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Dehradun News: पूर्व सैनिकों से संघ प्रमुख का आह्वान, आइए और आजमाइए
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- बोले, संघ के बौद्धिक पहलु को छोड़कर पूर्व सैनिक पहले से प्रशिक्षित
- कहा, शाखा में आकर हमें समझो, सीधे नहीं तो किसी भी संगठन से जुड़ो
अमर उजाला ब्यूरो
देहरादून। संघ प्रमुख डॉ. मोहन भागवत ने पूर्व सैनिकों से आह्वान किया कि वह हमारी शाखाओं में आएं और आजमां कर देख लें। अगर अच्छा लगेगा तो जुड़ जाएं। उन्होंने ये भी कहा कि चाहें तो आप अपना काम लेकर आएं और हमारी मदद ले सकते हैं। सभी विकल्प खुले हैं।
सरसंघचालक ने कहा कि सेना के लोग संघ की बौद्धिकता को छोड़ दें तो बाकी पूरी ट्रेनिंग पा चुके होते हैं। आर्म्स की ट्रेनिंग हम नहीं देते, उसके लिए सेना है। सेना को हम संघ की बात बताएं तो उनके लिए मिल जुलकर चलना बिल्कुल आसान है। सेना की तरह ही समाज भी चल सकता है। एक होने के लिए एक जैसा होना जरूरी नहीं, वो विदेशी सोच है। हमारा विचार है कि हम एक हैं।
संघ प्रमुख ने आह्वान किया कि आप संघ के प्रशिक्षण शिविर में आएं। एक-दो दिन रहें। किसी से भी बात करो। देखो हम क्या सिखा रहे हैं। आजमां लो, तब लगा कि हमसे जुड़ सकते हैं तो संघ के साथ जुड़ें। उन्होंने कहा कि भाजपा को छोड़कर बाकी सभी गैर राजनीतिक संगठन हैं। ये सभी संगठन समाज में बदलाव के लिए काम कर रहे हैं। आप उनसे जुड़ सकते हैं। 1.30 लाख से अधिक सेवा केंद्र चल रहे हैं, आप उनमें जा सकते हो। उन्होंने कहा, इफ यू हैव ए टीम, वी हैव ए थीम। इसके बाद भी अगर आप अलग से समाज के लिए कोई अच्छा काम बिना किसी फल की आस लिए कर रहे हैं तो आप हमें जानते हों या नहीं, हम आपको संघ का स्वयंसेवक ही मानते हैं।
उन्होंने कहा कि किसी प्रसिद्धी या प्रभाव के लिए नहीं, संघ देश के लिए चल रहा है। हम नहीं चाहते कि ये लिखा जाए कि समाज के कारण देश का भला हुआ, न कि संघ के कारण। उन्होंने पूर्व सैनिकों से कहा, चीनी कैसी है, खाकर देखो। बस ये गारंटी है कि चीनी के नाम पर साइनाइड नहीं मिलेगा।
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सेक्युलर देश नहीं व्यवस्था है
सरसंघचालक ने कहा कि देश सेक्युलर नहीं देश का शासन प्रशासन व्यवस्था सेक्युलर है। ये हमारा शब्द नहीं यूरोपियन है। जब देश के टुकड़े हुए तो कहा गया कि ये उनके लिए है, हम चाहते तो कहते ये हमारे लिए है, उनके लिए नहीं, लेकिन हमने ऐसा नहीं किया। रास्तों को लेकर विवाद न करो, रास्ते आने जाने के होते हैं। अपने रास्ते पर पक्का रहो। किसी को बदलो मत। भारत का स्वभाव ऐसे ही नहीं आया। मूल में एक ही हैं। सब अपने है। ये कोई एक नहीं कर सकता। एक पूरा राष्ट्र खड़ा करना पड़ेगा। हमारी संस्कृति, परंपरा से ये देश बना है। उस समय हमारा देश सुरक्षित था। हमारा स्वभाव लड़ने का नहीं, जोड़ने का है। जोड़ने वाले बचे रहें, उतना हम लड़ते हैं।
