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भारत की साख अब भी बरकरार है: अर्थव्यवस्था तेजी से आगे बढ़ रही है, पर कुछ चुनौतियां भी हैं

Tue, 18 Aug 2026 01:48 PM IST
Jayantilal Bhandari जयंतीलाल भंडारी
Updated Tue, 18 Aug 2026 01:48 PM IST
सार

फिच व अन्य संस्थाओं की रेटिंग के अनुसार, वैश्विक तनाव व अनिश्चितताओं के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था तेजी से आगे बढ़ रही है, पर कुछ चुनौतियां भी हैं।

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India's credibility remains intact: the economy is growing rapidly, though there are global challenges.
भारत के विकास की रफ्तार रहेगी जारी - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

हाल ही में वैश्विक रेटिंग एजेंसी ‘फिच रेटिंग्स’ ने भारत की सॉवरेन रेटिंग को ‘बीबीबी माइनस’ पर स्थिर परिदृश्य के साथ यथावत रखा है। फिच ने कहा है कि वैश्विक तनावों और तेल बाजार के उतार-चढ़ाव का भारतीय अर्थव्यवस्था पर कोई दीर्घकालिक या स्थायी नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ा है। भारत ने वैश्विक झटकों का सफलतापूर्वक सामना किया है और सकारात्मक आर्थिक वृद्धि बनाए रखी है। फिच ने रेटिंग तय करते समय नीतिगत विश्वसनीयता, बाहरी वित्तीय ढांचे और ऋण वहन करने की क्षमता का विस्तृत विश्लेषण किया है।

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भारत के मामले में इन सभी मानकों पर सकारात्मक स्थिति देखने को मिली है। निरंतर सुधरती नीतिगत विश्वसनीयता और सुदृढ़ आर्थिक नीतियों ने देश की बाजार क्षमता को अभूतपूर्व रूप से बढ़ाया है। उच्च विकास दर के बल पर सरकार के कुल ऋण अनुपात को नीचे लाने में सफलता मिल रही है, जो वित्तीय साख को मजबूती प्रदान करती है। 2026-27 के बजट में ऋण-जीडीपी अनुपात 55.6 प्रतिशत रहने का अनुमान है, जो पिछले वर्ष के 56.1 फीसदी से बेहतर स्थिति है। सरकार का लक्ष्य मार्च 2031 तक इसे घटाकर 50 प्रतिशत पर लाना है।
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उल्लेखनीय है कि एसएंडपी ग्लोबल ने भी भारत की दीर्घकालिक साख को सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ ‘बीबीबी माइनस’ श्रेणी में रखा है। इसका मुख्य आधार भारत का शानदार आर्थिक प्रदर्शन और सरकार की सुदृढ़ नीतिगत दिशा है। मूडीज रेटिंग्स ने भारत की साख को स्थिर दृष्टिकोण के साथ ‘बीएए3’ के स्तर पर रखा है, जो सुरक्षित निवेश श्रेणी का परिचायक है। इन साख निर्धारणों के मूल में भारत का मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार, घरेलू मांग में जारी तेजी और संतुलित बैंकिंग प्रणाली है। हालांकि, उच्च सरकारी कर्ज और राजकोषीय घाटा अब भी साख सुधार में बाधक हैं, जिनसे निपटने के प्रयास जारी हैं।
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भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था बना हुआ है। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने मजबूत घरेलू संकेतों के आधार पर विकास दर के अपने अनुमान को बढ़ाकर 6.7 प्रतिशत कर दिया है, जबकि अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने इसे 6.4 प्रतिशत पर आकलित किया है। भारत की विकास दर को गति देने में तीन प्रमुख कारकों की मुख्य भूमिका रही है। केंद्रीय बैंक द्वारा नीतिगत दरों को स्थिर और संतुलित रखने से व्यापारिक गतिविधियों और निजी निवेश को बड़ा प्रोत्साहन मिला है। सरकार द्वारा बुनियादी ढांचे और पूंजीगत विकास पर लगातार किए जा रहे बड़े खर्च ने आर्थिक पहिये को थमने नहीं दिया है। विशाल घरेलू उपभोक्ता आधार के कारण वैश्विक उतार-चढ़ाव का प्रभाव भारतीय बाजारों पर सीमित रहा है।

भारत आज दुनियाभर के निवेशकों के लिए आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। आरबीआई की नई रियायती स्वैप सुविधा को वैश्विक स्तर पर व्यापक समर्थन मिला है। इस योजना ने महज दो महीने से भी कम समय में 2013 का 34 अरब डॉलर फंड जुटाने का रिकॉर्ड तोड़ दिया है। हाल ही में प्रकाशित ‘एसबीआई रिसर्च’ की रिपोर्ट के अनुसार, स्वैप योजना की समयावधि समाप्त होने तक कुल विदेशी फंड प्रवाह 80 से 85 अरब डॉलर तक पहुंचने की संभावना है। साथ ही, इस समय भारतीय शेयर बाजार में विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) की वापसी के स्पष्ट संकेत देखने को मिल रहे हैं। 31 जुलाई तक भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 692 अरब डॉलर से अधिक पहुंच गया, जो अर्थव्यवस्था और वित्तीय स्थिरता को मजबूती देता है। इससे विदेशी संस्थागत निवेशकों का विश्वास बढ़ेगा, वैश्विक ऋण भुगतान व प्रबंधन आसान होगा और घरेलू बाजार में महंगाई को नियंत्रित रखना संभव हो सकेगा।


हालांकि, इन सबके बीच कई चुनौतियां भी दिखाई दे रही हैं। भारत के सामने वैश्विक अनिश्चितता, भू-राजनीतिक तनाव, आपूर्ति शृंखला में बाधाएं और 55.6 प्रतिशत का कर्ज-जीडीपी अनुपात प्रमुख चुनौतियां हैं। युवाओं के लिए औपचारिक रोजगार व कौशल विकास बढ़ाना भी एक कठिन चुनौती है। कौशल विकास सहित रोजगार सृजन पर खर्च बढ़ाने का दबाव भी बढ़ गया है। बुनियादी ढांचे, सेमीकंडक्टर मिशन 2.0 और बायोफार्मा क्षेत्रों में पूंजीगत व्यय को बढ़ावा देकर तथा कर व्यवस्था को सरल बनाकर निवेश को प्रोत्साहित करना होगा। सिंचाई, कोल्ड-चेन बुनियादी ढांचे और फसल विविधीकरण में निवेश बढ़ाना होगा। एमएसएमई को सस्ता ऋण व तकनीकी उन्नयन उपलब्ध कराना होगा। शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं में आवंटन बढ़ाकर श्रम उत्पादकता में सुधार करना होगा। साथ ही, देश में बढ़ते भ्रष्टाचार और बढ़ती मिलावटखोरी जैसी चुनौतियों पर भी नियंत्रण लगाना होगा। ऐसा होने पर ही देश की सॉवरेन रेटिंग और विकास दर को बढ़ाया जा सकेगा।

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