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तालिबान के पांच साल: सत्ता तो मजबूत हुई, लेकिन अफगानिस्तान क्यों और गहरे संकट में फंसता जा रहा है?

Mon, 17 Aug 2026 06:18 AM IST
Mahendra Ved महेंद्र वेद
Updated Mon, 17 Aug 2026 06:18 AM IST
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सार
Afghanistan Humanitarian Crisis: अमेरिका की वापसी के बाद अफगानिस्तान की सत्ता पर तालिबान के कब्जे को 15 अगस्त को पांच साल पूरे हो गए। इस दौरान तालिबान ने अपनी सत्ता मजबूत की, लेकिन महिलाओं की आजादी, शिक्षा, रोजगार, अर्थव्यवस्था और मानवाधिकारों की स्थिति गंभीर बनी हुई है। देश कूटनीतिक रूप से अलग-थलग है और पाकिस्तान से तनाव बढ़ा है। ऐसे में सवाल है कि क्या तालिबान की मजबूत दिखती सत्ता भीतर से कमजोर हो रही है? आइए, सबकुछ विस्तार से जानते हैं...
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Five Years of Taliban Rule: Power Has Grown Stronger, But Why Is Afghanistan Sinking Deeper Into Crisis?
क्या अफगानिस्तान का भविष्य अंधेरे में है? - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

अमेरिका के अफगानिस्तान से हटने के बाद तालिबान ने 15 अगस्त को सत्ता पर कब्जा किया था। अब इस घटना को पांच साल पूरे हो चुके हैं। तालिबान के लिए यह दिन सत्ता हासिल करने की याद जरूर है, लेकिन अफगानिस्तान के आम लोगों के लिए यह पांच साल संकट, बंदिश और अनिश्चितता के रहे हैं। करीब 4.5 करोड़ की आबादी वाला यह देश कभी ‘एशिया का दिल’ कहा जाता था। आज वहां आर्थिक परेशानी, बेरोजगारी, मानवीय संकट और अंतरराष्ट्रीय अलगाव एक साथ दिखाई देते हैं। सबसे बड़ी चिंता यह है कि हालात सुधारने की उम्मीद फिलहाल बहुत कमजोर नजर आती है।

महिलाओं और लड़कियों की स्थिति इतनी खराब क्यों?

तालिबान के पांच साल के शासन का सबसे गंभीर असर महिलाओं और लड़कियों पर पड़ा है। संयुक्त राष्ट्र की जुलाई 2026 की रिपोर्ट के हवाले से दिए गए विवरण में अफगानिस्तान की स्थिति को महिलाओं के लिए दुनिया का सबसे गंभीर संकट बताया गया है। महिलाओं की शिक्षा, रोजगार और आने-जाने की आजादी पर कई तरह की पाबंदियां लगाई गई हैं। यहां तक कि एक महिला को अकेले राशन खरीदने से रोकने और उसे सामान देने वाले दुकानदार को दंडित करने जैसी घटनाएं भी सामने आई हैं। एक शिक्षिका को कपड़ों से जुड़े नियमों के कारण अपनी ही कक्षा से बाहर कर दिया गया। सवाल यह है कि जिस समाज की आधी आबादी को ही आगे बढ़ने का मौका न मिले, वह देश आखिर कैसे आगे बढ़ेगा?

शिक्षा और बच्चों पर संकट का क्या असर पड़ रहा?

तालिबान की नीतियों का असर केवल महिलाओं तक सीमित नहीं है। इसका सीधा प्रभाव बच्चों और आने वाली पीढ़ी पर भी पड़ रहा है। दिए गए विवरण के मुताबिक, तालिबान ने शिक्षा और महिलाओं के काम करने से जुड़े कई प्रतिबंध लगाए हैं। दूसरी ओर, ‘सेव द चिल्ड्रेन’ के हवाले से कहा गया है कि करीब 40 लाख बच्चे कुपोषण का सामना कर रहे हैं। यानी एक तरफ बच्चों की शिक्षा और भविष्य पर संकट है, तो दूसरी तरफ उनके स्वास्थ्य की स्थिति भी चिंता बढ़ा रही है। अगर यह स्थिति लंबे समय तक बनी रही, तो अफगानिस्तान को आने वाले वर्षों में एक ऐसी पीढ़ी का सामना करना पड़ सकता है, जिसके पास शिक्षा और रोजगार दोनों के अवसर बेहद सीमित होंगे।

क्या तालिबान अंतरराष्ट्रीय दबाव से बेपरवाह हो गया?

