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Biodiversity: दिल्ली रिज में पत्थर पर मिली रहस्यमयी नक्काशी, वैज्ञानिक जांच के बाद ही खुलेगा राज

Thu, 02 Jul 2026 03:15 AM IST
दुष्यंत शर्मा अमर उजाला नेटवर्क, दिल्ली
अमर उजाला नेटवर्क, दिल्ली Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Thu, 02 Jul 2026 03:15 AM IST
सार

यह खोज अहम हो सकती है लेकिन इसकी उम्र और ऐतिहासिक महत्व का पता केवल विस्तृत वैज्ञानिक और पुरातात्विक जांच के बाद ही चल सकेगा।
 

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Mysterious carvings found on a stone in the Delhi Ridge
सांकेतिक चित्र - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

दिल्ली के सेंट्रल रिज में जैव-विविधता का अध्ययन करने पहुंचे दो पर्यावरणविदों को क्वार्टजाइट की एक चट्टान पर रहस्यमयी नक्काशी मिली है। उनका कहना है कि यह खोज अहम हो सकती है लेकिन इसकी उम्र और ऐतिहासिक महत्व का पता केवल विस्तृत वैज्ञानिक और पुरातात्विक जांच के बाद ही चल सकेगा।
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पर्यावरणविद् प्रदीप कृष्णन और चेतन अग्रवाल नियमित रूप से सेंट्रल रिज की जैव-विविधता और वनस्पतियों का दस्तावेजीकरण करते हैं। हाल ही में पोलो ग्राउंड के पास भ्रमण के दौरान चेतन अग्रवाल की नजर जमीन से बाहर निकली एक बड़ी क्वार्टजाइट चट्टान पर बने असामान्य निशानों पर पड़ी। 
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प्रदीप कृष्णन ने बताया कि वे पहले भी कई बार उस स्थान पर जा चुके थे लेकिन इस बार इन नक्काशीदार निशानों पर ध्यान गया। बाद में उन्होंने एक इतिहासकार को भी मौके पर बुलाया, जिन्होंने शुरुआती तौर पर इन्हें पेट्रोग्लिफ्स यानी पत्थर पर उकेरी गई प्राचीन आकृतियां होने की संभावना जताई। 
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कृष्णन ने स्पष्ट किया कि वह पेट्रोग्लिफ्स के विशेषज्ञ नहीं हैं, इसलिए इनकी उम्र के बारे में कोई दावा नहीं किया जा सकता। उनके अनुसार, नक्काशी काफी घिस चुकी है और क्वार्टजाइट जैसे कठोर पत्थर पर बने होने के कारण यह लंबे समय से मौजूद हो सकती है। हालांकि, यह कहना अभी संभव नहीं है कि ये सैकड़ों, हजारों या कुछ वर्ष पुरानी हैं।

चट्टान पर दो तरह के पैटर्न
प्रदीप कृष्णन ने बताया कि चट्टान पर दो तरह के पैटर्न दिखाई देते हैं। एक में सात-आठ कप जैसे गोल गड्ढे एक सीध में बने हैं, जबकि दूसरे में सीढ़ी जैसी दो आकृतियां समकोण पर बनी हुई हैं। उनका कहना है कि यह किसी पुराने खेल का बोर्ड भी हो सकता है या फिर सजावटी डिजाइन लेकिन यह केवल व्यक्तिगत अनुमान है। पुरातत्वविद् डॉ. संजीव कुमार सिंह ने कहा कि अरावली दुनिया की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है, इसलिए यहां इस तरह की पत्थर की नक्काशी मिलना असामान्य नहीं है। 


उन्होंने बताया कि हरियाणा में भी पहले ऐसी नक्काशियां मिलने की जानकारी सामने आ चुकी है। डॉ. सिंह ने बताया कि किसी भी नक्काशी की उम्र या ऐतिहासिक महत्व का निर्धारण बिना वैज्ञानिक अध्ययन के नहीं किया जा सकता। इसके लिए विस्तृत पुरातात्विक सर्वेक्षण, दस्तावेजीकरण और विशेषज्ञों की जांच जरूरी है। फिलहाल यह खोज शोध और अकादमिक चर्चा का विषय है, जिसका वास्तविक इतिहास वैज्ञानिक विश्लेषण के बाद ही सामने आ सकेगा।
 
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