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अमेरिका बनाम ईरान: कौन जीता... कौन हारा, दोस्ती और दुश्मनी के टूटे पैमाने
ब्रेट स्टीफेंस, द न्यूयॉर्क टाइम्स
Published by: Pavan
Updated Fri, 19 Jun 2026 07:22 AM IST
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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप
- फोटो :
ANI
विस्तार
ईरान के सैन्य नेताओं ने राष्ट्रपति ट्रंप के साथ हुए युद्धविराम समझौते को अपनी जीत करार दिया है। उनका दावा है कि उन्होंने अपनी ‘अपनी दैवीय और मजबूत इच्छाशक्ति के दम पर’ अमेरिका और इस्राइल को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया। काफी हद तक वे सही भी हैं। लेकिन, यह याद रखना जरूरी है कि ईरान की मौजूदा सरकार, सात अक्तूबर, 2023 को इस्राइल पर हमास के हमले से पहले की तुलना में काफी कमजोर हो गई है। उस समय सीरिया, लेबनान, गाजा और यमन में ईरान के मजबूत सहयोगी और प्रॉक्सी (उसके लिए लड़ने वाले गुट) मौजूद थे। उसका परमाणु कार्यक्रम सुरक्षित था और वह लगातार उच्च स्तर पर संवर्धित यूरेनियम का भंडार बढ़ा रहा था। साथ ही, उसके पास एक सक्षम सैन्य-औद्योगिक ढांचा, चुनौतियों के बावजूद काम करती अर्थव्यवस्था और ऐसी सरकार थी, जिसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त थी, भले ही उस पर दमनकारी नीतियों के आरोप लगते रहे।लेकिन, आज हालात काफी बदल चुके हैं। ईरान की कई रणनीतिक ताकत या तो कमजोर पड़ गई है या लगभग समाप्त हो चुकी है। ईरान अब परमाणु हथियार बनाने के अपेक्षया कम करीब है। सीरिया में उसका प्रमुख सहयोगी सत्ता से बाहर हो चुका है। हिज्बुल्लाह, हमास और हूती विद्रोही जैसे उसके प्रमुख सहयोगी गुट पहले की तुलना में काफी कमजोर हो गए हैं। ईरानी रियाल दुनिया की सबसे कमजोर मुद्राओं में गिनी जा रही है। देश की सरकार एक ऐसे समाज पर शासन कर रही है, जिसमें व्यापक असंतोष दिखाई देता है और कट्टर समर्थकों को छोड़ दें, तो बड़ी संख्या में लोग अवसर मिलने पर सत्ता परिवर्तन का समर्थन कर सकते हैं। इस्राइल पर दागी गई उसकी हालिया बैलिस्टिक मिसाइलों से भी कोई खास नुकसान नहीं हुआ। वहीं, होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव और संभावित नाकेबंदी ने वैश्विक ऊर्जा बाजारों पर दबाव तो जरूर बनाया, लेकिन वे पूरी तरह से ठप नहीं हुए।
एक दमनकारी और विस्तारवादी शासन के खिलाफ यह निश्चित रूप से बड़ी उपलब्धि मानी जा सकती है। फिर भी, किसी युद्ध का नतीजा केवल दोनों पक्षों की सैन्य ताकत से नहीं, बल्कि दोनों की इच्छाशक्ति के स्तर से भी तय होता है। और, इस मोर्चे पर तेहरान के सख्त रुख वाले नेताओं ने वाशिंगटन के नेतृत्व पर निर्णायक जीत हासिल की है।
मैं यह बात एक ऐसे व्यक्ति के तौर पर लिख रहा हूं, जिसने शुरू से ही इस युद्ध का समर्थन किया और उम्मीद की थी कि ट्रंप इसे किसी निर्णायक नतीजे तक पहुंचाएंगे। भले ही ईरानी शासन सत्ता में बना रहता, पर कम से कम ऐसा समझौता तो होता, जिसमें ईरान अपनी सभी यूरेनियम संवर्धन क्षमताओं को छोड़ने पर मजबूर हो जाता और होर्मुज जलडमरूमध्य से वैश्विक आवाजाही बिना किसी रोक-टोक के जारी रहती। और, इन लक्ष्यों को हासिल करना राष्ट्रपति ट्रंप के लिए असंभव भी नहीं था। लेकिन, जब ईरान में सत्ता परिवर्तन के संकेत नहीं मिले और तेल-गैस की कीमतें बढ़ने लगीं, तो ट्रंप घबरा गए। करीब छह सप्ताह तक चली सैन्य कार्रवाई के बाद उन्होंने उस युद्ध से लगभग हाथ खींच लिए, जिसे उन्होंने खुद बढ़ाया था। उन्होंने बार-बार सैन्य कार्रवाई की चेतावनी दी, पर आखिरी समय में पीछे हट गए। इन कदमों ने ईरान और उसके सहयोगियों को संदेश दिया कि अमेरिकी नेतृत्व अपने फैसलों को लेकर पूरी तरह स्पष्ट और दृढ़ नहीं है। इससे अमेरिका की स्थिति मजबूत होने के बजाय कमजोर दिखाई दी।