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जनता से ही मिलती है नेता को हिम्मत
दूसरे महायुद्ध का उदाहरण देते हुए डॉ. मोहन भागवत ने बताया कि जब जर्मनी की सेना इंग्लैंड पर हमले को तैयार थी। प्रधानमंत्री चर्चिल को छोड़कर पूरा मंत्रिमंडल झुकने को तैयार था। बाद में जब चर्चिल का भी मन हुआ तो ब्रिटिश राजघराने ने उनसे संपर्क किया। चर्चिल ने कहा कि मंत्रिमंडल चाहता है झुकना तो उनसे राजघराने ने पूछा कि आपको मंत्रिमंडल ने चुना या देश की जनता ने। जनता क्या चाहती है, इस सवाल का जवाब पाने के लिए चर्चिल सीधे ट्रेन में सवार हो गए। जनता से बात की, जिसके बाद तय हुआ कि वह लड़ेंगे। उन्होंने कहा कि जनता से ही नेता को हिम्मत मिलती है।
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नए कानूनों पर संघ से पूर्व परामर्श हमारी अपेक्षा नहीं, उनका कर्तव्य
पूर्व सैनिकों के एक सवाल का जवाब देते हुए संघ प्रमुख ने कहा कि नए कानूनों लाने से पहले सरकार, संघ से परामर्श करे, ये हमारी अपेक्षा नहीं उनका कर्तव्य है। कोई भी सरकार हो, उसे जमीनी संगठनों से परामर्श लेना ही चाहिए। जैसे माता-पिता को संतान का लालन पालन करना चाहिए। अभी की सरकार के बारे में कहें कि हमारा अनुमान वो जानते हैं। वो समझते हैं कि इस मामले में संघ क्या मत रखेगा।
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समाज जागृत होगा तो सशक्त विकसित राष्ट्र बनेगा
संघ प्रमुख ने पांच सूत्र बताते हुए कहा कि 1857 की क्रांति हुई तो हम अपनी ही भूमि पर हार गए। इस पर मंथन शुरू हुआ। एक विचार आया कि अभी हारे तो क्या फिर लड़ेंगे। इस पर क्रांतिकारी आंदोलन चला आजादी तक। दूसरा विचार था कि जब तक सामान्य समाज जागृत नहीं होता, तब तक विजय नहीं। इसी कारण हमारे नेताओं ने कांग्रेस को आजादी की लड़ाई का हथियार बनाया। आजादी के बाद राजनीतिक जागृति, लक्ष्य के बाद अनुशासन भी ढीला हो गया। तीसरी धारा थी कि हमें अंग्रेजों जैसा होना चाहिए लेकिन ये भी गलत था। स्वामी विवेकानंद, स्वामी दयानंद जैसे विद्वान समझते थे कि हम खुद को भूल गए हैं। हमें समाज को इससे बाहर लाना होगा। संघ के निर्माता डॉ. हेडगेवार ने इसके लिए बाल्यकाल से ही काम शुरू कर दिया। डॉ. हेडगेवार कोलकाता डॉक्टरी पढ़ने गए।राजस्थान से आंध्र तक के क्षेत्र के आंदोलन को आगे बढ़ाने का काम किया। उस समय असहयोग आंदोलन चल रहा था। उसमें शामिल हुए। उन पर देशद्रोह का मुकदमा दर्ज हुआ। जज ने एक साल की सजा दी। इसके बाद बहुत सोच विचार के बाद डॉ. हेडगेवार ने संघ की स्थापना की। यह कोई सर्विस ऑर्गेनाइजेशन या राजनीतिक दल नहीं है। हम भी चुनाव आयोग की तरह वोट की अपील करते हैं।
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कागजों पर लाइन खींचकर बने देश
