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79 साल की यात्रा: 15 अगस्त केवल राष्ट्रीय गौरव का नहीं, अधूरे संकल्प को फिर से याद करने का भी दिन
सार
15 अगस्त केवल राष्ट्रीय गौरव का दिन नहीं, बल्कि उस अधूरे संकल्प को फिर से याद करने का भी दिन है, जिसे आजादी के समय हमने अपने सामने रखा था।
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स्वतंत्रता दिवस
- फोटो : अमर उजाला प्रिंट / एआई-एजेंसी
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विस्तार
आजादी की 79वीं वर्षगांठ का यह ऐतिहासिक दिन हमें उस लम्हे की याद तो दिलाता ही है, जब भारत ने औपनिवेशिक शासन की लंबी रात से निकलकर अपने भाग्य का निर्णय स्वयं करने का अधिकार हासिल किया था; लेकिन यह दिन सिर्फ अतीत का उत्सव नहीं, बल्कि आत्म परीक्षण का अवसर भी है।
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आखिर स्वतंत्रता का अर्थ केवल विदेशी शासन से मुक्ति नहीं, बल्कि ऐसा समाज और राष्ट्र बनाना भी है, जहां हर नागरिक को गरिमा, अवसर, न्याय और अपनी आकांक्षाओं को पूरा करने की स्वतंत्रता हासिल हो। अब तक हमने जिस यात्रा को तय किया है, वह यकीनन असाधारण है।
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गरीबी, अशिक्षा, विभाजन और विस्थापन जैसी गहरी चुनौतियों का सामना करते हुए, आज अपना देश दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में जगह बना चुका है। लोकतंत्र की जड़ें मजबूत हुई हैं, विज्ञान और प्रौद्योगिकी ने नई ऊंचाइयां हासिल की हैं, अंतरिक्ष से लेकर डिजिटल तकनीक तक भारत ने अपनी क्षमताओं का लोहा मनवाया है।
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करोड़ों लोगों का जीवन बदला है और दुनिया के मंच पर भारत की आवाज पहले से कहीं अधिक प्रभावशाली हुई है। लेकिन उपलब्धियों का यह उत्सव हमें उन सवालों से विमुख नहीं कर सकता, जो आज भी हमारे सामने खड़े हैं। क्या आर्थिक विकास का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक समान रूप से पहुंच रहा है? क्या हम एक ऐसे समाज का निर्माण कर पा रहे हैं, जिसमें असहमति को लोकतंत्र की कमजोरी नहीं, उसकी शक्ति माना जाए? क्या हम देश के विभिन्न हिस्सों में दिख रही युवाओं की बेचैनी को खारिज कर सकते हैं?
स्वतंत्रता का उत्सव तभी सार्थक होगा, जब हम इन प्रश्नों से ईमानदारी से रूबरू हों। विडंबना यह है कि जिस समय युवा लोकतांत्रिक संस्थाओं से अपने प्रश्नों का उत्तर चाहते हैं, उसी समय संसद में बहस, संवाद और सहमति की गुंजाइश लगातार सिकुड़ती दिखी। लिहाजा 15 अगस्त केवल राष्ट्रीय गौरव का दिन नहीं, बल्कि उस अधूरे संकल्प को फिर से याद करने का भी दिन है, जिसे आजादी के समय हमने अपने सामने रखा था।