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कृषि में एक नई क्रांति का आगाज: फ्रांस की कंपनी से नई क्रांति का सूत्रपात, टिकाऊ खेती का मार्ग प्रशस्त होगा

Tue, 18 Aug 2026 01:44 PM IST
Vir Singh वीर सिंह
Updated Tue, 18 Aug 2026 01:44 PM IST
सार

वैश्विक कृषि में एक नई क्रांति का सूत्रपात फ्रांस की स्टार्टअप कंपनी थाल्या द्वारा किया जा रहा है। हरित क्रांति की तरह यह रासायनिक खादों पर निर्भर नहीं है। यह पौधों की नाइट्रोजन उपयोग क्षमता बढ़ाने वाले आधुनिक जैव-तकनीकी समाधानों पर आधारित है, जो भविष्य की टिकाऊ खेती का मार्ग प्रशस्त करेगी।

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new revolution in agriculture French startup spearheading Changes paving way for sustainable farming in future
वैश्विक कृषि में एक नई क्रांति (सांकेतिक) - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

वैश्विक कृषि में एक नई क्रांति का बिगुल बज गया है। क्रांति का यह बीज अभी फ्रांस की एक स्टार्टअप कंपनी के गर्भ में पल रहा है। थाल्या नामक इस फ्रांसीसी कंपनी का अमेरिका के अनेक बड़े किसानों के साथ अनुबंध हो चुका है। नई खेती के प्रयोग प्रयोगशाला से निकल कर खेतों में पहुंचने लगे हैं। डॉ. नॉर्मन बोरलॉग के नेतृत्व में 1960 के दशक की हरित क्रांति की नींव आनुवंशिक सिद्धांतों पर विकसित उन्नत बीजों पर रखी गई थी। इन बीजों की उच्च उत्पादकता में नाइट्रोजन उर्वरकों की अहम भूमिका रही। आने वाली क्रांति के मूल में है कृषि की नाइट्रोजन उपयोग क्षमता बढ़ाने का जैव-तकनीकी सूत्र। और, कृषि उत्पादन से जुड़ी सबसे बड़ी चुनौतियों के केंद्र में है नाइट्रोजन।

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नाइट्रोजन का नाइट्रेट के रूप में अवशोषण कर पौधे प्रोटीन संश्लेषण करते हैं। प्रोटीन जीवन की संरचना का आधार और पौधों की वृद्धि तथा कृषि फसलों की उत्पादकता की कुंजी है।  किसानों के लिए खेती की लागत में नाइट्रोजन सबसे ऊपर रहता है, जिसकी कीमतों में सबसे अधिक उतार-चढ़ाव होता रहता है और बाजार में कई बार यह उपलब्ध नहीं होता। नकली नाइट्रोजन उर्वरक की घटनाएं भी कई बार सुनने में आती हैं। नाइट्रोजन उर्वरक पर्यावरण प्रदूषण करते हैं, जन स्वास्थ्य को बुरी तरह प्रभावित करते हैं तथा  ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन कर जलवायु परिवर्तन प्रक्रिया को गति देते हैं।
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पौधों की नाइट्रोजन-उपयोग क्षमता कैसे बढ़ाई जा सकती है, इसी का समाधान नई कृषि क्रांति में होगा। यह कृषि क्रांति मिट्टी की अधिकतम उर्वरता को अक्षुण्ण रखते हुए सीमित भूमि पर अधिकतम पैदावार देगी।  ऐसी कृषि पर्यावरण संतुलन पुनर्स्थापित करने, जलवायु परिवर्तन गति को थामने और भारत जैसे कृषि प्रधान देशों में किसानों की सामाजिक-आर्थिक समस्याओं के समाधान में भी सहायक होगी।
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पौधों की नाइट्रोजन उपयोग क्षमता और फसलोत्पादन बढ़ाने के साथ कृषि को पर्यावरण और जलवायु के प्रति निरापद बनाने के लिए जैव-तकनीकी सूत्र है आरएनए। अब तक रोबोट आदि के उपयोग से नाइट्रोजन को सीधे पौधों की जड़ों तक ले जाया जाता है। फिर आरएनए स्प्रे क्यों? वह इसलिए कि आरएनए पौधे के अंदर जाकर काम करता है और उसके डीएनए में परिवर्तन किए बिना ही नाइट्रोजन के प्रति उसकी प्रतिक्रिया को अस्थायी रूप से बदलने की अनुमति देता है। हम उस अवधि में पौधों की नाइट्रोजन क्षमता बढ़ा सकते हैं, जब नाइट्रोजन की मांग सबसे अधिक होती है।  फिर पौधों की कार्यिकी का सबकुछ सामान्य हो जाता है।

