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पीढ़ी तो यही काम करेगी: जेन-जी और जेन अल्फा के कंधे पर विकसित भारत का सपना, क्या हम अवसर दे रहे हैं?

Thu, 20 Aug 2026 09:10 AM IST
ज्योति भास्कर कुमार रोहित
कुमार रोहित Published by: ज्योति भास्कर Updated Thu, 20 Aug 2026 09:10 AM IST
सार

विकसित भारत का सपना जेन-जी और जेन अल्फा को ही पूरा करना है, लेकिन सवाल यह है कि क्या हम उन्हें ऐसा करने का अवसर दे रहे हैं।

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Upcoming generation will realize dream of developed India rests are we giving opportunities to Gen Z and Alpha
जेन-जी के कंधे पर बड़ी जिम्मेदारी - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

साल 2047 तक भारत को विकसित बनाने का लक्ष्य कोई बहुत दूर का सपना नहीं है। आज जो किशोर अपने मोबाइल पर भविष्य की दुनिया देख रहे हैं और जो बच्चे एआई को उतनी ही सहजता से समझ रहे हैं, जितनी पिछली पीढ़ियां रेडियो व टेलीविजन को समझती थीं, वही भारत की दिशा तय करेंगे। वे संसद, न्यायालयों, प्रशासन, सेना, विज्ञान, उद्योग, विश्वविद्यालयों और समाज के नेतृत्व में होंगे। इसलिए, यह प्रश्न कि भारत 2047 में कैसा होगा, दरअसल एक और गहरे प्रश्न से जुड़ा है कि आज की जेनरेशन जेड (जेन-जी) व अल्फा कैसी बन रही हैं?

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राष्ट्र केवल सड़कों, इमारतों और अर्थव्यवस्था से नहीं बनते; अपने नागरिकों के चरित्र, उनकी मानसिकता, उनके सपनों और उनके निर्णयों से भी बनते हैं। जेन-जी और जेन अल्फा देश की पहली ऐसी पीढ़ियां हैं, जिनके लिए डिजिटल दुनिया जीवन का स्वाभाविक विस्तार है। इनके हाथों में केवल स्मार्टफोन नहीं, बल्कि पूरी दुनिया है। वे तेजी से सीखती हैं, बदलाव को अवसर मानती हैं, सीमाओं से परे सोचती हैं और जोखिम लेने से हिचकती नहीं। स्टार्टअप संस्कृति, डिजिटल भुगतान, अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी, ऑनलाइन शिक्षा और वैश्विक सहयोग ने उनके आत्मविश्वास को नई उड़ान दी है। यही ऊर्जा भारत को नवाचार, उद्यमिता और ज्ञान-आधारित अर्थव्यवस्था की ओर आगे ले जा सकती है।
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लेकिन, हर युग अपनी चुनौतियां भी साथ लाता है। जिस डिजिटल संसार ने इन्हें असीम अवसर दिए हैं, उसी ने निरंतर तुलना, त्वरित संतुष्टि और सूचना के शोर का दबाव भी पैदा किया है। आने वाले वक्त में नई पीढ़ी के हाथों में ऐसी तकनीक होगी, जिसकी कल्पना आज भी पूरी तरह नहीं की जा सकती। निर्णय अधिक डाटा-आधारित होंगे, सेवाएं अधिक पारदर्शी होंगी, स्वास्थ्य और शिक्षा अधिक व्यक्तिगत होंगी तथा शासन पहले से अधिक उत्तरदायी बन सकता है। लेकिन, तकनीक का परिणाम उस व्यक्ति के चरित्र पर निर्भर करता है, जो उसका उपयोग करता है। स्मार्ट सिस्टम अपने आप संवेदनशील समाज नहीं बनाते।
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इसी संदर्भ में महात्मा गांधी के आदर्शों की एक नई प्रासंगिकता दिखाई देती है। गांधीजी ऐसे समाज की कल्पना करते थे, जहां न्याय, करुणा, नैतिकता और समान अवसर हों। उनका जोर स्वशासन और हर व्यक्ति के कल्याण पर था। अगर इन विचारों को 21वीं सदी की भाषा में समझें, तो आधुनिक समाज ऐसा होना चाहिए, जहां एआई और नई तकनीक का इस्तेमाल हो, पर फैसलों में मानवीय समझ व संवेदनशीलता भी बनी रहे। डिजिटल गवर्नेंस हो, किंतु नागरिक की गरिमा सबसे ऊपर हो। आर्थिक विकास का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे। नवाचार के केंद्र में इन्सान और उसकी जरूरतें हों।

सवाल यह नहीं है कि जेन-जी और जेन अल्फा यह कर सकती है या नहीं। सवाल यह है कि क्या हम उन्हें ऐसा बनने का अवसर दे रहे हैं। इन पीढ़ियों में जलवायु परिवर्तन, लैंगिक समानता, मानसिक स्वास्थ्य, सामाजिक उद्यमिता और वैश्विक नागरिकता को लेकर उल्लेखनीय जागरूकता दिखाई देती है। वे विविधता को सहज स्वीकारती हैं और असफलता को भी सीखने की प्रक्रिया का हिस्सा मानने लगी हैं। यह दृष्टि भारत को नई ऊंचाइयों तक ले जा सकती है। लेकिन, यदि शिक्षा केवल नौकरी का माध्यम बनकर रह गई, यदि परिवार संवाद की जगह केवल सुविधाएं देने लगे, यदि सफलता का अर्थ केवल धन और लोकप्रियता रह गया, तो विकसित भारत का सपना अधूरा रह जाएगा। इसलिए, आज की पीढ़ी के लिए सबसे बड़ा लक्ष्य किसी और से आगे निकलना नहीं, बल्कि स्वयं का बेहतर संस्करण बनना है, जिसमें ज्ञान के साथ विनम्रता, महत्वाकांक्षा के साथ उत्तरदायित्व और सफलता के साथ संवेदनशीलता भी जुड़ी हो। इसी कारण, विकसित भारत का सबसे बड़ा निवेश केवल डिजिटल अवसंरचना में नहीं, बल्कि व्यक्तित्व-निर्माण में होना चाहिए। शिक्षण संस्थान ऐसे हों, जो जिज्ञासा जगाएं और आलोचनात्मक चिंतन विकसित करें। परिवार संवाद व संस्कार, दोनों दें, तथा सार्वजनिक संस्थाएं युवाओं को केवल सफल नहीं, बल्कि बेहतर नागरिक बनने की प्रेरणा दें।


2047 का भारत केवल तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने से विकसित नहीं कहलाएगा। उसकी वास्तविक पहचान तब बनेगी, जब नागरिकों को व्यवस्था पर भरोसा होगा, शासन सेवा का माध्यम बनेगा, तकनीक और नवाचार लोगों के जीवन को बेहतर बनाएंगे तथा व्यक्ति को पृष्ठभूमि नहीं, बल्कि योग्यता व प्रतिभा के आधार पर आगे बढ़ने का अवसर मिलेगा। यही गांधीजी के आदर्शों की आधुनिक, तकनीक-सक्षम और लोकतांत्रिक व्याख्या होगी। विकसित भारत पीढ़ियों के बीच एक साझा राष्ट्रीय संकल्प है। आज की जेन-जी व जेन अल्फा उसके सबसे बड़े हितधारक भी हैं और सबसे बड़े निर्माता भी।

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