तालिबान पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलगाव और प्रतिबंधों का दबाव बना हुआ है। काबुल को बहुत कम देशों से राजनयिक मान्यता मिली है। लेकिन इस अलगाव के बावजूद तालिबान सत्ता पर अपनी पकड़ बनाए हुए है। इसके पीछे उसकी प्रशासनिक पकड़, कर वसूली और देश के भीतर सत्ता के केंद्रीकरण की भूमिका है। तालिबान सड़क, बांध और नहर जैसे निर्माण कार्य भी कर रहा है। यानी एक तरफ मानवाधिकारों को लेकर उसकी आलोचना हो रही है, दूसरी तरफ वह यह दिखाने की कोशिश कर रहा है कि वह शासन चलाने में सक्षम है। यही विरोधाभास तालिबान के पांच साल के शासन को समझने के लिए सबसे अहम है।

आर्थिक प्रतिबंधों का असर किस पर पड़ा?

अफगानिस्तान पर लगाए गए आर्थिक प्रतिबंधों और अंतरराष्ट्रीय अलगाव का सबसे ज्यादा असर आम लोगों पर पड़ा है। तालिबान के प्रमुख नेताओं पर प्रतिबंध लगाए गए हैं और अमेरिका में मौजूद अफगानिस्तान की सरकारी संपत्ति का बड़ा हिस्सा फ्रीज है। यूरोपीय संघ और विश्व बैंक ने भी पुनर्निर्माण से जुड़ी कई योजनाओं को रोक दिया है। मानवीय मदद अब छोटे स्तर पर और मुख्य रूप से अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं तथा गैर-सरकारी संगठनों के माध्यम से पहुंचाई जा रही है। इसका परिणाम यह है कि सरकार और आम जनता के बीच आर्थिक संकट का बोझ अलग-अलग तरीके से बंट रहा है। सत्ता पर बैठे लोगों की स्थिति और आम अफगान की जिंदगी में बड़ा अंतर दिखाई देता है।

चीन, रूस और भारत जैसे देश तालिबान से संबंध क्यों बढ़ा रहे?

तालिबान को पूरी दुनिया ने स्वीकार नहीं किया है, लेकिन क्षेत्रीय ताकतों ने उसके साथ अपने रिश्ते पूरी तरह खत्म भी नहीं किए। चीन, रूस, ईरान, पाकिस्तान और भारत जैसे देशों ने किसी न किसी स्तर पर राजनयिक संबंध बहाल किए हैं। इसके पीछे सुरक्षा, व्यापार और क्षेत्रीय हित महत्वपूर्ण हैं। अफगानिस्तान की भौगोलिक स्थिति उसे मध्य और दक्षिण एशिया के बीच महत्वपूर्ण बनाती है। इसलिए कई देशों के लिए तालिबान को पूरी तरह नजरअंदाज करना आसान नहीं है। दूसरी ओर, यूरोपीय देशों की दिलचस्पी भी अफगान प्रवासियों और शरण चाहने वालों की वापसी जैसे मुद्दों के कारण बनी हुई है।

अमेरिका की अफगानिस्तान में अब क्या भूमिका रह गई?

अमेरिका ने 2021 में अफगानिस्तान से अपनी सेना वापस बुला ली थी, लेकिन उसका प्रभाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। तालिबान के सत्ता में आने से पहले अमेरिका अफगानिस्तान को सबसे ज्यादा मदद देने वाले देशों में था। अब अमेरिकी मदद काफी कम हो गई है और उसका बड़ा हिस्सा संयुक्त राष्ट्र तथा स्वयंसेवी संगठनों के माध्यम से पहुंचता है। अमेरिका ने तालिबान के प्रमुख सदस्यों पर प्रतिबंध भी लगाए हैं। साथ ही अमेरिका में मौजूद अफगानिस्तान की करीब नौ अरब डॉलर की सरकारी संपत्ति फ्रीज है। इसलिए जब तक अमेरिका और तालिबान के बीच संबंध सामान्य नहीं होते, तब तक दूसरे देशों के लिए भी खुलकर आगे बढ़ना मुश्किल रहेगा।

क्या तालिबान ने समाज को पूरी तरह नियंत्रित कर लिया?

