सावधान: नल खोलिए, खतरा पीजिए... नजफगढ़ में 66 फीसदी पेयजल के सैंपल फेल, दिल्ली में 30% पानी जानलेवा
राजधानी दिल्ली में नलों से बहने वाला पानी अब प्यास नहीं, चिंता बढ़ा रहा है। ताजा जांच रिपोर्ट ने पेयजल की गुणवत्ता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। नजफगढ़ इलाके में जांचे गए 66 फीसदी पानी के नमूने मानकों पर फेल पाए गए हैं, जबकि पूरी दिल्ली में यह आंकड़ा 30 प्रतिशत तक पहुंच चुका है। यानी हर तीसरा सैंपल पीने लायक नहीं है। हैरानी की बात यह है कि जिस पानी को सुरक्षित बताकर घर-घर सप्लाई किया जा रहा है, वही अब लोगों की सेहत के लिए खतरा बनता जा रहा है...
विस्तार
राजधानी में पिछले वर्ष 2025 के दौरान लिए गए पेयजल के 100 में से करीब 30 प्रतिशत नमूने गुणवत्ता के मानक पर खरे नहीं उतरे अर्थात यहां का पानी पीने योग्य नहीं है। सबसे ज्यादा खराब व दूषित पानी की सप्लाई नजफगढ़ क्षेत्र में हो रही है। क्योंकि यहां के 66 फीसदी नमूने जांच में फेल पाए गए। यह स्थिति सरकारी दावों की पोल खोलने के साथ ही लाखों दिल्लीवासियों के स्वास्थ्य पर गंभीर खतरे की ओर इशारा करती है।
नजफगढ़ जैसे घनी आबादी वाले इलाके में पानी की यह हालत जल आपूर्ति व्यवस्था, पाइपलाइन लीकेज और सीवेज मिश्रण जैसे मुद्दों को उजागर करती है। स्थानीय लोगों का कहना है कि गंदे और बदबूदार पानी की शिकायतें की जा रही हैं, लेकिन स्थायी समाधान नहीं निकल पाया। इस सूची में दूसरा स्थान सिविल लाइंस क्षेत्र का रहा, जहां 38 प्रतिशत से अधिक पानी के नमूने अनफिट पाए गए।
प्रशासनिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माने जाने वाले इस इलाके में भी पेयजल की गुणवत्ता पर सवाल उठना, सिस्टम की लचर कार्यशैली की गवाही देता है। विशेषज्ञों का मानना है कि पुरानी पाइपलाइन और अपर्याप्त निगरानी इसकी प्रमुख वजह है। तीसरे स्थान पर दक्षिण दिल्ली का क्षेत्र रहा है जहां के 38 प्रतिशत पानी के नमूने पीने योग्य नहीं पाए गए। इस क्षेत्र में कई कॉलोनियों में जल आपूर्ति टैंकरों और पुरानी वितरण लाइनों पर निर्भर है। वर्ष 2025 के आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि दिल्ली में केवल पानी की उपलब्धता ही नहीं, बल्कि उसकी गुणवत्ता सुनिश्चित करना भी एक बड़ी चुनौती है। अगर समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो यह समस्या आने वाले वर्षों में और गंभीर रूप ले सकती है।
दिल्ली में पानी की मांग आपूर्ति में भारी अंतर
राजधानी की मौजूदा जरूरत के अनुसार प्रतिदिन करीब 125 करोड़ गैलन पानी की आवश्यकता है, जबकि वास्तविक उपलब्धता लगभग एक करोड़ गैलन है। इस मांग-आपूर्ति के अंतर ने जल संकट को और गंभीर बना दिया है। हालात तब और चिंताजनक हो जाते हैं जब उपलब्ध पानी का काफी हिस्सा चोरी और पाइपलाइन लीकेज के कारण बर्बाद हो जाता है।
पेयजल की बर्बादी का सबसे बड़ा कारण राजधानी की क्षतिग्रस्त और जर्जर पाइपलाइन व्यवस्था है। दिल्ली आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार, राजधानी में कुल 15,473 किलोमीटर लंबी पाइपलाइन के माध्यम से घरों तक पानी पहुंचाया जाता है। इनमें से हजार किलोमीटर से अधिक पाइपलाइन 10 साल या उससे अधिक पुरानी हैं, जिनमें लीकेज की आशंका सबसे ज्यादा है। इसके बावजूद इन पाइपलाइनों को बदलने या व्यापक मरम्मत की दिशा में ठोस और प्रभावी कदम नहीं उठाए गए हैं।
