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सबसे अहम युद्ध पर किसी का ध्यान नहीं: तेजी से फैल रहे नफरत और भेदभाव, जीत तभी होगी, जब हम धरती को हारने न दें
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धरती की जंग कौन लड़ेगा?
- फोटो :
अमर उजाला प्रिन्ट/एजेंसी
विस्तार
एक समय था, जब पर्यावरण के प्रति बहुत ज्यादा जागरूक लोगों को अव्यावहारिक आदर्शवादी या अकारण खतरे की घंटी बजाने वाला माना जाता था और उन्हें तरक्की की ऊंची सोच में बाधा डालने वाला समझा जाता था। अक्सर उन्हें विकास-विरोधी कहा जाता था और उनकी उपेक्षा की जाती थी। लेकिन, अब हम एक जिम्मेदार समाज के तौर पर विकास के ऐसे पड़ाव पर हैं, जहां हम धरती के साथ अपने व्यवहार में इस तरह के कुछ आदर्शवाद तो अपना ही सकते हैं, चाहे वह व्यक्तिगत स्तर पर हो या फिर संस्थागत स्तर पर।
व्यक्तिगत और संस्थागत, दोनों ही स्तरों पर हमें अपने खूबसूरत ग्रह, यानी पृथ्वी की सेहत को ध्यान में रखते हुए कोई भी ऐसा काम करने से खुद को रोकना होगा, जो जलवायु के दृष्टिकोण से असंगत या नुकसानदेह हो। पृथ्वी की सेहत, जलवायु से जुड़ी नैतिकता, कार्बन फुटप्रिंट और पारिस्थितिक असंतुलन जैसे शब्द अब बेहतर भविष्य के लिए हमारे एजेंडे के खिलाफ नहीं हैं। ये शब्द खतरे में पड़ी विरासत के प्रति हमारे नजरिये को दिखाते हैं। जब भी कोई राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री ‘ड्रिल-बेबी-ड्रिल’ (जोर-शोर से खोदाई) का नारा लगाता है, तो यह सिर्फ मजाकिया नहीं, बल्कि असंवेदनशील भी लगता है। जबकि, संवेदनशीलता ही वह गुण है, जो पृथ्वी से जुड़े हर व्यक्ति के लिए जरूरी है। पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता सिर्फ हमारे वर्तमान के लिए ही नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के भविष्य के लिए भी बेहद जरूरी है। यह एक साझा गुण होना चाहिए, जो शासन-व्यवस्था के ‘ग्रीन (हरित)’ पहलू को नागरिक समाज के व्यवहार में आए बदलाव के साथ पूरी तरह तालमेल में लाए।
बदलाव और विकास का कोई भी घोषणापत्र, मनुष्यों के बुरे बर्ताव से खतरे में पड़े इस ग्रह की पुकार को नजरअंदाज नहीं कर सकता। जो राजनीति पर्यावरण से जुड़ी नैतिकता का मजाक उड़ाती है, वह विकल्पों को एक गंभीर मिशन बनाने में हमारी मदद नहीं करेगी, बल्कि पर्यावरण संतुलन के मार्ग में अड़चन ही डालने वाली होगी।
अब यह उदाहरण ही देख लीजिए। पश्चिम एशिया में जब युद्ध अपने चरम पर था, तब हमें भले ही ठीक-ठीक दूसरा ‘ऑयल शॉक’ (तेल की कमी का संकट) नहीं लगा, लेकिन एक कमजोर और ढीला-ढाला युद्धविराम लागू होने से पहले हम ऊर्जा के संकट की ओर तेजी से बढ़ रहे थे। विकास को गति देने में तेल के वर्चस्व पर भी गंभीर सवाल उठने लगे थे। बेचैनी से ऊर्जा के दूसरे विकल्पों की तलाश जरूरी महसूस होने लगी और हम सभी ने इसकी तकलीफ को बहुत गहराई से महसूस किया, क्योंकि बहुत कम सरकारों ने ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों को अपनाने की जरूरत को गंभीरता से लिया था। ऐसे में, यह सवाल उठता है कि क्या अब टिकाऊपन की व्यावहारिक अर्थनीति को अपनाने का समय नहीं आ गया है!
