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Delhi NCR News: नई किडनी के बाद नया खतरा... विटामिन-डी की कमी से बढ़ रहा डायबिटीज का जोखिम
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- किडनी ट्रांसप्लांट के बाद डायबिटीज से बचाव में विटामिन-डी अहम
- एम्स के अध्ययन में खुलासा, कमी होने पर 8 गुना तक बढ़ सकता है खतरा
- अध्ययन में 72 ऐसे मरीजों को शामिल किया गया, जिन्होंने 2019-2020 के दौरान किडनी ट्रांसप्लांट कराया था
सिमरन
नई दिल्ली। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के डॉक्टरों के एक हालिया अध्ययन में सामने आया है कि किडनी ट्रांसप्लांट के बाद होने वाली पोस्ट-ट्रांसप्लांट डायबिटीज मेलिटस (पीटीडीएम) से बचाव में विटामिन-डी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। यह समस्या नई किडनी (ग्राफ्ट) को नुकसान पहुंचाने के साथ मरीज के संपूर्ण स्वास्थ्य के लिए भी खतरा बन सकती है।
यह अध्ययन वर्ल्ड जर्नल ऑफ नेफ्रोलॉजी में प्रकाशित हुआ, जिसमें 2019-2020 के दौरान किडनी ट्रांसप्लांट करा चुके 72 मरीजों को शामिल किया गया। इसमें एम्स के नेफ्रोलॉजी, एंडोक्रिनोलॉजी और रिप्रोडक्टिव बायोलॉजी विभाग के विशेषज्ञ शामिल थे। ट्रांसप्लांट के समय उनके विटामिन-डी स्तर की जांच की गई और एक वर्ष तक उनकी स्थिति पर नजर रखी गई। नतीजों के अनुसार, एक साल के भीतर 32 मरीजों (करीब 44%) को पीटीडीएम हो गया। इनमें से 81% से अधिक मरीजों में विटामिन-डी की गंभीर कमी पाई गई।
61 प्रतिशत मरीजों में विटामिन डी का स्तर बहुत कम मिला-
शोध में यह भी सामने आया कि कुल 61% मरीजों में विटामिन-डी का स्तर बहुत कम था, जबकि 25% में सामान्य से कम पाया गया। यानी लगभग 86% मरीज किसी न किसी रूप में इसकी कमी से जूझ रहे थे। मुख्य शोधकर्ता डॉ. राजके यादव के अनुसार, ट्रांसप्लांट के बाद दी जाने वाली स्टेरॉयड और टैक्रोलिमस जैसी दवाएं पहले से ही डायबिटीज का खतरा बढ़ाती हैं, और विटामिन-डी की कमी इस जोखिम को और बढ़ा देती है। उनके अनुसार, पीटीडीएम केवल डायबिटीज तक सीमित नहीं है, बल्कि यह नई किडनी की कार्यक्षमता को भी प्रभावित कर सकता है। इसके अलावा, इससे हृदय रोग का खतरा बढ़ जाता है और मरीज की जीवन प्रत्याशा पर भी असर पड़ता है।
परिवार में डायबिटीज तो जोखिम ज्यादा-
एम्स के रिप्रोडक्टिव बायोलॉजी विभाग के डॉ. प्रदीप के चतुर्वेदी ने सलाह दी है कि किडनी ट्रांसप्लांट से पहले और बाद में विटामिन-डी स्तर की नियमित जांच की जानी चाहिए। जरूरत पड़ने पर सप्लीमेंट देना एक आसान और किफायती उपाय हो सकता है। अध्ययन में यह भी पाया गया कि जिन मरीजों के परिवार में डायबिटीज का इतिहास है या जिनकी उम्र 40 वर्ष से अधिक है, उनमें जोखिम ज्यादा हो सकता है। वहीं, महिलाओं में यह खतरा अपेक्षाकृत कम देखा गया, हालांकि यह पूरी तरह निर्णायक नहीं है।
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ट्रांसप्लांट के बाद डायबिटीज (पीटीडीएम) के जोखिम कारक -
जोखिम कारक-- -- क्या असर दिखा?-- -- -- आसान समझ
महिला-- -- -- -जोखिम कम दिखा, लेकिन पक्का नहीं-- -- महिलाओं में डायबिटीज का खतरा थोड़ा कम दिखा, पर यह पूरी तरह साबित नहीं हुआ
परिवार में डायबिटीज-- -- -- जोखिम ज्यादा-- -- -- -जिनके परिवार में पहले से डायबिटीज है, उनमें खतरा ज्यादा हो सकता है
विटामिन डी <30 एनजी/एमएल-- -- जोखिम बढ़ सकता है-- -- -- विटामिन डी थोड़ा कम होने पर भी खतरा बढ़ने के संकेत मिले