तालिबान ने अफगान समाज पर कड़ा नियंत्रण स्थापित किया है। धार्मिक और जातीय अल्पसंख्यकों के पूजा स्थलों पर दबाव और आलोचना करने वालों पर कार्रवाई जैसे आरोप लगातार चिंता पैदा करते हैं। असहमति की गुंजाइश सीमित होने से आम लोगों के लिए अपनी बात खुलकर कहना मुश्किल है। इसके साथ ही बेरोजगारी और आर्थिक संकट ने लोगों की परेशानियां बढ़ा दी हैं। सत्ता पर तालिबान की पकड़ मजबूत दिखाई देती है, लेकिन किसी समाज में लंबे समय तक दबाव बनाए रखना स्थिरता की गारंटी नहीं होता। भीतर जमा असंतोष कभी भी बड़े संकट का रूप ले सकता है।

क्या तालिबान की सबसे बड़ी ताकत उसकी प्रशासनिक पकड़?

तालिबान की एक बड़ी उपलब्धि यह है कि उसने अफगानिस्तान के अधिकांश हिस्सों पर अपना नियंत्रण बनाए रखा है। वह कर वसूल रहा है और प्रशासन को अपने तरीके से चला रहा है। सड़क, बांध और नहरों जैसे बुनियादी ढांचे पर काम भी किया जा रहा है। इसके अलावा, जब किसी पड़ोसी देश ने उसके लिए रास्ते मुश्किल किए, तो उसने व्यापार के दूसरे रास्ते तलाश लिए। ईरान, भारत और मध्य एशियाई देशों के साथ व्यापार पर निर्भरता बढ़ाना इसी रणनीति का हिस्सा है। इससे यह साफ होता है कि अंतरराष्ट्रीय अलगाव के बावजूद तालिबान अपने लिए आर्थिक और राजनीतिक विकल्प तलाशने की कोशिश कर रहा है।

पाकिस्तान के साथ तालिबान का रिश्ता इतना खराब कैसे हुआ?

तालिबान और पाकिस्तान के रिश्ते कभी बेहद करीबी माने जाते थे, लेकिन अब दोनों के बीच तनाव गंभीर स्तर पर पहुंच चुका है। दिए गए विवरण के मुताबिक, पाकिस्तान ने हाल के महीनों में अफगानिस्तान पर कई हवाई हमले किए हैं। संयुक्त राष्ट्र के हवाले से कहा गया है कि अक्तूबर से अब तक करीब 500 आम नागरिक मारे गए हैं। पाकिस्तान की मुख्य चिंता तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान यानी टीटीपी को लेकर है। पाकिस्तान का आरोप है कि तालिबान टीटीपी को पनाह देता है और अफगानिस्तान में मौजूद हथियारों का इस्तेमाल सीमा के दोनों तरफ किया जा रहा है। इस टकराव ने दोनों देशों के पुराने रिश्तों को नई चुनौती दी है।

लाखों अफगानों की वापसी क्यों चिंता बढ़ा रही?

पाकिस्तान और ईरान से बड़ी संख्या में अफगानों की वापसी ने मानवीय संकट को और गहरा कर दिया है। दिए गए विवरण के मुताबिक, जनवरी 2025 से दोनों देशों से करीब 40 लाख अफगानों को जबर्दस्ती वापस भेजा गया है। इसे दशकों में दुनिया की सबसे बड़ी ‘रिवर्स माइग्रेशन’ घटनाओं में से एक बताया गया है। जिन लोगों को वापस अफगानिस्तान लौटना पड़ रहा है, उनके सामने रोजगार, घर, भोजन और सुरक्षा जैसी बुनियादी चुनौतियां हैं। पहले से आर्थिक संकट झेल रहे देश में अचानक लाखों लोगों की वापसी सामाजिक और आर्थिक दबाव को और बढ़ा सकती है।

क्या सुरक्षा के मोर्चे पर भी तालिबान के सामने नई चुनौती?