सिर्फ युद्ध के समय ही नहीं, बल्कि हर दिन बहुत ज्यादा दबाव झेल रही हमारी धरती कई तरह से, जैसे-कभी बाढ़, कभी सूखा, कभी भूस्खलन, कभी चक्रवात आदि से अपनी बदहाली जाहिर करती है। इनमें से कुछ बातों पर तो हम लोग ध्यान देते हैं, लेकिन ज्यादातर बातों को नजरअंदाज कर देते हैं। हमारे बीच ऐसे लोग भी हैं, जो पर्यावरण को लेकर बहुत भावुक और सक्रिय हैं और धरती की जिंदगी को बेहतर बनाने में अहम भूमिका निभा रहे हैं। वे हमें सही राह दिखाने वाले लोग हैं, जो याद दिलाते हैं कि धरती पर इतने जुल्म ढाने के बाद, केवल हम ही उसकी भलाई सुनिश्चित कर सकते हैं।
अच्छी बात यह है कि पर्यावरण के प्रति निराशावादी सोच की जगह अब पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता ले रही है। बिजली से चलने वाली इलेक्ट्रिक गाड़ियों की बढ़ती लोकप्रियता इसका एक सुखद उदाहरण है। एक नागरिक के तौर पर हम सबको व्यक्तिगत स्तर पर अपने ऊर्जा विकल्पों में बदलाव लाने की कोशिश करनी चाहिए और ऐसे विकल्पों को तेजी से अपनाना चाहिए, जो पर्यावरण के अनुकूल हों।
फिर भी, पर्यावरणवादी अब कोई ऐसा व्यक्ति नहीं है, जो पर्यावरण से जुड़ी जटिल और अनजान बातों का विशेषज्ञ हो और आम लोगों की रोजमर्रा की जरूरतों से पूरी तरह कटा हुआ हो। आज हम सभी पर्यावरणवादी हैं, और ऐसा सिर्फ इसलिए नहीं है कि हम उस ग्रह के प्रति अपना आभार और एहसान जाहिर करें, जो दया की गुहार लगा रहा है। बल्कि, यह दिखाने के लिए भी कि हम ऐसे समय में कौन हैं, जब राजनीति में नफरत और भेदभाव के विचार तेजी से अपनी जगह बना रहे हैं और दो युद्धों (एक जो ईरान में आंशिक रूप से खत्म होने के बाद फिर से भड़क गया है और दूसरा जो अब भी यूक्रेन में जारी है) ने इसे बहुत साफ और दर्दनाक तरीके से दिखाया है। एक और अदृश्य युद्ध में, हम धरती की सहनशक्ति की परीक्षा ले रहे हैं। हम इसमें तभी जीत सकते हैं, जब हम धरती को हारने न दें।
फिर भी, ज्यादातर मकसद तब कट्टरवादी हो जाते हैं, जब वे एक ‘वाद’ बन जाते हैं। तभी अच्छे मकसद विचारधारा की पक्की धारणाओं में खो जाते हैं। ‘वाद’-यहां तक कि पर्यावरणवाद भी जब चरम पर पहुंचता है, तो वह अंधविश्वास और खुद को सही मानने की जिद में बदल जाता है। ब्रिटेन जैसे देशों में तथाकथित ‘ग्रीन पार्टियां’ इस बात का उदाहरण हैं कि कैसे ऊंचे-ऊंचे नाम लोकप्रिय दिखने की कोशिशों को छिपा लेते हैं।
पर्यावरण के प्रति कोई नजरिया अपनाना लोकतंत्र की नैतिक व्यावहारिकता को नकारना नहीं है। हमें व्यापक स्तर पर पर्यावरण के प्रति संवेदना जताने की जरूरत है, न कि पर्यावरण के मामले में कट्टरवादी सोच की। कहने का आशय यह है कि हम मनुष्य बने रहें। सही मायनों में मनुष्य बने रहने के लिए, हमें धरती की आह और उसके दुखों को सुनना होगा। उम्मीद है कि पर्यावरण के प्रति नई जागरूकता से जुड़े ये तर्क, भविष्य पर हो रही राष्ट्रीय चर्चा में विचारों और नजरिये को और ज्यादा अहमियत और तेजी देंगे।