लीकेज में कितना पानी बर्बाद, दिल्ली जल बोर्ड को पता हीं नहीं
दिल्ली अपनी जल जरूरतों को पूरा करने के लिए हरियाणा, उत्तर प्रदेश और अन्य राज्यों पर निर्भर है। बाहरी स्रोतों से पानी लाने के बावजूद काफी पानी रास्ते में बर्बाद हो जाता है जो जल प्रबंधन प्रणाली की गंभीर विफलता को दर्शाता है। हैरानी की बात यह है कि दिल्ली जल बोर्ड के पास खुद यह स्पष्ट रिकॉर्ड नहीं है कि लीकेज के कारण कितना पानी बर्बाद हो रहा है। पिछले वर्ष विधानसभा में पूछे गए एक सवाल के जवाब में जल बोर्ड ने स्वीकारा था कि लीकेज से होने वाली बर्बादी का ठोस आंकड़ा उपलब्ध नहीं है।
ये हैं संसाधन
राजधानी में पानी के भंडारण और शोधन के लिए 117 भूमिगत जलाशय और 10 जल शोधन संयंत्र मौजूद हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि पाइपलाइन नेटवर्क को आधुनिक बनाया जाए, लीकेज की नियमित निगरानी हो। चोरी पर सख्ती की जाए, तो उपलब्ध पानी से बड़ी आबादी की जरूरतें पूरी की जा सकती हैं।
कालकाजी: डीडीए, एलआईजी फ्लैट्स में ज्यादा समस्या
दक्षिण दिल्ली के पॉश माने जाने वाले कालकाजी इलाके में नलों से पानी नहीं, बल्कि बदहाली बह रही है। डीडीए और एलआईजी फ्लैट्स में रहने वाले सैकड़ों परिवार बदबूदार, पीले और काले पानी के सहारे जिंदगी जीने के लिए मजबूर हैं। हालात इतने भयावह हैं कि न यह पानी पीने लायक है, न खाना बनाने और न ही नहाने-धोने के काम में लिया जा सकता है। प्रशासन की लापरवाही के बीच कालकाजी के लोग बीमारियों के साए में जीने के लिए मजबूर हैं। दक्षिण दिल्ली के कालकाजी इलाके में स्थित डीडीए फ्लैट्स और एलआईजी फ्लैट्स के लोग बीते कई महीनों से गंभीर जल संकट का सामना कर रहे हैं। जे-4, एल-1 और एल-2 ब्लॉक के हालात सबसे ज्यादा खराब हैं, जहां नलों से तेज और बदबूदार पानी की सप्लाई हो रही है। हालात ऐसे हैं कि लोग न तो इस पानी को पी पा रहे हैं और न ही रोजमर्रा के कामों में सही से इस्तेमाल कर पा रहे हैं। डीडीए फ्लैट्स निवासियों का कहना है कि हम साल से यहां रह रहे हैं, लेकिन ऐसी हालत पहले कभी नहीं देखी। सुबह नल खोलते ही बदबूदार पानी आता है। शिकायत की, लेकिन हमारी कोई सुनने वाला नहीं है।
डॉक्टरों की राय
- दूषित पानी पीने से डायरिया, टायफाइड, हेपेटाइटिस, उल्टी-दस्त और पेट के संक्रमण तेजी से फैलते हैं
- बच्चों की इम्यूनिटी कमजोर होती है। बच्चों में डिहाइड्रेशन, आंतों में संक्रमण, वजन कम होना और बार-बार बीमार पड़ते हैं
- लंबे समय तक ऐसा पानी बच्चों के विकास पर भी असर डाल सकता है
- त्वचा पर रैशेज, फंगल इंफेक्शन, खुजली और आंखों में जलन की शिकायतें बढ़ जाती हैं
नलों में बह रहा बदबूदार पानी
गंदे पानी पीने के कारण कॉलोनी में कई लोगों स्वास्थ्य संबंधी बीमारियां हो रही है। करीब 5-6 महीने से घर में गंदा पानी आ रहा है। विधायक और जल बोर्ड ऑफिस में शिकायत भी की गई, लेकिन कोई समाधान नहीं हुआ।
- एल-1 ब्लॉक निवासी पम्मी