तालिबान के लिए खतरा केवल आर्थिक या राजनीतिक नहीं है। उसे अल-कायदा और इस्लामिक स्टेट से जुड़े हथियारबंद गुटों की चुनौती का भी सामना करना पड़ रहा है। ये संगठन तालिबान को सत्ता से हटाने की कोशिश कर रहे हैं। दूसरी तरफ पाकिस्तान के साथ तनाव भी सुरक्षा स्थिति को जटिल बना रहा है। इसका मतलब यह है कि तालिबान एक साथ कई मोर्चों पर दबाव झेल रहा है। बाहर से वह मजबूत दिखाई देता है, लेकिन भीतर और सीमा पर पैदा हो रही चुनौतियां उसकी स्थिरता की परीक्षा ले रही हैं।

क्या बेरोजगार युवा कट्टरपंथ के लिए आसान निशाना बन सकते?

अफगानिस्तान की सबसे बड़ी समस्याओं में बेरोजगारी और युवाओं के लिए अवसरों की कमी शामिल है। बड़ी संख्या में युवा अगर शिक्षा और रोजगार से दूर रहेंगे, तो उनके सामने भविष्य का रास्ता और संकरा होता जाएगा। पाकिस्तान के साथ बढ़ती दुश्मनी और आर्थिक अवसरों की कमी इस स्थिति को और गंभीर बना सकती है। ऐसे माहौल में कट्टरपंथी संगठनों को युवाओं को अपने साथ जोड़ने का मौका मिल सकता है। इसलिए अफगानिस्तान का संकट सिर्फ वहां के लोगों का आर्थिक या सामाजिक संकट नहीं है, बल्कि इसका असर पूरे क्षेत्र की सुरक्षा पर पड़ सकता है।

क्या तालिबान की सत्ता वास्तव में उतनी मजबूत है जितनी दिखती?

ऊपरी तौर पर तालिबान की सत्ता मजबूत दिखाई देती है। अफगानिस्तान के अधिकांश हिस्सों पर उसका नियंत्रण है, कर व्यवस्था उसके हाथ में है और कोई बड़ा राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी उसके सामने नहीं है। लेकिन सत्ता का मजबूत दिखना और देश का स्थिर होना दो अलग बातें हैं। आर्थिक संकट, बेरोजगारी, महिलाओं पर प्रतिबंध, अंतरराष्ट्रीय अलगाव, आतंकी संगठनों की चुनौती और पाकिस्तान के साथ संघर्ष जैसे मुद्दे उसके सामने खड़े हैं। ये सभी मिलकर उस स्थिरता के आवरण में दरार पैदा कर रहे हैं, जिसे तालिबान अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि बताता है।

पांच साल बाद तालिबान के सामने सबसे बड़ा सवाल क्या?

तालिबान ने पांच साल में सत्ता पर अपनी पकड़ जरूर मजबूत की है, लेकिन वह अफगानिस्तान को बेहतर भविष्य देने में कितना सफल हुआ, यह सवाल अब भी बना हुआ है। किसी देश की स्थिरता केवल इस बात से तय नहीं होती कि सरकार कितने हिस्से पर नियंत्रण रखती है। लोगों को शिक्षा, रोजगार, सुरक्षा, सम्मान और आगे बढ़ने का अवसर भी चाहिए। अफगानिस्तान में इन मोर्चों पर संकट गहरा है। इसलिए अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि तालिबान की सत्ता अस्तित्व के संकट में है। लेकिन इतना साफ है कि उसके शासन में दरार डालने वाली चुनौतियां बढ़ रही हैं। अगर आर्थिक और सामाजिक संकट को दूर करने के रास्ते नहीं निकले, तो आज मजबूत दिखने वाली सत्ता के सामने आने वाले वर्षों में कहीं बड़ी चुनौती खड़ी हो सकती है।

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