गौरतलब है कि ट्रंप ईरान से ‘बिना शर्त आत्मसमर्पण’ की मांग कर चुके थे और अफगानिस्तान से अपमानजनक वापसी के लिए अपने पूर्ववर्ती नेतृत्व की बार-बार आलोचना भी करते रहे थे। हालांकि, यह ऐसे राष्ट्रपति के लिए बिल्कुल अजीब नहीं है, जिसकी फितरत ही हर किसी को धोखा देना और अपनी ही बातों से मुकर जाना है। हालांकि, इस समझौते की पूरी शर्तें अभी सामने नहीं आई हैं, जो इसके कमजोर होने का बड़ा संकेत है। अगर समझौता वास्तव में मजबूत होता, तो ट्रंप प्रशासन उसकी उपलब्धियों का खुलकर प्रचार करता। पर, इतना जरूर साफ है कि ट्रंप ने उन ईरानी नागरिकों से किया अपना वादा पूरा नहीं किया, जिनसे उन्होंने कहा था कि ‘मदद रास्ते में है।’ यह आश्वासन उस समय दिया गया था, जब जनवरी में सरकार विरोधी प्रदर्शनों को हिंसक तरीके से दबाया जा रहा था।
ट्रंप इस लड़ाई में अपने मुख्य सहयोगी इस्राइल को भी धोखा देने की राह पर हैं। वह यरूशलेम पर दबाव डाल रहे हैं कि वह उत्तर में हिज्बुल्लाह के हमलों को रोकने की कोशिश से पीछे हट जाए। इस तरह वह तेहरान को लेबनान और होर्मुज के बीच कूटनीतिक संबंध बनाने की जीत भी सौंप रहे हैं। अगर ईरान को अब होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले जहाजों के लिए किसी तरह का सेवा शुल्क वसूलने की इजाजत दी जाती है, तो इसका मतलब होगा कि ट्रंप फारस की खाड़ी में अमेरिका के सहयोगियों को भी धोखा देंगे। ऐसा करके वह ईरान को ऐसी वित्तीय और रणनीतिक बढ़त देंगे, जिसका उसे कोई अधिकार नहीं है और जो उसके पास पहले भी नहीं था।
सबसे बुरा धोखा उन अमेरिकियों के साथ हुआ है, जिन्होंने इस युद्ध का समर्थन किया था। सिर्फ मेरे जैसे परंपरागत रूढ़िवादी ही नहीं, बल्कि ट्रंप के कई मागा समर्थक भी इस युद्ध के पक्ष में थे, क्योंकि उनका मानना था कि पिछले 47 वर्षों से अमेरिका के विरोध में खड़ा ईरान अब देश की सुरक्षा और रणनीतिक हितों के लिए बड़ा खतरा बन चुका है।
यह युद्धविराम उस खतरे को न तो समाप्त करता है और न ही उसे कम करता है। इस समझौते ने ईरान पर दबाव बनाए रखने के अमेरिका के एकमात्र जरिये, उसके बंदरगाहों की नौसैनिक घेराबंदी को कमजोर किया है, जबकि परमाणु कार्यक्रम को लेकर अभी कोई अंतिम सहमति भी नहीं बनी थी। इसका फायदा उठाकर ईरान बातचीत को तब तक टालता रह सकता है, जब तक ट्रंप पद से हट नहीं जाते। यह दुनिया को उस कहावत की याद दिलाता है कि अमेरिका का दुश्मन होना खतरनाक हो सकता है, लेकिन उसका दोस्त होना जानलेवा साबित हो सकता है।
हालांकि, अमेरिका की दृष्टि से यह अभियान पूरी तरह से नाकाम नहीं कहा जा सकता, क्योंकि युद्ध लड़ना कोई गलती नहीं थी, भले ही उसमें कितना भी नुकसान हुआ हो या गलतियां हुई हों। लेकिन, यह तय है कि शांति का फिलहाल जो दिखावा हो रहा है, वह भू-राजनीतिक स्तर पर खुद को नुकसान पहुंचाने जैसा तो है ही, और आने वाले कई वर्षों तक दुनिया में अमेरिका की साख पर भी बुरा असर डालता रहेगा। ©The New York Times 2026