Badrinath: देश के प्रथम गांव माणा के युवाओं को रोजगार भी दे रही सरस्वती नदी, हो रही लाखों की कमाई
छह माह तक चलने वाले यात्रा सीजन में माणा गांव के 20 से अधिक परिवार इसी कार्य से अपनी आजीविका चला रहे हैं।
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बदरीनाथ धाम के समीप देश के प्रथम गांव माणा में सरस्वती नदी का जल स्थानीय लोगों के लिए रोजगार का बड़ा साधन बन गया है। यात्रा सीजन के दौरान गांव के युवा और महिलाएं सरस्वती नदी का जल डिब्बों में भरकर श्रद्धालुओं को बेच रहे हैं। सुबह से शाम तक यहां श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रहती है और कई लीटर जल की बिक्री हो रही है।
माणा गांव में भीमपुल से लेकर सतोपंथ ट्रैक तक जगह-जगह स्थानीय लोग सरस्वती नदी का जल बेचते दिखाई देते हैं। बीस रुपये से लेकर 300 रुपये तक के छोटे-बड़े डिब्बों में यह जल श्रद्धालुओं को उपलब्ध कराया जा रहा है। स्थानीय लोगों के अनुसार छह माह तक चलने वाले यात्रा सीजन में गांव के 20 से अधिक परिवार इसी कार्य से अपनी आजीविका चला रहे हैं। भीम पुल के पास जल बेचने वाले राहुल बिष्ट बताते हैं कि यात्रा सीजन उनके लिए सालभर की कमाई का मुख्य जरिया होता है। वे सुबह से देर शाम तक सरस्वती नदी का जल श्रद्धालुओं को उपलब्ध कराते हैं। वहीं मोनिका का कहना है कि श्रद्धालु नदी के जल को अपने घर में पूजा-पाठ तथा धार्मिक कार्यों के लिए ले जाते हैं।
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अमन बड़वाल, लक्ष्मी बड़वाल और दीक्षा का कहना है कि वे बदरीनाथ धाम की तीर्थयात्रा शुरू होने पर माणा पहुंच जाते हैं। छह माह तक इस जल की बिक्री कर अपनी आजीविका चलाते हैं। कई लोग इसे बच्चों को पिलाने के लिए भी खरीदते हैं।
मान्यता है कि सरस्वती नदी का जल दुख-दर्द दूर करता है और घर में सुख-शांति लाता है। स्थानीय लोगों के अनुसार एक परिवार यात्रा सीजन में दो से तीन लाख रुपये तक की कमाई कर लेता है। पूर्व ग्राम प्रधान पीतांबर मोल्फा बताते हैं कि माणा गांव में सरस्वती नदी प्रत्यक्ष रूप से बहती है। यहां अलकनंदा और सरस्वती नदी का संगम केशव प्रयाग के नाम से प्रसिद्ध है। श्रद्धालु पितरों के तर्पण और धार्मिक अनुष्ठानों के लिए भी इस जल को अपने साथ ले जाते हैं।
मान्यता से जुड़ा है मानसूर तीर्थ का जल
माणा गांव में सरस्वती नदी के समीप स्थित मानसूर तीर्थ का जलस्रोत भी श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। स्थानीय मान्यता के अनुसार इस जल के आचमन से हकलाने की समस्या दूर हो जाती है। पूर्व प्रधान पीतांबर मोल्फा का कहना है कि हर वर्ष हजारों श्रद्धालु इस जल को अपने साथ ले जाते हैं। उनका मानना है कि यदि इस जल का वैज्ञानिक परीक्षण कराया जाए तो यह क्षेत्र के लिए आय का बड़ा स्रोत बन सकता है।
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