विटामिन डी <20 एनजी/एमएल-- -- खतरा बहुत ज्यादा (सबसे अहम)-- -- जिनमें विटामिन डी बहुत कम था, उनमें डायबिटीज होने का खतरा 8 गुना तक बढ़ा
डायलिसिस की अवधि-- -- -- -कोई खास असर नहीं-- -- -- -कितने समय तक डायलिसिस चला, इसका ज्यादा फर्क नहीं पड़ा
उम्र > 40 साल-- -- -- -- -- थोड़ा ज्यादा जोखिम-- -- -- -- 40 साल से ज्यादा उम्र वालों में खतरा बढ़ सकता है
सीरम कैल्शियम (सीए 2+)-- -- जोखिम बढ़ा-- -- -- -- -- -- जिनका कैल्शियम स्तर ज्यादा था, उनमें खतरा बढ़ा पाया गया
इंडक्शन थेरेपी-- -- -- -- कोई स्पष्ट असर नहीं-- -- -- -इन दवाओं से डायबिटीज के खतरे पर कोई साफ असर नहीं दिखा
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- एम्स के अध्ययन में खुलासा, कमी होने पर 8 गुना तक बढ़ सकता है खतरा
- अध्ययन में 72 ऐसे मरीजों को शामिल किया गया, जिन्होंने 2019-2020 के दौरान किडनी ट्रांसप्लांट कराया था
सिमरन
नई दिल्ली। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के डॉक्टरों के एक हालिया अध्ययन में सामने आया है कि किडनी ट्रांसप्लांट के बाद होने वाली पोस्ट-ट्रांसप्लांट डायबिटीज मेलिटस (पीटीडीएम) से बचाव में विटामिन-डी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। यह समस्या नई किडनी (ग्राफ्ट) को नुकसान पहुंचाने के साथ मरीज के संपूर्ण स्वास्थ्य के लिए भी खतरा बन सकती है।
यह अध्ययन वर्ल्ड जर्नल ऑफ नेफ्रोलॉजी में प्रकाशित हुआ, जिसमें 2019-2020 के दौरान किडनी ट्रांसप्लांट करा चुके 72 मरीजों को शामिल किया गया। इसमें एम्स के नेफ्रोलॉजी, एंडोक्रिनोलॉजी और रिप्रोडक्टिव बायोलॉजी विभाग के विशेषज्ञ शामिल थे। ट्रांसप्लांट के समय उनके विटामिन-डी स्तर की जांच की गई और एक वर्ष तक उनकी स्थिति पर नजर रखी गई। नतीजों के अनुसार, एक साल के भीतर 32 मरीजों (करीब 44%) को पीटीडीएम हो गया। इनमें से 81% से अधिक मरीजों में विटामिन-डी की गंभीर कमी पाई गई।
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61 प्रतिशत मरीजों में विटामिन डी का स्तर बहुत कम मिला-
शोध में यह भी सामने आया कि कुल 61% मरीजों में विटामिन-डी का स्तर बहुत कम था, जबकि 25% में सामान्य से कम पाया गया। यानी लगभग 86% मरीज किसी न किसी रूप में इसकी कमी से जूझ रहे थे। मुख्य शोधकर्ता डॉ. राजके यादव के अनुसार, ट्रांसप्लांट के बाद दी जाने वाली स्टेरॉयड और टैक्रोलिमस जैसी दवाएं पहले से ही डायबिटीज का खतरा बढ़ाती हैं, और विटामिन-डी की कमी इस जोखिम को और बढ़ा देती है। उनके अनुसार, पीटीडीएम केवल डायबिटीज तक सीमित नहीं है, बल्कि यह नई किडनी की कार्यक्षमता को भी प्रभावित कर सकता है। इसके अलावा, इससे हृदय रोग का खतरा बढ़ जाता है और मरीज की जीवन प्रत्याशा पर भी असर पड़ता है।
परिवार में डायबिटीज तो जोखिम ज्यादा-
एम्स के रिप्रोडक्टिव बायोलॉजी विभाग के डॉ. प्रदीप के चतुर्वेदी ने सलाह दी है कि किडनी ट्रांसप्लांट से पहले और बाद में विटामिन-डी स्तर की नियमित जांच की जानी चाहिए। जरूरत पड़ने पर सप्लीमेंट देना एक आसान और किफायती उपाय हो सकता है। अध्ययन में यह भी पाया गया कि जिन मरीजों के परिवार में डायबिटीज का इतिहास है या जिनकी उम्र 40 वर्ष से अधिक है, उनमें जोखिम ज्यादा हो सकता है। वहीं, महिलाओं में यह खतरा अपेक्षाकृत कम देखा गया, हालांकि यह पूरी तरह निर्णायक नहीं है।
ट्रांसप्लांट के बाद डायबिटीज (पीटीडीएम) के जोखिम कारक -
जोखिम कारक
महिला
परिवार में डायबिटीज
विटामिन डी <30 एनजी/एमएल
विटामिन डी <20 एनजी/एमएल
डायलिसिस की अवधि
उम्र >
सीरम कैल्शियम (सीए 2+)
इंडक्शन थेरेपी