Delhi: करोड़ों रुपये खर्च करने के बाद भी न साफ हो सकी दिल्ली की हवा और न सुधरी यमुना की सेहत, कई सिफारिशें
समिति ने कहा कि दिल्ली दुनिया की सबसे प्रदूषित राजधानी होने का दुर्भाग्यपूर्ण दर्जा रखती है, जबकि करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद प्रदूषित यमुना में भी ठोस सुधार दिखाई नहीं दे रहा है।
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दिल्ली की हवा और यमुना की हालत सुधारने के लिए करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद सुधार नहीं होने पर संसद की स्थायी समिति ने गंभीर चिंता जताई है। समिति ने कहा कि दिल्ली दुनिया की सबसे प्रदूषित राजधानी होने का दुर्भाग्यपूर्ण दर्जा रखती है, जबकि करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद प्रदूषित यमुना में भी ठोस सुधार दिखाई नहीं दे रहा है।
समिति ने वैज्ञानिक संस्थानों से कहा है कि उनकी विशेषज्ञता का इस्तेमाल अब सीधे हवा और पानी के प्रदूषण से निपटने में किया जाए। राज्यसभा की विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन संबंधी विभागीय स्थायी समिति ने अपनी रिपोर्ट में ये टिप्पणी की है। समिति ने वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद की दो प्रयोगशालाओं जिसमें केंद्रीय वैज्ञानिक उपकरण संगठन, चंडीगढ़ और जीनोमिक्स एवं समेकित जीव विज्ञान संस्थान, नई दिल्ली के कामकाज की समीक्षा की थी।
आपके पास संसाधन, उसका सही उपयोग करिए
समिति ने केंद्रीय वैज्ञानिक उपकरण संगठन से कहा कि आपके पास सेंसर बनाने, पर्यावरण की निगरानी करने, वास्तविक समय में आंकड़े जुटाने और वैज्ञानिक विश्लेषण की क्षमता है। ऐसे में इस क्षमता को दिल्ली-एनसीआर के वायु प्रदूषण और यमुना जैसे प्रदूषित नदी क्षेत्रों की समस्या के समाधान में लगाया जाना चाहिए। समिति ने केंद्रीय वैज्ञानिक उपकरण संगठन से कहा है कि वह हवा साफ रखने, यमुना जैसी प्रदूषित नदियों की सफाई करने वाली तकनीक और पर्यावरण की स्थति पर लगातार नजर रखे वाले आधुनिक उपकरण तैयार करें। देश में ही इसे विकसित करें। समिति ने कहा कि संस्था के पास पहले से सेंसर, पर्यावरणीय उपकरण, वास्तविक समय में निगरानी और वैज्ञानिक विश्लेषण की क्षमता है। इसलिए इस क्षमता का इस्तेमाल लोगों की रोजमर्रा की समस्या से निपटने में होना चाहिए।
वैज्ञानिकों ने बताया- प्रदूषण मापने की तकनीक पर काम चल रहा
समिति की सिफारिश के जवाब में केंद्रीय वैज्ञानिक उपकरण संगठन ने बताया कि उसके वैज्ञानिक पर्यावरण प्रदूषण से निपटने के लिए कई तकनीकों पर काम कर रहे हैं। संस्थान ने गैस निगरानी प्रणाली विकसित की है। इससे मीथेन, कार्बन डाइऑक्साइड और अमोनिया जैसी गैसों की निगरानी की जा सकती है। संस्थान का कहना है कि इसका इस्तेमाल पराली जलाने से निकलने वाली गैसों की निगरानी में भी किया जा सकता है। इसके अलावा चेन्नई स्थित केंद्र ने दिल्ली में प्रदूषण कम करने के लिए एक प्रस्ताव तैयार किया है। इस प्रस्ताव पर दिल्ली के मुख्यमंत्री कार्यालय की प्रतिक्रिया का इंतजार है।
धूल रोकने की तकनीक तैयार, कीमत एक से छह लाख रुपये
