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मुद्दा: तकनीक का जिम्मेदार इस्तेमाल जरूरी, ताकि जनता का भरोसा कायम रहे; सोशल मीडिया के साथ चुनौती भी बढ़ी
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सोशल मीडिया के प्रसार के बीच न्याय व्यवस्था में जनता के भरोसे की चुनौती भी बढ़ी (सांकेतिक)
- फोटो :
एआई जनरेटेड
विस्तार
वकीलों द्वारा सोशल मीडिया का बढ़ता इस्तेमाल, पेशेवर नैतिकता, विज्ञापन, क्लाइंट बनाने की कोशिश और कानूनी पेशे के व्यावसायीकरण से जुड़े अहम सवाल खड़े करता है। इंस्टाग्राम, यूट्यूब और फेसबुक जैसे प्लेटफॉर्म के इस्तेमाल से प्रमोशनल रील्स, पैसे कमाने वाले कानूनी कंटेंट, इन्फ्लुएंसर के साथ मिलकर काम करने, पेड विज्ञापनों और क्लाइंट बनाने के लिए गंभीर विनियामक चिंताएं पैदा हुई हैं।
इसी को देखते हुए, बार काउंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआई) ने वकीलों, विधि छात्रों और लीगल इंटर्न के डिजिटल व सोशल मीडिया पर व्यवहार को लेकर निर्देश जारी किए हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने भी बीसीआई को एक जनहित याचिका को लेकर नोटिस जारी किया है। याचिका में वकीलों द्वारा डिजिटल विज्ञापन, क्लांइट बनाने की कोशिश और प्रचार गतिविधियों पर सख्त नियम बनाने के साथ-साथ उनके लिए एक व्यापक ‘डिजिटल एथिक्स कोड’ और ‘डिजिटल पेशेवर आचरण संहिता’ बनाने की मांग की गई है। मुख्य चिंता इस बात की है कि क्या डिजिटल जुड़ाव ‘एडवोकेट्स एक्ट, 1961’, ‘बार काउंसिल ऑफ इंडिया के नियमों’, पेशेवर नैतिकता, न्यायिक मर्यादा व न्याय व्यवस्था की गरिमा के अनुरूप है या नहीं। याचिका में आरोप है कि वकील कोर्ट की वर्दी पहनकर कोर्ट परिसर के अंदर कंटेंट रिकॉर्ड करते हैं। डिजिटल पब्लिसिटी के लिए कोर्ट परिसर और पेशेवर वर्दी का इस्तेमाल पेशेवर पहनावे और आचरण से जुड़े नियमों का उल्लंघन है। याचिका में एडवोकेट्स एक्ट, 1961 और बीसीआई के नियमों, खासकर नियम 36, और प्रतिबंधित डिजिटल तरीकों से क्लाइंट बनाने में शामिल वकीलों के खिलाफ एडवोकेट्स एक्ट की धारा 35 के तहत अनुशासनात्मक कार्रवाई की मांग की गई है।
इसके अलावा, वकीलों को निर्देश दिया गया है कि वे कोर्ट परिसर, कोर्ट रूम, कॉरिडोर, बार रूम, चैंबर या न्यायिक इमारतों के अंदर ऐसी रील, वीडियो, फोटो या प्रचार सामग्री न बनाएं, जो पेशेवर गरिमा और मर्यादा के खिलाफ हो। बैंड, गाउन और रोब का इस्तेमाल व्यक्तिगत हितों के लिए नहीं किया जा सकता है। कोर्ट की कार्यवाही रिकॉर्ड नहीं की जा सकती, जब तक कोर्ट के नियम इसकी अनुमति न दें या नियम न होने पर कोर्ट या रजिस्ट्रार जनरल से लिखित मंजूरी न मिली हो।
बीसीआई ने मनगढ़ंत फैसलों, झूठे हवाला देने, कॉज लिस्ट में हेरफेर, पेश होने या पेशेवर सफलता के झूठे दावों, वकीलों या जजों की नकल करने और एआई से बने कंटेंट को असली कोर्ट कंटेंट के तौर पर पेश करने के मामलों पर भी बात की है। ऐसे व्यवहार के लिए पेशेवर, सिविल, आपराधिक, कोर्ट की अवमानना, प्राइवेसी या प्लेटफॉर्म से जुड़े नतीजे भुगतने पड़ सकते हैं। जिम्मेदार कानूनी जागरूकता, एकेडमिक चर्चा, सही कानूनी रिपोर्टिंग, लोगों को कानूनी शिक्षा देना, सांविधानिक जानकारी, निष्पक्ष केस-लॉ अपडेट, लेक्चर, लेख, सेमिनार और कानूनी सिद्धांतों पर चर्चा की अनुमति है। शॉर्ट-फॉर्म कंटेंट (जैसे रील्स, शॉर्ट्स, वीडियो, पोस्ट, थ्रेड्स और पॉडकास्ट क्लिप) का इस्तेमाल किया जा सकता है, बशर्ते वह सही हो, संदर्भ के अनुसार हो। विधि छात्रों व इंटर्न के लिए सुनवाई की रिकॉर्डिंग करना मना है। पंजीकरण चाहने वाले उम्मीदवारों को डिजिटल संयम और पेशेवर गोपनीयता के बारे में शपथ-पत्र देना होगा। लीगल एजुकेशन सेंटर्स को प्रवेश के समय और इंटर्नशिप से पहले स्टूडेंट्स से लिखित अंडरटेकिंग लेनी होगी।
स्टेट बार काउंसिल को डिजिटल एथिक्स कमेटियां और ऑनलाइन शिकायत सिस्टम बनाने होंगे। नियमों के उल्लंघन को मामूली, गंभीर या बेहद गंभीर श्रेणी में बांटा जा सकता है। मामूली उल्लंघन पर काउंसलिंग या चेतावनी दी जा सकती है, जबकि गंभीर मामलों को अनुशासनात्मक या अवमानना की कार्यवाही के लिए भेजा जा सकता है। बीसीआई के निर्देश और अनिल पांडे की जनहित याचिका में चल रही कार्यवाही से यह पता चलता है कि कानूनी पेशे की नैतिक जिम्मेदारियों और डिजिटल जुड़ाव के बीच तालमेल बिठाने की जरूरत है।
जनहित याचिका से मौजूदा ढांचे की पर्याप्तता और वकीलों के लिए एक व्यापक ‘डिजिटल एथिक्स कोड‘ और ‘डिजिटल पेशेवर आचरण संहिता’ की जरूरत की जांच करने का मौका मिल सकता है। आखिरकार, डिजिटल पहुंच और ऑनलाइन लोकप्रियता पेशेवर काबिलियत, नैतिक संयम, न्यायिक मर्यादा या कानूनी पेशे की गरिमा से ऊपर नहीं हो सकती। तकनीक का जिम्मेदार इस्तेमाल न्याय व्यवस्था में जनता का भरोसा बनाए रखने के मुख्य मकसद के अनुरूप होना चाहिए।
-लेखक पूर्व असिस्टेंट सॉलिसिटर जनरल एवं वरिष्ठ अधिवक्ता हैं।