एक सवाल के जवाब में डॉ. भागवत ने कहा कि हिन्दू दृष्टि व्यापक है। इससे व्यापक और कौन हो सकता है। हमारा व्यक्ति अपने कुटम्ब के लिए जीता है। इसलिए हम देश, मानवता को मानते हैं। अंतरराष्ट्रीय सीमाएं पहले कहां थी। बाद में कागज पर लाइन खींचकर देश बंट गए। हिन्दू का विचार मतलब सबसे उदार विचार है। बिना कुछ अपना बदले आप हिन्दू में शामिल हो सकते हो।
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- कहा, शाखा में आकर हमें समझो, सीधे नहीं तो किसी भी संगठन से जुड़ो
अमर उजाला ब्यूरो
देहरादून। संघ प्रमुख डॉ. मोहन भागवत ने पूर्व सैनिकों से आह्वान किया कि वह हमारी शाखाओं में आएं और आजमां कर देख लें। अगर अच्छा लगेगा तो जुड़ जाएं। उन्होंने ये भी कहा कि चाहें तो आप अपना काम लेकर आएं और हमारी मदद ले सकते हैं। सभी विकल्प खुले हैं।
सरसंघचालक ने कहा कि सेना के लोग संघ की बौद्धिकता को छोड़ दें तो बाकी पूरी ट्रेनिंग पा चुके होते हैं। आर्म्स की ट्रेनिंग हम नहीं देते, उसके लिए सेना है। सेना को हम संघ की बात बताएं तो उनके लिए मिल जुलकर चलना बिल्कुल आसान है। सेना की तरह ही समाज भी चल सकता है। एक होने के लिए एक जैसा होना जरूरी नहीं, वो विदेशी सोच है। हमारा विचार है कि हम एक हैं।
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संघ प्रमुख ने आह्वान किया कि आप संघ के प्रशिक्षण शिविर में आएं। एक-दो दिन रहें। किसी से भी बात करो। देखो हम क्या सिखा रहे हैं। आजमां लो, तब लगा कि हमसे जुड़ सकते हैं तो संघ के साथ जुड़ें। उन्होंने कहा कि भाजपा को छोड़कर बाकी सभी गैर राजनीतिक संगठन हैं। ये सभी संगठन समाज में बदलाव के लिए काम कर रहे हैं। आप उनसे जुड़ सकते हैं। 1.30 लाख से अधिक सेवा केंद्र चल रहे हैं, आप उनमें जा सकते हो। उन्होंने कहा, इफ यू हैव ए टीम, वी हैव ए थीम। इसके बाद भी अगर आप अलग से समाज के लिए कोई अच्छा काम बिना किसी फल की आस लिए कर रहे हैं तो आप हमें जानते हों या नहीं, हम आपको संघ का स्वयंसेवक ही मानते हैं।
उन्होंने कहा कि किसी प्रसिद्धी या प्रभाव के लिए नहीं, संघ देश के लिए चल रहा है। हम नहीं चाहते कि ये लिखा जाए कि समाज के कारण देश का भला हुआ, न कि संघ के कारण। उन्होंने पूर्व सैनिकों से कहा, चीनी कैसी है, खाकर देखो। बस ये गारंटी है कि चीनी के नाम पर साइनाइड नहीं मिलेगा।
सेक्युलर देश नहीं व्यवस्था है
सरसंघचालक ने कहा कि देश सेक्युलर नहीं देश का शासन प्रशासन व्यवस्था सेक्युलर है। ये हमारा शब्द नहीं यूरोपियन है। जब देश के टुकड़े हुए तो कहा गया कि ये उनके लिए है, हम चाहते तो कहते ये हमारे लिए है, उनके लिए नहीं, लेकिन हमने ऐसा नहीं किया। रास्तों को लेकर विवाद न करो, रास्ते आने जाने के होते हैं। अपने रास्ते पर पक्का रहो। किसी को बदलो मत। भारत का स्वभाव ऐसे ही नहीं आया। मूल में एक ही हैं। सब अपने है। ये कोई एक नहीं कर सकता। एक पूरा राष्ट्र खड़ा करना पड़ेगा। हमारी संस्कृति, परंपरा से ये देश बना है। उस समय हमारा देश सुरक्षित था। हमारा स्वभाव लड़ने का नहीं, जोड़ने का है। जोड़ने वाले बचे रहें, उतना हम लड़ते हैं।
जनता से ही मिलती है नेता को हिम्मत