संस्थान ने धूल को नियंत्रित करने के लिए इलेक्ट्रोस्टैटिक छिड़काव तकनीक भी विकसित की है। इसके बारे में भी समिति को जानकारी दी गई। इसमें बहुत छोटे पानी के कणों पर विद्युत आवेश दिया जाता है। ये कण धूल के कणों के संपर्क में आकर उन्हें दबाने में मदद करते हैं। संस्थान के अनुसार यह तकनीक खास तौर पर ऐसी बारीक धूल को नियंत्रित करने में उपयोगी है जो सांस के साथ शरीर के भीतर जा सकती है। इसका एक फायदा यह है कि धूल दबाने में पानी और प्राकृतिक संसाधनों की खपत कम की जा सकती है।
यमुना के लिए लगातार निगरानी होगी, बनेगा केंद्रीय आंकड़ा केंद्र
यमुना को लेकर भी संस्थान ने एक अहम योजना बताई है। जेएएल-आईओटी प्रणाली और दूसरे सेंसरों की मदद से यमुना के पानी की गुणवत्ता की लगातार निगरानी के लिए एक परीक्षण परियोजना तैयार करने का प्रस्ताव है। इसमें पानी की गुणवत्ता के कई मानकों की लगातार जांच, आंकड़ों को इंटरनेट के जरिये दर्ज करना और अधिकारियों के लिए केंद्रीय आंकड़ा केंद्र बनाने की योजना है। इसका उद्देश्य सिर्फ यमुना के प्रदूषण के आंकड़े जुटाना नहीं है। योजना में इन आंकड़ों को प्रदूषित हिस्सों की सफाई की कार्रवाई से जोड़ने की बात भी कही गई है।
यमुना को लेकर समिति ने जीनोमिक्स एवं समेकित जीव विज्ञान संस्थान से भी अहम सिफारिश की है। कहा कि संस्थान ऐसे स्थानीय या वैज्ञानिक तरीके से तैयार किए गए सूक्ष्मजीवों की पहचान और उनके गुणों का अध्ययन करे, जो यमुना में मौजूद सीवेज, औद्योगिक गंदे पानी और दूसरे प्रदूषकों को तोड़ने में सक्षम हों।
संस्थान ने ये सिफारिशें भी कीं
- भविष्य में जल निकायों की जैविक सफाई के क्षेत्र में क्षमता विकसित की जाएगी।
- पराली से होने वाले प्रदूषण की निगरानी के लिए भी तकनीक विकसित करने पर जोर।
- सिर्फ नई तकनीक न बनाएं, बल्कि उन्हें जल्दी इस्तेमाल में लाने पर भी जोर दें।
- किसी उद्योग को तकनीक देने के समझौते में यह शर्त रखी जाए कि वह तय समय के भीतर उस तकनीक का व्यावसायिक इस्तेमाल शुरू करेगा।
साबरमती की तर्ज पर विकसित होगा यमुना रिवरफ्रंट
दिल्ली सरकार यमुना नदी के किनारे को गुजरात के साबरमती रिवरफ्रंट की तर्ज पर विकसित करने की तैयारी कर रही है। गुजरात के अध्ययन दौरे पर पहुंचे जल मंत्री प्रवेश साहिब सिंह ने दिल्ली सिंचाई एवं बाढ़ नियंत्रण विभाग (आईएंडएफसी) और दिल्ली जल बोर्ड के अधिकारियों के साथ साबरमती रिवरफ्रंट का निरीक्षण किया।
जल मंत्री का कहना है कि करीब 25-30 वर्ष पहले साबरमती भी उन समस्याओं से जूझ रही थी, जिनका सामना आज यमुना कर रही है। सरकार साबरमती मॉडल का अध्ययन कर रही है और दिल्ली की जरूरतों के अनुसार उसकी बेहतर व्यवस्थाओं को अपनाया जाएगा। मंत्री ने कहा कि यमुना किनारे बड़े और सुंदर पार्क, साइकिल ट्रैक और खेल मैदान विकसित किए जाएंगे। सरकार का लक्ष्य विश्वस्तरीय यमुना रिवरफ्रंट तैयार करना है।
कलिंदी कुंज में 60 करोड़ से छठ घाट तैयार होगा
यमुना किनारे कलिंदी कुंज में करीब 60 करोड़ रुपये की लागत से भव्य छठ घाट विकसित करने की योजना पर भी काम चल रहा है। इससे छठ पर्व पर श्रद्धालुओं को बेहतर सुविधाएं मिल सकेंगी।
साबरमती की तरह होगा धुलाई घाट की समस्याओं का समाधान
मंत्री ने बताया कि साबरमती की तरह यमुना के किनारे भी धोबी घाटों से जुड़ी समस्या रही है। गुजरात में धोबी घाटों को स्थानांतरित कर मशीनीकृत लॉन्ड्री की व्यवस्था की गई। दिल्ली में भी इसी तरह का समाधान लागू करने पर विचार किया जा रहा है।