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Ghaziabad News: एनआरएचएम घोटाले में पद सृजन और दवा खरीद में नहीं आया गवाह, टली सुनवाई
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सीएमओ परिवार कल्याण पद बनाने, डॉक्टरों की नियुक्ति और दवा आपूर्ति में 15 से 20 लाख रुपये रिश्वत लेने का आरोप
माई सिटी रिपोर्टर
गाजियाबाद। एनआरएचएम घोटाले से जुड़े मामले में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग में पद सृजन से लेकर डॉक्टरों की नियुक्ति और दवा खरीद में कथित करोड़ों रुपये के घोटाले में गवाह नहीं आने से सुनवाई नहीं हो सकी।अदालत ने सुनवाई की अगली तारीख 25 सितंबर लगाई है।
सीबीआई का आरोप है कि वर्ष 2007 से 2011 के बीच आपराधिक षड्यंत्र के तहत विभाग का विभाजन कर प्रत्येक जिले में डीपीओ का नया पद बनाया गया। बाद में इसका नाम सीएमओ परिवार कल्याण कर दिया गया। इस पद को वित्तीय अधिकार भी दिए गए, जिससे एनआरएचएम योजना के तहत खरीदारी को नियंत्रित किया जा सके। अभियोजन के अनुसार नए पद का सृजन पांच मई 2010 को दिखाया गया, आरोप है कि पत्रावली पर मुख्यमंत्री के हस्ताक्षर नहीं थे। दस मई 2010 को बाबू सिंह कुशवाहा के निवास पर तत्कालीन सचिव प्रदीप शुक्ला ने डॉ. चंद्रभान प्रसाद को डीपीओ बनाने के लिए 100 डॉक्टरों की सूची सौंपी। आरोप है कि इनमें से 72 डॉक्टरों को वरिष्ठता और नियमों की अनदेखी कर डीपीओ नियुक्त किया गया।
आरोप है कि तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री अनंत कुमार मिश्रा, महेंद्र कुमार पांडेय, दवाई कारोबारी रईस आलम सिद्दीकी, तत्कालीन विधायक अब दिवंगत आरपी जायसवाल और तत्कालीन कैबिनेट मंत्री अब सपा सांसद बाबू सिंह कुशवाहा समेत अन्य ने आपराधिक षडयंत्र कर दवा कारोबारियों के माध्यम से 15 से 20 लाख रुपये की रिश्वत ली। इसके बाद कथित तौर पर दवा कारोबारियों के कहने पर दवा आपूर्ति के आदेश जारी किए गए और उन्हें लाभ पहुंचाया गया। अभियोजन के मुताबिक वर्ष 2005 से 2011 के दौरान भारत सरकार ने एनआरएचएम योजना के तहत 9133.77 करोड़ रुपये जारी किए, जिसमें से 8658.03 करोड़ रुपये उत्तर प्रदेश सरकार ने खर्च किए। आरोप है कि इसी धनराशि में से करीब 35 लाख रुपये आरपी जायसवाल ने हवाई यात्रा पर खर्च किए। मामले में अनंत कुमार मिश्रा, बाबू सिंह कुशवाहा, प्रदीप कुमार शुक्ला, आरपी जायसवाल, रईस आलम सिद्दीकी उर्फ गुड्डू खान, महेंद्र पांडेय, तत्कालीन स्वास्थ्य महानिदेशक अब दिवंगत डॉ.एसपीएस राम, अशोक कटियार, गिरीश मलिक और मानवेंद्र सिंह चड्ढा समेत अन्य अज्ञात को सीबीआई ने आरोप बनाया है।
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माई सिटी रिपोर्टर
गाजियाबाद। एनआरएचएम घोटाले से जुड़े मामले में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग में पद सृजन से लेकर डॉक्टरों की नियुक्ति और दवा खरीद में कथित करोड़ों रुपये के घोटाले में गवाह नहीं आने से सुनवाई नहीं हो सकी।अदालत ने सुनवाई की अगली तारीख 25 सितंबर लगाई है।
सीबीआई का आरोप है कि वर्ष 2007 से 2011 के बीच आपराधिक षड्यंत्र के तहत विभाग का विभाजन कर प्रत्येक जिले में डीपीओ का नया पद बनाया गया। बाद में इसका नाम सीएमओ परिवार कल्याण कर दिया गया। इस पद को वित्तीय अधिकार भी दिए गए, जिससे एनआरएचएम योजना के तहत खरीदारी को नियंत्रित किया जा सके। अभियोजन के अनुसार नए पद का सृजन पांच मई 2010 को दिखाया गया, आरोप है कि पत्रावली पर मुख्यमंत्री के हस्ताक्षर नहीं थे। दस मई 2010 को बाबू सिंह कुशवाहा के निवास पर तत्कालीन सचिव प्रदीप शुक्ला ने डॉ. चंद्रभान प्रसाद को डीपीओ बनाने के लिए 100 डॉक्टरों की सूची सौंपी। आरोप है कि इनमें से 72 डॉक्टरों को वरिष्ठता और नियमों की अनदेखी कर डीपीओ नियुक्त किया गया।
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आरोप है कि तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री अनंत कुमार मिश्रा, महेंद्र कुमार पांडेय, दवाई कारोबारी रईस आलम सिद्दीकी, तत्कालीन विधायक अब दिवंगत आरपी जायसवाल और तत्कालीन कैबिनेट मंत्री अब सपा सांसद बाबू सिंह कुशवाहा समेत अन्य ने आपराधिक षडयंत्र कर दवा कारोबारियों के माध्यम से 15 से 20 लाख रुपये की रिश्वत ली। इसके बाद कथित तौर पर दवा कारोबारियों के कहने पर दवा आपूर्ति के आदेश जारी किए गए और उन्हें लाभ पहुंचाया गया। अभियोजन के मुताबिक वर्ष 2005 से 2011 के दौरान भारत सरकार ने एनआरएचएम योजना के तहत 9133.77 करोड़ रुपये जारी किए, जिसमें से 8658.03 करोड़ रुपये उत्तर प्रदेश सरकार ने खर्च किए। आरोप है कि इसी धनराशि में से करीब 35 लाख रुपये आरपी जायसवाल ने हवाई यात्रा पर खर्च किए। मामले में अनंत कुमार मिश्रा, बाबू सिंह कुशवाहा, प्रदीप कुमार शुक्ला, आरपी जायसवाल, रईस आलम सिद्दीकी उर्फ गुड्डू खान, महेंद्र पांडेय, तत्कालीन स्वास्थ्य महानिदेशक अब दिवंगत डॉ.एसपीएस राम, अशोक कटियार, गिरीश मलिक और मानवेंद्र सिंह चड्ढा समेत अन्य अज्ञात को सीबीआई ने आरोप बनाया है।
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