हाईकोर्ट की टिप्पणी: सार्वजनिक पदों पर बैठे लोगों की चमड़ी पतली नहीं होनी चाहिए, याद दिलाए लक्ष्मण के कार्टून
अदालत ने यह भी कहा कि भारत आरके लक्ष्मण के राजनीतिक कार्टूनों और व्यंग्य की समृद्ध परंपरा वाला देश रहा है, इसलिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर बिना ठोस आधार के अंकुश नहीं लगाया जा सकता।
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\राघव चड्ढा की डीपफेक और मानहानि संबंधी याचिका पर सुनवाई करते हुए दिल्ली हाईकोर्ट ने सार्वजनिक जीवन से जुड़े लोगों के लिए महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने कहा, 'सार्वजनिक पदों पर बैठे लोगों की चमड़ी पतली नहीं होनी चाहिए' और उन्हें आलोचना व राजनीतिक व्यंग्य को लोकतंत्र का स्वाभाविक हिस्सा मानकर स्वीकार करना चाहिए।
न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद की एकलपीठ ने कहा कि राजनीतिक फैसलों पर व्यंग्य, आलोचना और विपक्षी दलों की टिप्पणियां लोकतांत्रिक व्यवस्था का अभिन्न हिस्सा हैं। अदालत ने यह भी कहा कि भारत आरके लक्ष्मण के राजनीतिक कार्टूनों और व्यंग्य की समृद्ध परंपरा वाला देश रहा है, इसलिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर बिना ठोस आधार के अंकुश नहीं लगाया जा सकता।
हालांकि अदालत ने राघव चड्ढा को आंशिक राहत देते हुए याचिका के साथ दाखिल 52 दस्तावेजों में से छह में मौजूद अश्लील, अपमानजनक और गाली-गलौज वाली सामग्री को हटाने का निर्देश दिया। इनसे जुड़े यूआरएल दो सप्ताह के भीतर हटाने के साथ मेटा और एक्स को संबंधित अकाउंट्स की मूल सब्सक्राइबर जानकारी तथा आईपी लॉग उपलब्ध कराने के आदेश भी दिए गए।
52 में ये 46 दस्तावेज में मौजूद सामग्री को अदालत ने राजनीतिक व्यंग्य माना
- अदालत ने स्पष्ट किया कि राघव चड्ढा ने व्यक्तित्व अधिकार (पर्सनैलिटी राइट्स) के आधार पर दलील नहीं दी थी, इसलिए मामला मुख्य रूप से मानहानि के दायरे में ही रहा। अदालत ने व्यक्तित्व अधिकारों के आधार पर स्थायी रोक लगाने से भी इन्कार कर दिया।
- याचिका में राघव चड्ढा ने भाजपा में शामिल होने के बाद उनके खिलाफ कथित तौर पर बनाए गए डीपफेक वीडियो और ऑडियो हटाने की मांग की थी। अदालत ने शेष 46 दस्तावेजों को राजनीतिक व्यंग्य की श्रेणी में मानते हुए उन पर अंतरिम रोक लगाने से इन्कार कर दिया।
कहा-प्रेस और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बिना ठोस आधार के सीमिति नहीं किया जा सकता
अपने आदेश में अदालत ने बोनार्ड बनाम पेरीमैन और ब्लूमबर्ग बनाम जी मीडिया समेत कई महत्वपूर्ण फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि प्रेस और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतंत्र की आधारशिला है और इसे बिना पर्याप्त कारण सीमित नहीं किया जा सकता। मामले की अगली सुनवाई 18 अगस्त को होगी।