सिर्फ बातों से सूरत नहीं बदलने वाली: यमुना की बदहाली दशकों से जारी, प्रदूषण मुक्ति में जनभागीदारी भी जरूरी
सरकारें बदलती रहती हैं, पर यमुना की बदहाली दशकों से जारी है। इसे प्रदूषण से मुक्त करने के लिए सरकार के साथ जनता की भागीदारी भी जरूरी है।
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देश की दूसरी सबसे प्रमुख नदी यमुना का प्रदूषण खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है। संसद में दिए गए आंकड़ों के मुताबिक, अभी तक यमुना की सफाई पर पिछले तीन वित्तीय वर्षों में कुल 5,536 करोड़ रुपये की राशि खर्च की जा चुकी है, जबकि यमुना संरक्षण और प्रदूषण नियंत्रण पर पहले ही लगभग 1,951 करोड़ रुपये खर्च किए जा चुके हैं। इसके अलावा, दिल्ली सरकार के ग्रीन बजट के तहत दिल्ली जल बोर्ड को 6,485 करोड़ रुपये की राशि दी गई। अभी हाल ही में दिल्ली सरकार ने यमुना की सफाई के लिए 4,500 करोड़ की राशि मंजूरी की है। यमुना के जल को साफ करने के साथ-साथ नजफगढ़ ड्रेन की सफाई के लिए 1,000 करोड़ रुपये की परियोजनाओं को दिल्ली सरकार ने मंजूरी दी है। लेकिन, यमुना आजकल न सिर्फ गंदगी व दुर्गंध से बजबजा रही है, बल्कि जहरीली भी हो गई है। ऐसे में, सवाल उठता है कि यमुना को प्रदूषण के दानव से मुक्ति कौन दिलाएगा?
यमुना सीवेज और कारखानों के रासायनिक अपशिष्ट से इतनी विषैली हो गई है कि यह न सिर्फ प्राणी मात्र, बल्कि जलजीवों की सेहत के लिए भी जानलेवा साबित हो रही है। यमुना की मछलियां भी स्वास्थ्य के लिए हानिकारक साबित हो रही हैं। शोध के अनुसार, यहां की मछलियां खाने से या इसका पानी पीने से हार्मोनल असंतुलन, पाचन तंत्र में सूजन और कोशिकाओं को भारी नुकसान हो सकता है। इसका अहम कारण मछलियों के शरीर में माइक्रोप्लास्टिक की भारी मात्रा का पाया जाना है।
यमुनोत्री से निकलकर यमुना नदी उत्तराखंड, हिमाचल, हरियाणा होते हुए उत्तर प्रदेश के प्रयागराज जिले में संगम में जाकर विलीन हो जाती है। वैसे तो यमुना की दशा पूरे प्रवाह क्षेत्र में चिंतनीय है, लेकिन राजधानी दिल्ली के 22 किलोमीटर इलाके में इसके पानी में अमोनिया, फॉस्फेट, बायोकेमिकल, क्रोमियम, बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड (बीओडी), फीकल कोलिफॉर्म, लेड जैसी भारी धातुएं और डिटर्जेंट की मात्रा इतनी अधिक है कि पानी के संपर्क में आने से लोग कैंसर, गंभीर त्वचा रोग, सांस, पेट के संक्रमण, लिवर, तंत्रिका तंत्र आदि जानलेवा रोगों का शिकार हो रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट नौ साल पहले ही आदेश दे चुका है कि नदियों में शोधन के बगैर सीवेज न बहाया जाए, लेकिन न राज्य सरकारों पर इसका कोई असर पड़ा और न ही सीवेज निस्तारण करने वाली एजेंसियों पर कि वह इस मामले में कारगर कदम उठातीं। नतीजा यह है कि नदियों का प्रदूषण लोगों को जानलेवा बीमारियों की सौगात देकर उन्हें मौत के मुंह में धकेल रहा है।
दिल्ली में यमुना को विषाक्त करने में नजफगढ़ और शाहदरा के नालों की अहम भूमिका है। साथ ही, हरियाणा और उत्तर प्रदेश से आकर इसमें गिरने वाले नालों का योगदान भी कुछ कम नहीं है। हालांकि, अब दावा किया जा रहा है कि नजफगढ़ ड्रेन की सफाई से यमुना के प्रदूषण के स्तर में कमी आई है। दिल्ली सरकार दावा कर रही है कि यमुना की सफाई हेतु आधुनिक मशीनों का इस्तेमाल किया जा रहा है। साथ ही, इसमें मिलने वाले नालों पर विकेंद्रित सीवेज उपचार संयंत्र (एसटीपी) लगाने की भी योजना बनाई गई है, लेकिन जब तक हरियाणा और उत्तर प्रदेश से आकर यमुना में गिरने वाले नालों की सफाई नहीं होगी, उन पर अंकुश नहीं लगेगा, तब तक यमुना की सफाई की उम्मीद बेमानी है।
बीते दिनों केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने यमुना सफाई को लेकर तीनों राज्यों- दिल्ली, उत्तर प्रदेश और हरियाणा को समन्वय के साथ काम करने का निर्देश दिया है। यमुना बरसों से निर्देशों, दावों के जाल में उलझी है। सरकारें आती-जाती रहती हैं, लेकिन यमुना अपनी बदहाली पर दशकों से रो रही है। लगता है कि दिल्ली की जनता की आत्मा भी मर गई है। उन्हें यमुना की बदहाली की कोई चिंता ही नहीं है। यमुना के नाम पर मिलने वाली राशि कहां जाती है, यह समझ से परे है। यदि केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की रिपोर्ट की मानें, तो देश की लगभग 463 छोटी-बड़ी नदियों में बिना शोधन के सीधे-सीधे सीवेज गिराया जा रहा है।
सच्चाई यह है कि देश में 271 नदियों में से 37 गंभीर रूप से प्रदूषित हैं। तमिलनाडु की कूवम नदी और यमुना की गिनती सर्वाधिक जहरीली नदियों में की जाती है। सबसे बड़ा दुख इस बात का है कि नदियों की यह दुर्दशा उस देश में है, जहां नदियों की मां की तरह पूजा की जाती है, जिनके किनारे सभ्यताओं और संस्कृतियों ने जन्म लिया है, जहां नदियों के किनारे कुंभ जैसे विशाल मेले लगते हैं। सिर्फ सरकारों के भरोसे नदियों को प्रदूषण से मुक्ति नहीं मिलने वाली है, लोगों को भी उसके लिए सजग होकर कदम उठाना होगा।
-लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं पर्यावरणविद हैं।