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दुनिया अफगानी बेटियों की सुध कब लेगी: काबुल पर काबिज तालिबान ने पढ़ाई रोकी, हैरानी इतिहास दोहराए जाने पर नहीं

Wed, 19 Aug 2026 01:11 PM IST
ज्योति भास्कर गजल हबीबयार, ओटावा यूनिवर्सिटी में शोधार्थी
गजल हबीबयार, ओटावा यूनिवर्सिटी में शोधार्थी Published by: ज्योति भास्कर Updated Wed, 19 Aug 2026 01:11 PM IST
सार

1996 के बाद 2021 में दोबारा काबुल पर काबिज हुए तालिबान द्वारा लड़कियों की छठी कक्षा के बाद पढ़ाई पर लगाई गई रोक अब भी जारी है। हैरानी इस पर नहीं कि इतिहास खुद को दोहरा रहा है, बल्कि इस पर है कि इस बार दुनिया अनजान नहीं है।

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plight of Afghan daughters ban on girl education in Taliban ruled Kabul When will the world take note
अफगानिस्तान की आधी आबादी (सांकेतिक) - फोटो : अमर उजाला प्रिंट \ एजेंसी

विस्तार

अगस्त 2021 में तालिबान ने काबुल पर दोबारा कब्जा कर लिया। इसके कुछ ही हफ्तों बाद लड़कियों के छठी कक्षा से आगे पढ़ने पर रोक लगा दी गई। यह रोक अब भी लगी हुई है। अफगानिस्तान दुनिया का इकलौता देश है, जहां लड़कियों और महिलाओं के सेकेंडरी और उच्च शिक्षा हासिल करने पर आधिकारिक रोक है। इसके बाद के वर्षों में अफगान महिलाओं को उन अधिकांश क्षेत्रों में काम करने से भी रोक दिया गया, जहां वे पहले काम करती थीं।

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करीब 22 लाख किशोर लड़कियां लगभग 1,800 दिनों से सेकेंडरी स्कूल नहीं जा पा रही हैं। यूनिसेफ के 2026 के विश्लेषण के मुताबिक, 2030 तक इन पाबंदियों के कारण अफगानिस्तान में करीब 20,000 महिला शिक्षकों और 5,400 स्वास्थ्यकर्मियों की नौकरियां जा सकती हैं। इन प्रतिबंधों से देश को हर साल करीब 8.4 करोड़ अमेरिकी डॉलर का आर्थिक नुकसान हो रहा है। सितंबर 2025 से तालिबान ने अफगान महिलाओं, यहां तक कि संयुक्त राष्ट्र (यूएन) की महिला कर्मचारियों के यूएन कार्यालयों में प्रवेश पर भी रोक लगा दी है। जनवरी 2026 में वह वेतन भी मिलना बंद हो गया, जो 2021 से उन्हें घर पर रहने के दौरान दिया जा रहा था। मैंने यह सब पहले भी देखा है। 1996 में तालिबान ने पहली बार काबुल पर कब्जा किया था। इस बार की पाबंदियों में सबसे हैरान करने वाली बात यह नहीं है कि इतिहास खुद को दोहरा रहा है, बल्कि यह है कि इस बार दुनिया अनजान नहीं है। फिर भी, दुनिया की सबसे बड़ी नाकामी यही है कि इस सच को जानने के बावजूद तालिबान पर इसका कोई असर नहीं पड़ा है।
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तालिबान के कब्जे के कुछ ही दिनों के अंदर अफगान महिलाओं ने काबुल की सड़कों पर ‘रोटी, काम, आजादी’ का नारा लगाना शुरू कर दिया था। यह नारा बुनियादी मानवाधिकारों, जैसे शिक्षा और रोजगार की मांग करता है, जबकि उन्हें सार्वजनिक जीवन से पूरी तरह मिटाने की कोशिश की जा रही है। इस दौरान अफगान महिलाओं के समूहों ने कई विरोध प्रदर्शन किए। इनमें शामिल महिलाओं को गिरफ्तारी, यातना और हत्या तक का सामना करना पड़ा। दमन इतना कड़ा रहा कि उन्हें अपने विरोध की गतिविधियां गुप्त रूप से चलाने के लिए मजबूर होना पड़ा। हाल ही में, फरवरी 2026 में लड़कियां एक बार फिर काबुल की सड़कों पर उतरीं और शिक्षा के अधिकार की मांग की। उन्होंने विरोध का एक शांत, लेकिन प्रभावी रास्ता चुना। उन्होंने घरों में चलने वाले गुप्त स्कूलों का अनौपचारिक नेटवर्क तैयार किया है, जहां उन लड़कियों को पढ़ाया जाता है, जिनके लिए सामान्य कक्षाओं के दरवाजे बंद हैं। महिलाएं ऐसा इसलिए कर रही हैं, क्योंकि उनके लिए यह काम कोई और नहीं करेगा और इसे करना जरूरी है।
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तालिबान से अंतरराष्ट्रीय बातचीत का प्रमुख माध्यम यूएन की अगुआई वाली दोहा प्रक्रिया है। 2023 से तालिबान प्रतिनिधियों के साथ कई दौर की बातचीत हो चुकी है। इसका उद्देश्य अफगानिस्तान को फिर से वैश्विक समुदाय का हिस्सा बनाना है। इसमें सामान्य राजनयिक संबंध, तालिबान सरकार को औपचारिक मान्यता और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं तथा व्यापार में अफगानिस्तान की सामान्य भागीदारी जैसे मुद्दे शामिल हैं। तालिबान के दबाव में महिलाओं और अफगान नागरिक समाज संगठनों को मुख्य बातचीत से बाहर रखा गया है। वे अलग से और मुख्य वार्ता से इतर बैठकों में हिस्सा लेते रहे हैं। अफगान इंडिपेंडेंट ह्यूमन राइट्स कमीशन की पूर्व अध्यक्ष सीमा समर का कहना है कि भागीदारी के लिए तालिबान की शर्तें स्वीकार करके संयुक्त राष्ट्र अनजाने में उन्हीं नीतियों को वैधता देने का जोखिम उठा रहा है, जिनका वह विरोध करने का दावा करता है। वहीं, अफगानिस्तान में यूएन सहायता मिशन की डिप्टी स्पेशल रिप्रेजेंटेटिव और प्रभारी अधिकारी जॉर्जेट गैगनॉन ने उसी सत्र में इसके उलट बात कही। उनका कहना था कि भले ही प्रगति धीमी हो, पर सिद्धांतों पर आधारित और व्यावहारिक जुड़ाव बनाए रखना जरूरी है। यूएन के मंच पर सामने आया यह मतभेद उसी स्थिति को उजागर करता है, जिसकी ओर अफगान महिलाएं वर्षों से दुनिया का ध्यान खींचती रही हैं-चिंता जताने वाले बयान लगातार आते हैं, लेकिन उनका तालिबान पर कोई असर नहीं पड़ता।