दूसरे महायुद्ध का उदाहरण देते हुए डॉ. मोहन भागवत ने बताया कि जब जर्मनी की सेना इंग्लैंड पर हमले को तैयार थी। प्रधानमंत्री चर्चिल को छोड़कर पूरा मंत्रिमंडल झुकने को तैयार था। बाद में जब चर्चिल का भी मन हुआ तो ब्रिटिश राजघराने ने उनसे संपर्क किया। चर्चिल ने कहा कि मंत्रिमंडल चाहता है झुकना तो उनसे राजघराने ने पूछा कि आपको मंत्रिमंडल ने चुना या देश की जनता ने। जनता क्या चाहती है, इस सवाल का जवाब पाने के लिए चर्चिल सीधे ट्रेन में सवार हो गए। जनता से बात की, जिसके बाद तय हुआ कि वह लड़ेंगे। उन्होंने कहा कि जनता से ही नेता को हिम्मत मिलती है।
नए कानूनों पर संघ से पूर्व परामर्श हमारी अपेक्षा नहीं, उनका कर्तव्य
पूर्व सैनिकों के एक सवाल का जवाब देते हुए संघ प्रमुख ने कहा कि नए कानूनों लाने से पहले सरकार, संघ से परामर्श करे, ये हमारी अपेक्षा नहीं उनका कर्तव्य है। कोई भी सरकार हो, उसे जमीनी संगठनों से परामर्श लेना ही चाहिए। जैसे माता-पिता को संतान का लालन पालन करना चाहिए। अभी की सरकार के बारे में कहें कि हमारा अनुमान वो जानते हैं। वो समझते हैं कि इस मामले में संघ क्या मत रखेगा।
समाज जागृत होगा तो सशक्त विकसित राष्ट्र बनेगा
संघ प्रमुख ने पांच सूत्र बताते हुए कहा कि 1857 की क्रांति हुई तो हम अपनी ही भूमि पर हार गए। इस पर मंथन शुरू हुआ। एक विचार आया कि अभी हारे तो क्या फिर लड़ेंगे। इस पर क्रांतिकारी आंदोलन चला आजादी तक। दूसरा विचार था कि जब तक सामान्य समाज जागृत नहीं होता, तब तक विजय नहीं। इसी कारण हमारे नेताओं ने कांग्रेस को आजादी की लड़ाई का हथियार बनाया। आजादी के बाद राजनीतिक जागृति, लक्ष्य के बाद अनुशासन भी ढीला हो गया। तीसरी धारा थी कि हमें अंग्रेजों जैसा होना चाहिए लेकिन ये भी गलत था। स्वामी विवेकानंद, स्वामी दयानंद जैसे विद्वान समझते थे कि हम खुद को भूल गए हैं। हमें समाज को इससे बाहर लाना होगा। संघ के निर्माता डॉ. हेडगेवार ने इसके लिए बाल्यकाल से ही काम शुरू कर दिया। डॉ. हेडगेवार कोलकाता डॉक्टरी पढ़ने गए।राजस्थान से आंध्र तक के क्षेत्र के आंदोलन को आगे बढ़ाने का काम किया। उस समय असहयोग आंदोलन चल रहा था। उसमें शामिल हुए। उन पर देशद्रोह का मुकदमा दर्ज हुआ। जज ने एक साल की सजा दी। इसके बाद बहुत सोच विचार के बाद डॉ. हेडगेवार ने संघ की स्थापना की। यह कोई सर्विस ऑर्गेनाइजेशन या राजनीतिक दल नहीं है। हम भी चुनाव आयोग की तरह वोट की अपील करते हैं।
कागजों पर लाइन खींचकर बने देश
एक सवाल के जवाब में डॉ. भागवत ने कहा कि हिन्दू दृष्टि व्यापक है। इससे व्यापक और कौन हो सकता है। हमारा व्यक्ति अपने कुटम्ब के लिए जीता है। इसलिए हम देश, मानवता को मानते हैं। अंतरराष्ट्रीय सीमाएं पहले कहां थी। बाद में कागज पर लाइन खींचकर देश बंट गए। हिन्दू का विचार मतलब सबसे उदार विचार है। बिना कुछ अपना बदले आप हिन्दू में शामिल हो सकते हो।

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