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यूपीसीएल पर बंटवारे का बोझ : वक्त गुजरता गया, मर्ज बढ़ता गया
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देहरादून। उत्तराखंड पावर कारपोरेशन लिमिटेड (यूपीसीएल) का यूपी से हुआ बंटवारा वक्त गुजरने के साथ ही निगम के लिए मर्ज बनता चला गया। हालात ये हैं कि कई बार यूपीसीएल बंटवारे के नुकसान की इस भरपाई के लिए नियामक आयोग गया लेकिन सफलता नहीं मिली।
नवंबर 2000 में उत्तर प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम 2000 के तहत उत्तराखंड का गठन हुआ था। इसके बाद 2001 में यूपीसीएल और उत्तराखंड जल विद्युत निगम लिमिटेड (यूजेवीएनएल) का गठन किया गया। वर्ष 2003 में यूपीसीएल और उत्तर प्रदेश पावर कारपोरेशन(यूपीपीसीएल) के बीच संपत्तियों और देनदारियों के बंटवारे की योजना तैयार की गई थी। यूपीसीएल प्रबंधन का कहना है कि ट्रांसफर स्कीम के तहत उन्हें 1058.18 करोड़ रुपये की सकल अचल संपत्ति (जीएफए) मिली थीं। नियामक आयोग ने लंबे समय तक इसे 508 करोड़ रुपये ही माना। 550.18 करोड़ का हिसाब बढ़ते-बढ़ते ब्याज सहित 5900 करोड़ रुपये तक पहुंच गया।
राज्य सरकार ने 2003 के बाद आखिर आठ मार्च 2022 को इस ट्रांसफर स्कीम को विधिवत अधिसूचित कर दिया था। फिर यूपीसीएल इस दावे के साथ नियामक आयोग पहुंचा था लेकिन आयोग ने ये कहते हुए इससे इन्कार कर दिया था कि इसके लिए अलग से याचिका लेकर आएं। वहीं, शासन स्तर पर भी इसके समाधान के रास्ते खोजे गए। कैबिनेट में इस पर चर्चा हुई। सरकार ने नियामक आयोग और यूपीसीएल को मामले का निस्तारण करने को कहा है।
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आयोग के लिए चुनौती
अब नए सिरे से कसरत तो शुरू हुई है लेकिन नियामक आयोग के सामने बड़ी चुनौती है। 5900 करोड़ में मूल रकम तो 936.37 करोड़ रुपये ही है बाकी 4,963.65 कैरिंग कॉस्ट(ब्याज) है। अगर आयोग इस रकम की भरपाई एक बार में उपभोक्ताओं से करेगा तो बिजली दरें सीधे 50 प्रतिशत बढ़ जाएंगी। अगर किस्तों में भी करेगा तो भी कई साल तक इसका असर उपभोक्ताओं के बिल पर नजर आएगा। नियामक आयोग के सचिव नीरज कुमार सती का कहना है कि फिलहाल इस पर हितधारकों से सुझाव मांगे गए हैं। इसके बाद आयोग आगे का कदम उठाएगा।
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नवंबर 2000 में उत्तर प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम 2000 के तहत उत्तराखंड का गठन हुआ था। इसके बाद 2001 में यूपीसीएल और उत्तराखंड जल विद्युत निगम लिमिटेड (यूजेवीएनएल) का गठन किया गया। वर्ष 2003 में यूपीसीएल और उत्तर प्रदेश पावर कारपोरेशन(यूपीपीसीएल) के बीच संपत्तियों और देनदारियों के बंटवारे की योजना तैयार की गई थी। यूपीसीएल प्रबंधन का कहना है कि ट्रांसफर स्कीम के तहत उन्हें 1058.18 करोड़ रुपये की सकल अचल संपत्ति (जीएफए) मिली थीं। नियामक आयोग ने लंबे समय तक इसे 508 करोड़ रुपये ही माना। 550.18 करोड़ का हिसाब बढ़ते-बढ़ते ब्याज सहित 5900 करोड़ रुपये तक पहुंच गया।
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राज्य सरकार ने 2003 के बाद आखिर आठ मार्च 2022 को इस ट्रांसफर स्कीम को विधिवत अधिसूचित कर दिया था। फिर यूपीसीएल इस दावे के साथ नियामक आयोग पहुंचा था लेकिन आयोग ने ये कहते हुए इससे इन्कार कर दिया था कि इसके लिए अलग से याचिका लेकर आएं। वहीं, शासन स्तर पर भी इसके समाधान के रास्ते खोजे गए। कैबिनेट में इस पर चर्चा हुई। सरकार ने नियामक आयोग और यूपीसीएल को मामले का निस्तारण करने को कहा है।
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आयोग के लिए चुनौती
अब नए सिरे से कसरत तो शुरू हुई है लेकिन नियामक आयोग के सामने बड़ी चुनौती है। 5900 करोड़ में मूल रकम तो 936.37 करोड़ रुपये ही है बाकी 4,963.65 कैरिंग कॉस्ट(ब्याज) है। अगर आयोग इस रकम की भरपाई एक बार में उपभोक्ताओं से करेगा तो बिजली दरें सीधे 50 प्रतिशत बढ़ जाएंगी। अगर किस्तों में भी करेगा तो भी कई साल तक इसका असर उपभोक्ताओं के बिल पर नजर आएगा। नियामक आयोग के सचिव नीरज कुमार सती का कहना है कि फिलहाल इस पर हितधारकों से सुझाव मांगे गए हैं। इसके बाद आयोग आगे का कदम उठाएगा।