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Faridabad News: मुरादाबाद की गलियों से अंतरराष्ट्रीय मंच तक चमकी दिलशाद हुसैन की ब्रास कला
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भारत सरकार ने दिलशाद हुसैन को वर्ष 2023 में पद्मश्री सम्मान से नवाजा
संवाद न्यूज एजेंसी
फरीदाबाद। सूरजकुंड मेले में उत्तर प्रदेश के थीम राज्य के रूप में जहां प्रदेश की सांस्कृतिक विविधता ने ध्यान खींचा वहीं मुरादाबाद की गलियों से निकलकर विश्व मंच तक अपनी पहचान बना चुके ब्रास मेटल शिल्पी दिलशाद हुसैन की कला भी आकर्षण का केंद्र रही।
विश्व प्रसिद्ध पीतल नगरी मुरादाबाद में जन्मे दिलशाद हुसैन ने महज 10 वर्ष की उम्र में अपने दादा अब्दुल हमीद से ब्रास मेटल शिल्प की बारीकियां सीखनी शुरू कर दी थीं। दिलशाद बताते हैं कि शुरुआती दौर में कई बार तैयार किया गया सामान खराब हो जाता था और मेहनत के अनुरूप परिणाम नहीं मिलते थे, लेकिन दादा की सीख, परिवार का सहयोग और कला के प्रति जुनून ने उन्हें कभी हार नहीं मानने दी। उनकी मेहनत को पहला बड़ा अंतरराष्ट्रीय मंच वर्ष 2015 में मिला, जब ईरान में आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम में उनकी ब्रास मेटल कलाकृतियों को विशेष सराहना मिली। पीतल पर की गई महीन नक्काशी ने विदेशी दर्शकों को भी आकर्षित किया और यहीं से दिलशाद हुसैन की कला को वैश्विक पहचान मिलने लगी।
प्रधानमंत्री मोदी भी हुए कला से प्रभावित
दिलशाद हुसैन की कला से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी प्रभावित हुए हैं। वर्ष 2022 में दिल्ली के इंदिरा गांधी स्टेडियम में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान प्रधानमंत्री ने दिलशाद द्वारा तैयार किया गया पीतल का नक्काशीदार घड़ा खरीदा था। बाद में उसी घड़े को जर्मनी में आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम के दौरान विदेशी अतिथि को भेंट स्वरूप प्रदान किया गया। दिलशाद हुसैन बताते हैं कि यह सम्मान केवल उनका नहीं, बल्कि उन सभी कारीगरों का है जो पीढ़ियों से इस कला को जीवित रखे हुए हैं। उनकी तरह ही उनके बेटे शहजाद अली और अरशद अली भी पारिवारिक परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। दोनों बेटों को ब्रास मेटल शिल्प में उत्कृष्ट कार्य के लिए राज्य स्तरीय सम्मान मिल चुका है और पिता के मार्गदर्शन में वे पीतल पर नक्काशी की कला में महारत हासिल कर चुके हैं।
पद्मश्री से हुआ सम्मान
भारत सरकार ने दिलशाद हुसैन को वर्ष 2023 में पद्मश्री सम्मान से नवाजा। इससे पहले उन्हें 2004 में राज्य स्तरीय सम्मान, 2012 में नेशनल अवार्ड और 2017 में शिल्प गुरु अवार्ड से सम्मानित किया जा चुका है। दिलशाद बताते हैं कि परिवार की महिलाएं भी हस्तशिल्प के क्षेत्र में सक्रिय हैं। उनकी बेटियां तैयबा, उजमा खातून और बहू चमन जहान को कपड़ों पर कढ़ाई के लिए राज्य स्तरीय सम्मान मिल चुका है।
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संवाद न्यूज एजेंसी
फरीदाबाद। सूरजकुंड मेले में उत्तर प्रदेश के थीम राज्य के रूप में जहां प्रदेश की सांस्कृतिक विविधता ने ध्यान खींचा वहीं मुरादाबाद की गलियों से निकलकर विश्व मंच तक अपनी पहचान बना चुके ब्रास मेटल शिल्पी दिलशाद हुसैन की कला भी आकर्षण का केंद्र रही।
विश्व प्रसिद्ध पीतल नगरी मुरादाबाद में जन्मे दिलशाद हुसैन ने महज 10 वर्ष की उम्र में अपने दादा अब्दुल हमीद से ब्रास मेटल शिल्प की बारीकियां सीखनी शुरू कर दी थीं। दिलशाद बताते हैं कि शुरुआती दौर में कई बार तैयार किया गया सामान खराब हो जाता था और मेहनत के अनुरूप परिणाम नहीं मिलते थे, लेकिन दादा की सीख, परिवार का सहयोग और कला के प्रति जुनून ने उन्हें कभी हार नहीं मानने दी। उनकी मेहनत को पहला बड़ा अंतरराष्ट्रीय मंच वर्ष 2015 में मिला, जब ईरान में आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम में उनकी ब्रास मेटल कलाकृतियों को विशेष सराहना मिली। पीतल पर की गई महीन नक्काशी ने विदेशी दर्शकों को भी आकर्षित किया और यहीं से दिलशाद हुसैन की कला को वैश्विक पहचान मिलने लगी।
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प्रधानमंत्री मोदी भी हुए कला से प्रभावित
दिलशाद हुसैन की कला से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी प्रभावित हुए हैं। वर्ष 2022 में दिल्ली के इंदिरा गांधी स्टेडियम में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान प्रधानमंत्री ने दिलशाद द्वारा तैयार किया गया पीतल का नक्काशीदार घड़ा खरीदा था। बाद में उसी घड़े को जर्मनी में आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम के दौरान विदेशी अतिथि को भेंट स्वरूप प्रदान किया गया। दिलशाद हुसैन बताते हैं कि यह सम्मान केवल उनका नहीं, बल्कि उन सभी कारीगरों का है जो पीढ़ियों से इस कला को जीवित रखे हुए हैं। उनकी तरह ही उनके बेटे शहजाद अली और अरशद अली भी पारिवारिक परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। दोनों बेटों को ब्रास मेटल शिल्प में उत्कृष्ट कार्य के लिए राज्य स्तरीय सम्मान मिल चुका है और पिता के मार्गदर्शन में वे पीतल पर नक्काशी की कला में महारत हासिल कर चुके हैं।
पद्मश्री से हुआ सम्मान
भारत सरकार ने दिलशाद हुसैन को वर्ष 2023 में पद्मश्री सम्मान से नवाजा। इससे पहले उन्हें 2004 में राज्य स्तरीय सम्मान, 2012 में नेशनल अवार्ड और 2017 में शिल्प गुरु अवार्ड से सम्मानित किया जा चुका है। दिलशाद बताते हैं कि परिवार की महिलाएं भी हस्तशिल्प के क्षेत्र में सक्रिय हैं। उनकी बेटियां तैयबा, उजमा खातून और बहू चमन जहान को कपड़ों पर कढ़ाई के लिए राज्य स्तरीय सम्मान मिल चुका है।
