बच्चे कच्ची मिट्टी की तरह होते हैं, जिन्हें सही आकार देने की जिम्मेदारी शिक्षक की होती है। इसलिए विद्यालय में शिक्षक का दायित्व केवल पढ़ाना नहीं, बल्कि विद्यार्थियों को सही मार्ग दिखाना, उनमें अच्छे संस्कार विकसित करना और सीखने के प्रति रुचि पैदा करना भी है। यदि बच्चे गलती करें तो उन्हें डांटने के बजाय धैर्य और प्रेम से समझाना चाहिए, ताकि वे अपनी भूल को समझकर भविष्य में उसे दोहराने से बचें। एक शिक्षक के भीतर धैर्य, सहानुभूति और सकारात्मक सोच का होना आवश्यक है। वर्षों के शिक्षण अनुभव ने यह सिखाया है कि बच्चों के मन में पढ़ाई के प्रति लगन का बीज बोना सबसे महत्वपूर्ण कार्य है। जब विद्यार्थी सीखने के लिए प्रेरित होते हैं तो सफलता उनके कदम चूमती है। बचपन में विकसित हुई सीखने की आदत और अनुशासन ही भविष्य की मजबूत नींव बनते हैं। बच्चों के मानसिक, बौद्धिक और तार्किक विकास के लिए विद्यालयों में समय-समय पर विभिन्न प्रतियोगिताओं और रचनात्मक गतिविधियों का आयोजन होना चाहिए। साथ ही शिक्षकों को विद्यार्थियों से संवाद स्थापित कर उनके विचार, समस्याएं और भावनाएं समझनी चाहिए। इससे बच्चों का आत्मविश्वास बढ़ता है, उनका डर दूर होता है और वे खुलकर अपनी बात रखना सीखते हैं।
– राजबाला सिंह चौहान, सहायक अध्यापिका, उच्च प्राथमिक विद्यालय, मुरशदपुर