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Delhi NCR News: दुर्लभ बीमारी से पीड़ित बच्ची का एम्स में होगा बोन मैरो ट्रांसप्लांट
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अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। दिल्ली हाईकोर्ट ने दुर्लभ आनुवंशिक बीमारी एलआरबीए डेफिशिएंसी से पीड़ित तीन वर्षीय बच्ची का बोन मैरो ट्रांसप्लांट अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में कराने का निर्देश दिया है। अदालत ने यह आदेश विशेषज्ञ चिकित्सकों की समिति की रिपोर्ट के आधार पर दिया।
बच्ची के परिवार ने अदालत में दावा किया था कि एम्स में बोन मैरो ट्रांसप्लांट के लिए जरूरी सुविधाएं नहीं हैं। अदालत के निर्देश पर गठित विशेषज्ञ समिति ने इस दावे को तथ्यात्मक रूप से गलत बताते हुए रिपोर्ट में स्पष्ट किया कि एम्स के दुर्लभ रोगों के नोडल अधिकारी ने संस्थान में बोन मैरो ट्रांसप्लांट के लिए जरूरी आधारभूत ढांचा और विशेषज्ञ सुविधाएं उपलब्ध होने की पुष्टि की है। याचिका के अनुसार, बच्ची एलआरबीए डेफिशिएंसी नाम की बीमारी से पीड़ित है। इस बीमारी के कारण उसकी रोग प्रतिरोधक क्षमता गंभीर रूप से प्रभावित हो गई है। बचपन से ही बच्ची को बार-बार बुखार, गंभीर एनीमिया और कई बार रक्त चढ़ाने की जरूरत पड़ चुकी है। बीते वर्ष होल जीनोम सीक्वेंसिंग जांच के बाद बीमारी की पुष्टि हुई थी। चिकित्सकों ने बोन मैरो ट्रांसप्लांट को इस बीमारी का एकमात्र प्रभावी उपचार बताया है।
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नई दिल्ली। दिल्ली हाईकोर्ट ने दुर्लभ आनुवंशिक बीमारी एलआरबीए डेफिशिएंसी से पीड़ित तीन वर्षीय बच्ची का बोन मैरो ट्रांसप्लांट अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में कराने का निर्देश दिया है। अदालत ने यह आदेश विशेषज्ञ चिकित्सकों की समिति की रिपोर्ट के आधार पर दिया।
बच्ची के परिवार ने अदालत में दावा किया था कि एम्स में बोन मैरो ट्रांसप्लांट के लिए जरूरी सुविधाएं नहीं हैं। अदालत के निर्देश पर गठित विशेषज्ञ समिति ने इस दावे को तथ्यात्मक रूप से गलत बताते हुए रिपोर्ट में स्पष्ट किया कि एम्स के दुर्लभ रोगों के नोडल अधिकारी ने संस्थान में बोन मैरो ट्रांसप्लांट के लिए जरूरी आधारभूत ढांचा और विशेषज्ञ सुविधाएं उपलब्ध होने की पुष्टि की है। याचिका के अनुसार, बच्ची एलआरबीए डेफिशिएंसी नाम की बीमारी से पीड़ित है। इस बीमारी के कारण उसकी रोग प्रतिरोधक क्षमता गंभीर रूप से प्रभावित हो गई है। बचपन से ही बच्ची को बार-बार बुखार, गंभीर एनीमिया और कई बार रक्त चढ़ाने की जरूरत पड़ चुकी है। बीते वर्ष होल जीनोम सीक्वेंसिंग जांच के बाद बीमारी की पुष्टि हुई थी। चिकित्सकों ने बोन मैरो ट्रांसप्लांट को इस बीमारी का एकमात्र प्रभावी उपचार बताया है।
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