आरएनए-आधारित कृषि भविष्य की कृषि है। फ्रांसीसी एग्रीटेक स्टार्टअप थाल्या विशिष्ट बायोस्टिमुलेंट एप्लीकेशन आरएनए इंटरफेरेंस (आरएनएआई) स्प्रे तैयार करने वाली विश्व की पहली कंपनी है। जीवों में डीएनए एक स्रोत कोड के रूप में कार्य करता है, जबकि आरएनए एक सॉफ्टवेयर की तरह कार्य करता है, जो कोशिकाओं को निर्देश देता है कि क्या करना है, तथा प्रोटीन एक अंतिम उत्पाद की तरह होता है। वर्ष 2024 में स्थापित इस कंपनी की सीटीओ और जैव प्रौद्योगिकी विशेषज्ञ हयात सेहकी समझाती हैं कि आरएनए का हस्तक्षेप पूर्णतः प्राकृतिक प्रक्रिया है, जो पौधों, जंतुओं और मनुष्यों में पाया जाता है और पर्यावरण के आधार पर उन निर्देशों को पढ़ने के तरीके को बदल देता है। आरएनए-आधारित कृषि तकनीक इसी जैवरासायनिक प्रक्रिया का लाभ उठाती है। थाल्या ने ऐसा आरएनए अणु डिजाइन किया है, जो पौधे में किसी अन्य आरएनए को अस्थायी रूप से शांत कर देता है, तथा उसे किसी विशेष प्रोटीन का उत्पादन करने से रोकता है। उपयोग किया जाने वाला आरएनएआई स्प्रे पौधे में उन प्रोटीनों को लक्षित करता है, जो पौधे द्वारा नाइट्रोजन के उपयोग की क्षमता को सीमित करती है।

वर्तमान में दुनियाभर में किसानों द्वारा जो नाइट्रोजन फसलोत्पादन के लिए प्रयोग किया जा रहा है, उसका लगभग आधा भाग फसलों द्वारा अवशोषित नहीं होता। यानी किसान ऐसे उर्वरकों के लिए धन खर्च कर रहे हैं, जो उनकी उपज में योगदान नहीं करते। ऊपर से व्यर्थ गई नाइट्रोजन पर्यावरण प्रदूषण करती है, रोग फैलाती है, और जलवायु परिवर्तन प्रक्रिया को तेज करती है। जो नाइट्रोजन पर्यावरण में बिखर जाती है, उसका कुछ भाग जलमार्गों में रिस जाता है, जिसमें से कुछ भूमिगत जल में पहुंच जाता है, जबकि कुछ नाइट्रस ऑक्साइड गैस बनकर वायुमंडल में प्रवेश कर जाता है और ग्रीनहाउस गैस की तरह काम करता है। नाइट्रेट-प्रदूषित पानी पीने से रक्त के हीमोग्लोबिन द्वारा ऑक्सीजन अवशोषण की क्षमता क्षीण हो जाती है, बच्चों में ब्लू बेबी सिंड्रोम नामक घातक रोग पैदा हो जाता है। आरएनए-आधारित खेती से नाइट्रोजन उर्वरकों के उपयोग में 38 प्रतिशत की कमी आएगी, यानी प्रदूषण में कमी और जलवायु परिवर्तन प्रक्रिया में धीमेपन के साथ किसानों का खर्चा भी कम होगा। साथ ही, इस तकनीक से खाद्योत्पादन में आठ प्रतिशत की बढ़ोतरी होगी, जिससे किसानों की आर्थिक आय में वृद्धि होगी।

आरएनए उत्पाद विकसित करने की प्रक्रिया अभी प्रयोग अवस्था में है। प्रयोगशाला से खुले खेतों में उत्पाद का फसलों में उपयोग चुनौतीपूर्ण होगा। खुले खेतों में अल्ट्रावॉयलेट प्रकाश, वर्षा, और प्राकृतिक एंजाइम आरएनए को विघटित कर सकते हैं। ये चुनौतियां तीन प्रकार की हो सकती हैं। एक, आरएनए को पौधे तक पहुंचने के लिए पर्याप्त समय तक सुरक्षित रखना। दो, आरएनए के अणु को पत्तियों की सुरक्षात्मक क्यूटिकल से होते हुए कोशिकाओं में पहुंचाना, जहां वह अपने कार्य करता है, अर्थात आरएनए का अवशोषण। तीन, आरएनए को इस प्रकार डिजाइन करना कि वह अन्य पौधों के जीन या आसपास के जीवों को प्रभावित किए बिना केवल इच्छित लक्ष्य पर ही कार्य करे, अर्थात आरएनए की विशिष्टता।


उन्नत बीजों पर आधारित हरित क्रांति ने अनेक सामाजिक, सांस्कृतिक और पर्यावरणीय विकृतियां पैदा कर दीं। फिर, अानुवंशिक रूपांतरण वाली कुछ बीटी फसलें आईं, जिन्हें अनेक देशों ने प्रतिबंधित कर दिया और किसानों ने भी उन्हें निरस्त कर दिया। कृषि की केवल वही प्रणाली टिकाऊ होगी, जो किसानों की अपेक्षित आय और मानवता की खाद्य सुरक्षा के साथ पर्यावरण संरक्षण और जलवायु नियंत्रण की गारंटी देती हो। संभव है कि आरएनए-आधारित कृषि विश्व को रास आए।    

(लेखक जीबी पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय में पूर्व प्रो. एमेरिटस रहे हैं)

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