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Uttarakhand: जलवायु परिवर्तन की मार से कराह रहा हिमालय, सूख रहे जलस्रोत, बढ़ रहा पलायन, रिपोर्ट चिंताजनक

Mon, 27 Jul 2026 07:10 AM IST
Renu Saklani करन सिंह दयाल, माई सिटी रिपोर्टर, देहरादून
करन सिंह दयाल, माई सिटी रिपोर्टर, देहरादून Published by: Renu Saklani Updated Mon, 27 Jul 2026 07:10 AM IST
सार

हिमालय में बदलता मौसम अब केवल वैज्ञानिकों की चिंता नहीं, बल्कि पहाड़ों में रहने वाले लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी का बड़ा संकट बन चुका है। जलस्रोतों के सूखने, खेती के प्रभावित होने और प्राकृतिक आपदाओं की बढ़ती घटनाओं ने मध्य हिमालयी क्षेत्र के भविष्य को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। हालिया शोध इन चुनौतियों की भयावह तस्वीर सामने लाता है।

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Climate Change in the Himalayas: Drying Water Sources Increasing Disasters  Uttarakhand Migration Report
हिमालय - फोटो : amar ujala

विस्तार

मध्य हिमालयी क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन के प्रभाव अब स्पष्ट और चिंताजनक रूप में सामने आने लगे हैं। हालिया अध्ययन के अनुसार यह बदलाव न केवल पर्यावरण बल्कि सामाजिक और आर्थिक जीवन को भी गहराई तक प्रभावित कर रहे हैं।

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यह बात मूल रूप से चमोली जिले के निवासी मिजोरम विश्वविद्यालय के प्रो. विश्वंभर प्रसाद सती के अध्ययन में सामने आई है। उन्होंने कहा कि बदलती जलवायु परिस्थितियों के कारण कृषि और बागवानी उत्पादन में लगातार गिरावट दर्ज की गई है। इसका सीधा असर ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ा है और रोजगार की कमी के चलते बड़े पैमाने पर पलायन बढ़ा है। स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि उत्तराखंड के ग्रामीण क्षेत्रों से 20 प्रतिशत से अधिक आबादी पलायन कर चुकी है और 1700 से अधिक गांव भुतहा बन चुके हैं। इसके साथ ही पारंपरिक जलस्रोत भी तेजी से सूख रहे हैं। भूमि बंजर होने की वजह से वर्षा जल का जमीन में समावेश कम हो रहा है, जिससे भूजल स्तर में गिरावट आई है और कई क्षेत्रों में जल संकट गहराता जा रहा है।

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जलवायु परिवर्तन का असर फसलों पर भी साफ दिख रहा है। कई पारंपरिक फसलें विलुप्त हो चुकी हैं, जबकि कुछ विलुप्ति की कगार पर हैं। सेब और खट्टे फलों की खेती जो पहले निचले क्षेत्रों में होती थी, अब वहां लगभग समाप्त हो चुकी है। मोटे अनाज की खेती में भी गिरावट आई है, जिससे खाद्य सुरक्षा पर खतरा बढ़ रहा है। इसी प्रकार उत्तराखंड हिमालय के अनेक क्षेत्रों में सेब की खेती, जो कभी व्यापक रूप से होती थी अब व्यावहारिक नहीं रह गई है।

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तेजी से फैल रहे चीड़ के जंगल

प्रो. सती ने अपने अध्ययन में यह भी पाया कि वनस्पति संरचना में भी बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। बढ़ते तापमान के कारण चीड़ के जंगल तेजी से ऊंचाई वाले क्षेत्रों में फैल रहे हैं, जिससे पारंपरिक बांज के वन सिकुड़ रहे हैं। यह परिवर्तन हिमालय की जैव विविधता और पर्यावरणीय संतुलन के लिए खतरे का संकेत है। अध्ययन में यह भी सामने आया है कि पिछले तीन दशक में हिमावरण में भारी कमी आई है। हिमनद तेजी से पिघल रहे हैं और नदियों के प्रवाह पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। विशेष रूप से अलकनंदा और भागीरथी घाटियों में यह स्थिति अधिक गंभीर है।

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बारिश से बदले पैटर्न से बढ़ा आपदा का खतरा

प्रो. सती ने बताया कि अध्ययन में सामने आया कि वर्षा के पैटर्न में अनिश्चितता और चरम मौसम की घटनाओं में वृद्धि ने आपदा का खतरा कई गुना बढ़ा दिया है। बादल फटना, बाढ़, भूस्खलन और हिमनद झील फटने जैसी घटनाएं अब आम होती जा रही हैं। वर्ष 2020 से 2022 के बीच उत्तराखंड में 200 से अधिक आपदाएं दर्ज की गईं, जो स्थिति की गंभीरता को दर्शाती हैं। इसके अलावा वनाग्नि की घटनाओं में भी लगातार बढ़ोतरी हो रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि हिमालयी क्षेत्र जलवायु परिवर्तन के प्रति अत्यधिक संवेदनशील हो चुका है और अगर समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो इसके परिणाम और भयावह हो सकते हैं।


 

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