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Research: डायबिटीज होने वाली है यह पता पहले ही चल जाएगा, भारत के लिए इसलिए जरूरी है शोध
अमर उजाला नेटवर्क, दिल्ली
Published by: दुष्यंत शर्मा
Updated Fri, 19 Jun 2026 06:29 AM IST
सार
एम्स नई दिल्ली के विशेषज्ञों ने नई वैज्ञानिक रिसर्च में पाया है कि शरीर की कोशिकाओं में होने वाले कुछ सूक्ष्म जैविक बदलाव (एपिजेनेटिक सिग्नेचर) भविष्य में डायबिटीज के खतरे का संकेत दे सकते हैं।
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अच्छी बात यह है कि इनमें से कई बदलाव खानपान, व्यायाम और वजन नियंत्रण जैसी स्वस्थ आदतों से बदले भी जा सकते हैं।
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
टाइप-2 डायबिटीज का खतरा अब बीमारी के लक्षण दिखने से कई साल पहले ही पकड़ा जा सकता है। एम्स नई दिल्ली के विशेषज्ञों ने नई वैज्ञानिक रिसर्च में पाया है कि शरीर की कोशिकाओं में होने वाले कुछ सूक्ष्म जैविक बदलाव (एपिजेनेटिक सिग्नेचर) भविष्य में डायबिटीज के खतरे का संकेत दे सकते हैं।
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अच्छी बात यह है कि इनमें से कई बदलाव खानपान, व्यायाम और वजन नियंत्रण जैसी स्वस्थ आदतों से बदले भी जा सकते हैं। शोध करने वाली एम्स की प्रोफेसर डॉ. रीमा दादा के अनुसार, टाइप-2 डायबिटीज दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ने वाली बीमारियों में शामिल है। यह तब होती है जब शरीर इंसुलिन का सही इस्तेमाल नहीं कर पाता या पर्याप्त इंसुलिन नहीं बना पाता। लंबे समय तक अनियंत्रित रहने पर किडनी, आंखों, नसों, हृदय और मस्तिष्क को नुकसान पहुंचा सकती है।
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जींस ही नहीं, जीवन शैली भी तय करती है जोखिम
डॉ. रीमा ने बताया कि डायबिटीज का खतरा केवल माता-पिता से मिले जीन पर निर्भर नहीं करता। शरीर में कुछ ऐसे रासायनिक बदलाव भी होते हैं जो यह तय करते हैं कि कोई जीन कितना सक्रिय रहेगा। इन्हें एपिजेनेटिक बदलाव कहा जाता है। रिसर्च में पाया गया कि शरीर के फैट, लिवर, मांसपेशियों और अग्न्याशय की कोशिकाओं में डीएनए पर होने वाले ये बदलाव इंसुलिन और ब्लड शुगर को नियंत्रित करने वाले जीनों को प्रभावित करते हैं।
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भारत के लिए क्यों अहम है यह रिसर्च
भारत को दुनिया की डायबिटीज कैपिटल कहा जाता है। अनुमान है कि देश में 10 करोड़ से अधिक लोग डायबिटीज से पीड़ित हैं, जबकि करोड़ों लोग प्री-डायबिटीज की स्थिति में हैं। ऐसे में बीमारी के लक्षण आने से पहले ही खतरे की पहचान करने वाली तकनीक लाखों लोगों को गंभीर जटिलताओं से बचा सकती है।
बीमारी आने से पहले मिल सकता है अलर्ट
डॉ. रीमा के अनुसार, शोध में पाया गया कि कुछ खास जीनों में होने वाले एपिजेनेटिक बदलाव डायबिटीज के शुरुआती संकेतक (बायोमार्कर) बन सकते हैं। यानी भविष्य में एक साधारण जांच से यह पता लगाया जा सकेगा कि किसी व्यक्ति को आने वाले वर्षों में डायबिटीज होने का कितना खतरा है।