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समाज और पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार नागरिक बनें युवा: प्रो. सुरेखा
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-दून विवि में गज महोत्सव का आयोजन, विज्ञान, संस्कृति और सह-अस्तित्व पर जोर
प्रो. कुसुम अरुणाचलम ने मेगाहर्बिवोर गिल्ड पर चल रहे शोध का उल्लेख किया
माई सिटी रिपोर्टर
देहरादून। दून विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ एनवायरनमेंट एंड नेचुरल रिसोर्सेज की ओर से गज महोत्सव का आयोजन किया गया। बुधवार को आयोजित महोत्सव में विवि की कुलपति प्रो. सुरेखा डंगवाल ने कहा कि शिक्षण संस्थानों को केवल ज्ञान देने तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि उन्हें समाज और पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार नागरिक तैयार करने का केंद्र बनना होगा।
प्रो. कुसुम अरुणाचलम ने मेगाहर्बिवोर गिल्ड पर चल रहे शोध का उल्लेख करते हुए हाथी और गौर के बीच पारिस्थितिक संबंध को वन पारितंत्र का सह-निर्माता बताया। प्रो. सुथार ने शोध, नीति और व्यवहार के समन्वय की आवश्यकता पर जोर दिया जबकि डॉ. वीबी माथुर ने नीति-स्तर पर हस्तक्षेप और लैंडस्केप स्तर पर संरक्षण योजना की आवश्यकता पर बल देते हुए संस्थागत समन्वय को महत्वपूर्ण बताया। डॉ. रसिली ने राजाजी राष्ट्रीय उद्यान के अपने अनुभव साझा करते हुए आवासीय संपर्क (हैबिटेट कनेक्टिविटी), प्रभावी प्रबंधन और समुदाय की भागीदारी को संरक्षण की सफलता का आधार बताया। डॉ. बिलाल हबीब ने हाथियों के व्यवहार को समझाते हुए कहा कि उनके आवागमन, व्यवहार और आवास उपयोग की वैज्ञानिक समझ प्रभावी संरक्षण रणनीतियां बनाने और मानव–वन्यजीव संघर्ष को कम करने के लिए आवश्यक है। इस मौके पर डॉ. अनिल कुमार सिंह, अभिषेक रावत आदि मौजूद रहे।
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प्रो. कुसुम अरुणाचलम ने मेगाहर्बिवोर गिल्ड पर चल रहे शोध का उल्लेख किया
माई सिटी रिपोर्टर
देहरादून। दून विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ एनवायरनमेंट एंड नेचुरल रिसोर्सेज की ओर से गज महोत्सव का आयोजन किया गया। बुधवार को आयोजित महोत्सव में विवि की कुलपति प्रो. सुरेखा डंगवाल ने कहा कि शिक्षण संस्थानों को केवल ज्ञान देने तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि उन्हें समाज और पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार नागरिक तैयार करने का केंद्र बनना होगा।
प्रो. कुसुम अरुणाचलम ने मेगाहर्बिवोर गिल्ड पर चल रहे शोध का उल्लेख करते हुए हाथी और गौर के बीच पारिस्थितिक संबंध को वन पारितंत्र का सह-निर्माता बताया। प्रो. सुथार ने शोध, नीति और व्यवहार के समन्वय की आवश्यकता पर जोर दिया जबकि डॉ. वीबी माथुर ने नीति-स्तर पर हस्तक्षेप और लैंडस्केप स्तर पर संरक्षण योजना की आवश्यकता पर बल देते हुए संस्थागत समन्वय को महत्वपूर्ण बताया। डॉ. रसिली ने राजाजी राष्ट्रीय उद्यान के अपने अनुभव साझा करते हुए आवासीय संपर्क (हैबिटेट कनेक्टिविटी), प्रभावी प्रबंधन और समुदाय की भागीदारी को संरक्षण की सफलता का आधार बताया। डॉ. बिलाल हबीब ने हाथियों के व्यवहार को समझाते हुए कहा कि उनके आवागमन, व्यवहार और आवास उपयोग की वैज्ञानिक समझ प्रभावी संरक्षण रणनीतियां बनाने और मानव–वन्यजीव संघर्ष को कम करने के लिए आवश्यक है। इस मौके पर डॉ. अनिल कुमार सिंह, अभिषेक रावत आदि मौजूद रहे।
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