सुबह पानी इतना गंदा आता है कि बाल्टी भरते ही पूरे घर में बदबू फैल जाती है। मजबूरी में लोग यह पानी पीने और खाना बनाने में इस्तेमाल कर रहे हैं। इससे बच्चों और बुजुर्गों की सेहत पर खतरा मंडरा
रहा है।
- जे-4 ब्लॉक निवासी राहुल
पानी समस्या की शिकायत कालकाजी विधायक शिखा राय से भी की थी, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। कॉलोनियों में बीच-बीच में गंदा पानी आता है। पानी में इतनी बदबू आती है कि हाथ भी साफ नहीं कर सकते।
-जितेंद्र, अध्यक्ष आरडब्ल्यूए, एलआईजी फ्लैट्स
द्वारका सोसाइटियों में भूजल प्रदूषण, 124 जगहों पर बैक्टीरिया मिला
राजधानी में बारिश का पानी जो घरों की छतों से इकट्ठा होकर भूजल रिचार्ज करने के काम आता है वही खतरे का सबब बनता जा रहा है। दिल्ली जल बोर्ड (डीजेबी) की रिपोर्ट के अनुसार, सितंबर 2025 में द्वारका के कोऑपरेटिव ग्रुप हाउसिंग सोसाइटीज (सीजीएचएस) के 144 रेनवाटर हार्वेस्टिंग पिट्स से सैंपल लिए गए।
इनमें से 124 पिट्स में फीकल कोलीफॉर्म (मल-जनित बैक्टीरिया) की मौजूदगी पाई गई। यानी ज्यादातर जगहों पर सीवर का गंदा पानी इन पिट्स में मिल रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक, डीजेबी ने इन सोसाइटियों को तीन श्रेणियों में बांटा है। पहले से फीकल कोलीफॉर्म वाली 115, नॉन-फंक्शनल आरडब्ल्यूएचएस वाली 4 और सूखी पिट वाली 25 है।
जांच में पाया गया कि 124 सोसाइटियों में बैक्टीरिया है, 8 में सिस्टम सूखा है। 3 ने सैंपल देने से मना कर दिया, 7 में काम चल रहा है और 2 में सिस्टम खराब है। डीजेबी के चीफ इंजीनियर संदीप कपूर की ओर से जारी हलफनामे के अनुसार, वे लगातार सोसाइटियों से बात कर रहे हैं और नियमों का पालन कराने के लिए मौखिक, लिखित चेतावनी दे रहे हैं। यह मामला महेश चंद्र सक्सेना बनाम दिल्ली सरकार का है, जो 2021 से चल रहा है।
एनजीटी ने 31 जुलाई 2025 के आदेश में डीजेबी से कार्रवाई रिपोर्ट मांगी थी। डीजेबी ने दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति (डीपीसीसी) से पर्यावरणीय जुर्माना लगाने की मांग की है। डीपीसीसी ने मार्च 2025 में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) से गाइडलाइंस मांगी थीं और अक्तूबर 2025 में फिर रिपोर्ट मांगी गई। विशेषज्ञों के अनुसार, अगर सिस्टम ठीक नहीं हुए तो भूजल और ज्यादा दूषित होगा, जो पीने के पानी की समस्या बढ़ाएगा। दिल्लीवासी उम्मीद कर रहे हैं कि जल्द कार्रवाई से समस्या हल होगी।
कहानी 2023 से शुरू हुई, अब खतरा और बढ़ गया
पूरा मामला फरवरी 2023 से एनजीटी में चल रहा है, जब एक द्वारका निवासी ने शिकायत की कि सोसाइटियों के रेनवाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम गलत तरीके से बने हैं और इससे भूजल प्रदूषित हो रहा है। मई 2023 में एनजीटी की एक्सपर्ट कमिटी ने डीजेबी और डीपीसीसी के साथ मिलकर 235 सोसाइटियों की जांच की, जिसमें 180 जगहों पर अमोनियाकल नाइट्रोजन और टीडीएस का स्तर बहुत ज्यादा पाया गया। उसके बाद मार्च 2025 तक की रिपोर्ट में 115 सोसाइटियों में फीकल कोलीफॉर्म की पुष्टि हुई। अब सितंबर 2025 की ताजा जांच में हालात और बिगड़े नजर आए 144 सैंपलों में 124 दूषित, 8 सूखे, 7 में रिपेयर चल रहा, 2 पूरी तरह बंद पड़े और तीन सोसाइटियों ने तो सैंपल लेने तक से मना कर दिया।