देश नहीं होना चाहिए। उसे ऐसे युवाओं की जरूरत है, जो जोखिम लें, कुछ नया बनाएं, समस्याएं हल करें और बदलाव की शुरुआत करें। इसलिए सवाल केवल यह नहीं है कि अगला टॉपर कौन होगा। बड़ा सवाल यह है कि अगला ऐसा युवा कौन होगा, जो देश के लिए कुछ नया तैयार करेगा।


-लेखक टेक, सोशल आंत्रप्रेन्योर और डब्ल्यूजीएफ के प्रोग्राम डायरेक्टर (पूर्वी भारत) हैं।

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