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Synthetic Drugs: भारत बन रहा सिंथेटिक ड्रग्स का नया हब, आसानी से युवाओं तक पहुंच; एलजी संधू की कड़ी चेतावनी

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Sat, 11 Apr 2026 04:11 AM IST
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सार

उपराज्यपाल संधू ने कहा कि भारत अब सिर्फ ड्रग्स का रास्ता भर नहीं रह गया, बल्कि इसके उत्पादन और वितरण का केंद्र बनने की ओर बढ़ रहा है, जो सुरक्षा और समाज दोनों के लिए बड़ी चुनौती है।

Delhi's Lieutenant Governor issues grave warning regarding the growing threat of synthetic drugs.
एलजी तरनजीत सिंह संधू - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

दिल्ली के उपराज्यपाल तरनजीत सिंह संधू ने सिंथेटिक ड्रग्स के बढ़ते खतरे को लेकर गंभीर चेतावनी दी है। उन्होंने कहा कि भारत अब सिर्फ ड्रग्स का रास्ता भर नहीं रह गया, बल्कि इसके उत्पादन और वितरण का केंद्र बनने की ओर बढ़ रहा है, जो सुरक्षा और समाज दोनों के लिए बड़ी चुनौती है।

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काउंटरिंग नार्को-टेररिज्म पर आयोजित अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में बोलते हुए एलजी ने कहा कि मादक पदार्थों का अवैध कारोबार अब केवल अपराध का मुद्दा नहीं है, बल्कि ये राष्ट्रीय सुरक्षा, अर्थव्यवस्था और शासन व्यवस्था से सीधे जुड़ा खतरा बन चुका है।
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उन्होंने बताया कि वैश्विक स्तर पर ये कारोबार सैकड़ों अरब डॉलर का है और इसकी जड़ें संगठित अपराध और आतंकवाद तक फैली हुई हैं। एलजी ने स्पष्ट किया कि ड्रग्स से होने वाली कमाई मनी लॉन्ड्रिंग और आतंकी गतिविधियों को फंड करने में इस्तेमाल हो रही हैं। ये नेटवर्क अब इतना मजबूत हो चुका है कि इससे निपटना सिर्फ कानून-व्यवस्था का मामला नहीं रह गया है।

प्रभावी रणनीति के बिना रोक पाना असंभव
इस चुनौती से निपटने के लिए एलजी ने बहु-आयामी रणनीति पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि इंटेलिजेंस शेयरिंग, कानून प्रवर्तन एजेंसियों, वित्तीय निगरानी तंत्र और पब्लिक हेल्थ सिस्टम को एक साथ जुड़ना होगा, तभी इस खतरे को प्रभावी ढंग से रोका जा सकता है।

ड्रग्स की बढ़ती बरामदी बेहद गंभीर विषय 
भारत के संदर्भ में एलजी ने खास तौर पर सिंथेटिक ड्रग्स को लेकर चिंता जताई। उनके मुताबिक, मेथामफेटामाइन और अन्य एम्फेटामाइन जैसे ड्रग्स की देश में बढ़ती बरामदगी और अलग-अलग इलाकों में इसकी मौजूदगी इस बात का संकेत है कि भारत ट्रांजिट रूट से आगे बढ़कर एक संभावित प्रोडक्शन और डिस्ट्रीब्यूशन हब बनता जा रहा है। उन्होंने युवाओं में नशे की बढ़ती प्रवृत्ति को भी गंभीर सामाजिक संकट बताया। इसके चलते स्वास्थ्य सेवाओं पर दबाव बढ़ रहा है और कार्यक्षमता पर भी असर पड़ रहा है। 

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