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Research : अस्थमा समेत सांस के गंभीर मरीजों के लिए कारगर नहीं एयर प्यूरीफायर, शोध में खुलासा
अमर उजाला नेटवर्क, दिल्ली
Published by: दुष्यंत शर्मा
Updated Sat, 23 Nov 2024 06:16 AM IST
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सार
एयर प्यूरीफायर लगाने के बावजूद भी मरीजों की बिगड़ती सेहत में कोई सुधार नहीं है। ये खुलासा ब्रिटेन के एक शोध में हुआ है।
Air Purifier Device
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विस्तार
प्रदूषकों की मात्रा में कमी लाने के बावजूद एयर प्यूरीफायर से अस्थमा समेत सांस के गंभीर मरीजों को फायदा नहीं मिलता है। एयर प्यूरीफायर लगाने के बावजूद भी मरीजों की बिगड़ती सेहत में कोई सुधार नहीं है। ये खुलासा ब्रिटेन के एक शोध में हुआ है।
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दिल्ली के बढ़ते प्रदूषण के बीच आरएमएल अस्पताल के मेडिसिन विभाग ने इस शोध का संदर्भ लेते हुए सलाह दी है कि दिल्ली-एनसीआर के मरीजों को इस दौरान दूसरे विकल्पों पर ध्यान देने की जरूरत है।
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इससे पहले बृहस्पतिवार को भारतीय चेस्ट सोसाइटी की बैठक में विशेषज्ञों ने दिल्ली-एनसीआर में बढ़ते प्रदूषण पर चिंता जताते हुए कहा था कि मौजूदा हालात में एयर प्यूरीफायर भी प्रभावी नहीं है। घर के बंद कमरे में भी प्रदूषक पहुंच रहे हैं। इसमें पीएम10 व पीएम 2.5 ही नहीं, पीएम 1 व इससे भी महीन कणों स्तर में तेजी से बढ़ोतरी हुई है। यह सांस से होते हुए फेफड़ों और आगे रक्त परिसंचरण तंत्र में घुल रहे हैं। एयर प्यूरीफायर इतने महीन कणों को पकड़ नहीं पाता। इससे हवा का साफ होना मुमकिन नहीं है।
एम्स के पल्मोनरी विभाग के पूर्व प्रमुख और भारतीय चेस्ट सोसाइटी (उत्तर क्षेत्र) के अध्यक्ष डॉ. जीसी खिलनानी की मानें तो कमरे में अगर किसी भी तरह से बाहर से हवा आती है तो एयर प्यूरीफायर की उपयोगिता खत्म हो जाती है। यह सामान्य लोगों के लिए भी उपयुक्त नहीं रहता।
प्रदूषण में पीएम 2.5 के प्रमुख स्रोत
गैसोलीन, तेल, डीजल ईंधन, खुले में कूड़ा व पराली जलाने से निकलने वाला धुंआ, औद्योगिक प्रक्रियाएं और मोटर वाहन से निकलने वाला धुआं। पीएम की मात्रा ः पीएम 2.5 में ही पीएम 1 भी शामिल है। यह धूल, दहन कण, बैक्टीरिया और वायरस जैसे कण होते हैं। पीएम 1 एक प्रकार है, जिसमें हवा में निलंबित 1 माइक्रोन या उससे कम होती है। इनमें धूल, कालिख, धुआं और तरल बूंदें सहित अन्य शामिल हैं। एयर प्यूरीफायर पोर्टेबल डिवाइस है जो एक आंतरिक फिल्टर और पंखे को एक साथ मिलाकर किसी खास कमरे में हवा से अवांछित कणों को खींचता है और शुद्ध हवा को फिर कमरे में वापस भेजता है।
नहीं मिला मरीजों को फायदा
डॉ राम मनोहर लोहिया अस्पताल में मेडिसिन विभाग ने ब्रिटेन के शोध का संदर्भ लिया है। विभाग के प्रोफेसर डॉ. पुलिंग गुप्ता के मुताबिक, बीते दिनों प्रकाशित यह शोध बताता है कि एयर प्यूरीफायर लगाने के बावजूद भी अस्थमा नियंत्रण, जीवन की गुणवत्ता या फेफड़ों के काम करने की क्षमता में कोई सुधार नहीं हुआ। इसमें 50 लोगों को शामिल किए गए थे। इसमें से 46 यानी 92 फीसदी लोगो ने अध्ययन पूरा किया। इसमें 33 महिलाएं शामिल थीं। उनकी औसत आयु 46.7 वर्ष थी। इनमें मुख्य रूप से किशोरावस्था में शुरू होने वाला अस्थमा देखा गया।
- शोध में घर की धूल के कण, घास के पराग, बिल्ली के बाल, पेड़ के पराग और कुत्ते के बाल समेत दूसरे प्रदूषक कणों को भी देखा गया। प्यूरीफायर लगाने के बाद भी मरीजों की हालत नहीं सुधरी।