सितंबर 2024 में ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, जर्मनी व नीदरलैंड ने सीईडीएडब्ल्यू के तहत अफगानिस्तान की जिम्मेदारियों को औपचारिक रूप से उठाया। सीईडीएडब्ल्यू महिलाओं के खिलाफ भेदभाव खत्म करने से जुड़ा संयुक्त राष्ट्र का कन्वेंशन है, जिसे अफगानिस्तान ने 2003 में मंजूरी दी थी। इस पहल के जरिये पहली बार किसी देश को लैंगिक भेदभाव के लिए दुनिया की सर्वोच्च अदालत के सामने जवाबदेह ठहराने की कोशिश की गई। पर, दो साल बाद भी यह मामला अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (आईसीजे) तक नहीं पहुंचा है। जब नीदरलैंड व कनाडा ने सीरिया के खिलाफ यातना के मामले में ऐसी ही प्रक्रिया अपनाई थी, तो उन्होंने बिना देरी हर चरण पूरा किया। 2022 में बातचीत रुकने के बाद उन्होंने तुरंत मध्यस्थता की मांग की। जब सीरिया तय छह महीने की समय-सीमा में शामिल नहीं हुआ, तो दोनों देशों ने 2023 में आईसीजे में मामला दायर करके एक बाध्यकारी आदेश हासिल किया। अफगानिस्तान के खिलाफ इस प्रक्रिया का इस्तेमाल करने के बावजूद अब तक कोई बड़ी सफलता नहीं मिली है। मामला वहीं अटका हुआ है, जहां से शुरू हुआ था। अफगान महिलाएं और उनके पक्ष में खड़े देश भी सीरिया जैसे त्वरित समाधान के हकदार हैं।


मैं इन बातों को अच्छी तरह समझती हूं, क्योंकि मैंने खुद भी ऐसा दौर देखा है। 1996 में तालिबान के काबुल पर कब्जे के बाद हमें रेडियो से पता चला कि हमें अगली कक्षा में भेज दिया गया है और लड़कियों के स्कूल बंद रहेंगे। मेरे माता-पिता मुझे और मेरी बहन को पढ़ाई जारी रखने के लिए पाकिस्तान ले गए। ऐसा फैसला कई अफगान परिवार नहीं कर सकते थे। मैं अफगान कैबिनेट में डायरेक्टर, फिर डिप्टी मिनिस्टर और बाद में माइंस और पेट्रोलियम की कार्यवाहक मंत्री बनने वाली पहली महिला बनी। मेरी पीढ़ी के लिए हालात बदल गए थे। पर, इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि आज की पीढ़ी के लिए भी ऐसा ही होगा। पिछले पांच वर्षों में अफगान महिलाओं ने साबित किया है कि वे इस पाबंदी को हमेशा के लिए स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं। अब यह सवाल पूछना जरूरी है कि जब अफगान महिलाएं हार मानने को तैयार नहीं हैं, तो बाकी दुनिया ने इतने कम पर ही समझौता क्यों कर लिया है।  -द कन्वर्सेशन

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